Home राज्यDelhi बीजेपी का हृदय परिवर्तनः हिंदुत्व के साथ आस्था का मेल, ‘जय श्री राम’ से ‘जय मां काली’ तक नया चुनावी मंत्र

बीजेपी का हृदय परिवर्तनः हिंदुत्व के साथ आस्था का मेल, ‘जय श्री राम’ से ‘जय मां काली’ तक नया चुनावी मंत्र

by KamleshKumar Singh
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बीजेपी का हृदय परिवर्तनः हिंदुत्व के साथ आस्था का मेल, 'जय श्री राम' से 'जय मां काली' तक नया चुनावी मंत्र

BJP ‘Mission 2026’: बीजेपी चुनावी मशीनरी अब एक बड़े बदलाव की ओर है. क्या बीजेपी ने मान लिया है कि ‘जय श्री राम’ का नारा हर राज्य की चाबी नहीं बन सकता?

BJP ‘Mission 2026’: बीजेपी चुनावी मशीनरी अब एक बड़े बदलाव की ओर है. क्या बीजेपी ने मान लिया है कि ‘जय श्री राम’ का नारा हर राज्य की चाबी नहीं बन सकता? पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक, इस बार भाजपा ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है. अब पार्टी ‘वन साइज फिट्स ऑल’ की थ्योरी को छोड़कर स्थानीय देवी-देवताओं और क्षेत्रीय अस्मिता के सहारे चुनावी समर में उतर रही है. आखिर क्यों बदला भाजपा ने अपना नारा?

बंगाल में जय श्री राम से परहेज!

साल 2021 के बंगाल चुनाव ने बीजेपी को एक बड़ा सबक सिखाया. ‘जय श्री राम’ के नारे ने गैर-बंगाली हिंदुओं को तो जोड़ा, लेकिन बांग्लाभाषी हिंदुओं के बीच ममता की ‘मां, माटी, मानुष’ और ‘जय मां काली’ की गूंज भारी पड़ी. बीजेपी को समझ आ गया कि बंगाल में शक्ति की पूजा होती है, वहां वैष्णव परंपरा से ऊपर मां दुर्गा और काली की आस्था है. इसी को देखते हुए इस बार बंगाल में बीजेपी का चेहरा और नारा दोनों बदल चुके हैं. अब ‘जय श्री राम’ की जगह ‘जय मां काली’ का उद्घोष हो रहा है. रणनीति साफ है- ममता के हिंदुत्व कार्ड का जवाब, स्थानीय आस्था से ही देना. क्योंकि बंगाल में मां काली और दुर्गा का स्थान सर्वोच्च है. स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करते हुए ही चुनाव जीता जा सकता है.

बदलाव दक्षिण में भी

बदलाव दक्षिण भारत के द्वार यानी तमिलनाडु में भी दिख रहा है. उत्तर भारत का कोई भी नारा द्रविड़ राजनीति के दुर्ग को नहीं भेद सका, इसीलिए अब बीजेपी ने ‘जय श्री मुरुगन’ का दामन थामा है. भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय, जिन्हें तमिलनाडु में मुरुगन के रूप में पूजा जाता है, अब भाजपा के प्रचार का केंद्र हैं. बड़ी बात यह है कि तमाम राज्यों बंगाल या तमिलनाडु गए बीजेपी नेता सुनील बंसल, भूपेंद्र यादव , पीयूष गोयल जैसे दिग्गज रणनीतिकार पर्दे के पीछे हैं, जबकि बंगाल में बीजेपी का चेहरा स्थानीय और तमिलनाडु में गठबंधन और अन्नाद्रमुक के नेता ई. पलानीस्वामी का है. भाजपा अब ‘हिंदी-पट्टी की पार्टी’ वाली छवि तोड़कर पूरी तरह ‘लोकल’ होने की कोशिश में है. ऐसे में इस बार भाजपा पश्चिम बंगाल से लेकर असम और तमिलनाडु तक बदले हुए नारे पर चुनाव लड़ेगी. भाजपा को इस बात का अंदाजा हो गया है कि पूरे देश में हिंदुत्व का स्वरूप एक जैसा नहीं है इसलिए हिंदुत्व की राजनीति करते हुए भी चुनाव एक जैसे नारे पर नहीं लड़ा जा सकता है.

