Vijay Stalin Meeting: स्टालिन ने विजय को बधाई तो दी, लेकिन साथ ही “नसीहतों की पोटली” भी खोल दी. बोले — “सरकार के पास पैसा है, बस इच्छाशक्ति चाहिए.”
Vijay Stalin Meeting: साउथ की फिल्मों के सुपरस्टार रहे और अब तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री बने सी. जोसेफ विजय ने पूर्व सीएम एमके स्टालिन से मुलाकात की है. उनकी इस मुलाकात की काफी चर्चा हो रही है. इन दोनों नेताओं ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ा था. चुनाव के जब नतीजे आए तो विजय की जीत हुई और एमके स्टालिन तमिलनाडु के सत्ता से बाहर हो गए. एक लाइन है – दुश्मनी जमकर करो मगर इतनी गुंजाइश रहे कि जब मिलें तो शर्मिंदा ना होना पड़े. लगता है सीएम विजय थलापति ने इस लाइन को काफी गंभीरता से लिया है, इसलिए वे सीएम बनने के बाद अपने सबसे बड़े सियासी शत्रु एमके स्टालिन जिन्हें हराकर वो सीएम बने हैं, उनसे खुद मिलने पहुंचे और उनका आशीर्वाद भी लिया.
तमिलनाडु की बदलती राजनीति का आईना
तमिल राजनीति के रंगमंच पर इन दिनों एक बड़ा दिलचस्प दृश्य देखने को मिला है. कभी खुद को “द्रविड़ राजनीति का सूर्य” बताने वाले एमके स्टालिन की विजय के साथ तस्वीर ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है. सी जोसेफ विजय को इस चुनाव में जनता ने सिर आंखों पर बिठा दिया. सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते के बाद भी फिल्मी सुपरस्टार होते हुए भी विजय संस्कार नहीं भूले, विजय ने जिस अंदाज में स्टालिन से हाथ जोड़े, गले मिले और शुभकामनाएं लीं, वह तस्वीर जितनी शालीन थी, उसके भीतर का राजनीतिक संदेश उतना ही गहरा था.
दरअसल, यह मुलाकात सिर्फ दो नेताओं की नहीं थी, बल्कि तमिलनाडु की बदलती राजनीति का आईना भी थी. एक तरफ वो स्टालिन थे, जो दशकों से डीएमके के राजनीतिक साम्राज्य के वारिस बनकर खुद को अजेय समझते रहे, दूसरी तरफ विजय थे, जिन्होंने जनता की नब्ज पकड़कर उस किले में सेंध लगा दी जिसे डीएमके और एआईएडीएमके ने वर्षों से अपनी जागीर समझ रखा था.
बधाई के साथ नसीहतों की पोटली
स्टालिन ने विजय को बधाई तो दी, लेकिन साथ ही “नसीहतों की पोटली” भी खोल दी. बोले — “सरकार के पास पैसा है, बस इच्छाशक्ति चाहिए.” सुनने में यह वाक्य जितना सरल लगता है, उतना ही व्यंग्यपूर्ण भी. जनता पूछ रही है कि अगर पैसा था, इच्छाशक्ति थी, तो फिर पांच साल तक तमिलनाडु कर्ज के दलदल में क्यों फंसता गया? क्यों हर चुनाव में मुफ्त योजनाओं की बारिश करनी पड़ी? क्यों आज एक अभिनेता को राजनीति में आकर जनता का “मसीहा” बनना पड़ा?
स्टालिन का यह कहना कि “तमिलनाडु का कर्ज तय सीमा के भीतर है”, वैसा ही है जैसे कोई डूबता आदमी यह तसल्ली दे कि पानी अभी गर्दन तक ही पहुंचा है. आंकड़ों की बाजीगरी से सच्चाई नहीं बदलती. जनता ने इस बार साफ कर दिया कि उसे भाषण नहीं, रिजल्ट चाहिए. यही वजह है कि विजय की पार्टी ने तमिल राजनीति के पुराने शतरंज को उलटकर रख दिया.
हाथ तो मिले, मगर राजनीति में दिल कब मिलते हैं ?
सबसे मजेदार बात यह रही कि स्टालिन ने विजय को सलाह दी कि पिछली सरकार पर दोष मत डालिए. राजनीति के गलियारों में इस बयान पर खूब मुस्कुराहटें बिखरीं, क्योंकि यही कला तो भारतीय राजनीति की सबसे पुरानी परंपरा रही है. सत्ता में रहो तो उपलब्धियां गिनाओ और सत्ता से बाहर जाओ तो “विरासत में मिली बदहाली” का राग अलापो.
विजय की जीत ने यह साबित कर दिया कि जनता अब “वंशवाद के वारिसों” से ज्यादा “जमीन से उठे चेहरों” पर भरोसा करने लगी है. फिल्मों का हीरो जब जनता के बीच उतरता है और लोगों की उम्मीदों का किरदार निभाने लगता है, तब पुराने राजनीतिक सितारों की चमक फीकी पड़ने लगती है. तमिलनाडु की राजनीति अब उस मोड़ पर खड़ी है, जहां एमके स्टालिन का अनुभव और विजय की लोकप्रियता आमने-सामने है. फिलहाल तस्वीरों में दिख रही मुस्कान के पीछे सत्ता की बेचैनी साफ झलक रही है. हाथ तो मिले हैं, मगर राजनीति में दिल कब मिलते हैं ?
लेखक: अरूण गंगवार
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