बंगाल में आस्था पर जोर

ध्यान रहे एक समय भाजपा पूरे देश में जय श्रीराम के नारे पर चुनाव लड़ती थी. लेकिन धीरे धीरे इसकी सीमाएं सामने आने लगीं. सबसे पहले 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने भाजपा को अहसास कराया कि यह नारा हर जगह कारगर नहीं होगा. हालांकि इस नारे ने और भाजपा की पारंपरिक राजनीति ने उसको पश्चिम बंगाल में गैर बांग्लाभाषी हिंदुओं का वोट दिला दिया लेकिन बांग्लाभाषी हिंदू दूर ही रहे. असल में बांग्ला अस्मिता के साथ ही वहां धर्म का मामला भी जुड़ा हुआ है. वहां मातृशक्ति की पूजा होती है. दुर्गा और काली आराध्य हैं. कुछ इलाकों में चैतन्य महाप्रभु की वजह से कृष्ण भक्ति की परंपरा भी रही है. तभी जय श्रीराम का नारा भाजपा के बहुत काम नहीं आया. सभी हिंदुओं को पूजा पद्धति से लेकर खान पान तक वैष्णव बनाने की भाजपा और आरएसएस की पहल भी वहां लोगों को मंजूर नहीं थी क्योंकि वहां बुनियादी रूप से शक्ति की पूजा होती है. ममता बनर्जी को इसका अंदाजा है. तभी वे पूरे चुनाव में जय मां काली के नारे लगाती रहीं और काली की आराधना के मंत्र पढ़ती रहीं.

बीजेपी ने स्थानीय चेहरों को किया आगे

इसके बाद पिछले पांच साल में उन्होंने तीन मंदिरों का उद्घाटन या शिलान्यास किया. उन्होंने दीघा में जगन्नाथ धाम मंदिर बनवाया. इसका उद्घाटन हो गया है. इसके बाद उन्होंने दुर्गा आंगन नाम से कोलकाता में सबसे बड़े दुर्गा मंदिर की आधारशिला रखी और उसके बाद सिलिगुड़ी में महाकाल मंदिर का शिलान्यास किया. ममता की इस राजनीति ने भी भाजपा को अपने नारे बदलने के लिए मजबूर किया है. ध्यान रहे भाजपा इस बार पूरी तरह से स्थानीय चेहरों को आगे करके ही चुनाव लड़ रही है. बहरहारल, इस बार जय श्रीराम की बजाय भाजपा का नारा भी जय मां काली है. इस बार की खास बात यह भी है कि भाजपा ने संगठन प्रभारी और चुनाव प्रभारी को परदे के पीछे रहने को कहा है. चाहे मंगल पांडेय हों या सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव ये नेता सामने नहीं आ रहे हैं. परदे के पीछे से काम संभाल रहे हैं.

तमिलनाडु में कार्तिकेय पर ध्यान

दूसरी ओर स्थानीय नेता बिल्कुल बांग्ला संस्कृति और धार्मिक मान्यता के हिसाब से प्रचार कर रहे हैं. इसी तरह भारतीय जनता पार्टी का तमिलनाडु में भी नारा बदला हुआ होगा. वहां सनातन के प्रति सत्तारूढ़ डीएमके की जो भावना है वह एक व्यापक समाज की भावना है. इसलिए कोई उत्तर भारतीय नारा वहां नहीं लगना है. वहां भी जय श्री राम से भाजपा परहेज करेगी. तमिलनाडु में भाजपा का नारा जय श्री मुरुगन का है. ध्यान रहे मुरुगन भगवान शिव के बेटे कार्तिकेय का नाम है, जिनकी तमिलनाडु में पूजा होती है. वे लोक देवता की तरह वहां स्थापित हैं. इसलिए अगर धर्म का मामला चुनाव में उठता भी है तो वह भगवान मुरुगन का होगा. वहां भी भाजपा तमिलनाडु के स्थानीय नेताओं के चेहरे पर ही चुनाव लड़ रही है. भाजपा के शीर्ष नेता प्रबंधन संभाल रहे हैं लेकिन चेहरा अन्ना डीएमके का और उसके नेता ई पलानीस्वामी का है.

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