Kalpavas Significance and Rules: यहं आपको कल्पवास से जुड़ी हर जानकारी देंगे कि यह क्या होता है, इसे कैसे रखा जाता है और इसके नियम क्या है.
5 January, 2026
Kalpavas Significance and Rules: हर साल पौष पूर्णिमा से लेकर माघ पूर्णिमा तक प्रयागराज में माघ मेला लगता है. इस समय त्रिवेणी संगम के तट पर श्रद्धालु कल्पवास रखते हैं. इसी तरह, कुंभ, अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ के दौरान भी कल्पवास रखा जाता है. कई लोगों को कल्पवास की जानकारी नहीं होती. आज हम आपको कल्पवास से जुड़ी हर जानकारी देंगे कि यह क्या होता है, इसे कैसे रखा जाता है और इसके नियम क्या है.
क्या है कल्पवाास
कल्प का मतलब होता है समय का लंबा चक्र और वास का मतलब होता है ठहरना. यानी कल्पवाल का मतलब है लंबे समय तक या निश्चित समय तक एक ही जगह पर ठहरना. कल्पवास के दौरान श्रद्धालु अपने घर से दूर संगम के तट पर रहकर साधना करते हैं. पूरे एक महीने क्षद्धालु सांसारिक मोहमाया को त्याग कर भगवान का ध्यान करते हैं. कल्पवास में भक्त संगम में स्नान करके हनुमान चालिसा या रामायण का पाठ करते हैं. इस दौरान मन को काबू में करने के लिए और आध्यात्मिक ऊर्जा पाने के लिए भक्त उपवास करते हैं या शुद्ध सात्विक भोजन करते हैं. वे अपने कपड़े और जरूरी सामान लेकर तट पर ही रहते हैं और वहीं पूरा महीना गुजारते हैं.

कल्पवास के नियम
कल्पवास एक कठिन तपस्या है. माना जाता है कि कल्पवास करने से मोक्ष मिलता है. यह व्यक्ति को संयम और शक्ति देता है और ईश्वर के करीब ले जाता है. कल्पवास के दौरान 21 नियमों को पालन किया जाता है. पहला नियम सत्यवचन है, दूसरा अहिंसा, तीसरा इंद्रियों पर काबू, चौथा सभी जीवों के प्रति दया, पांचवां है ब्रह्मचर्य का पालन, छठा बुराइयों से दूर रहना, सातवां ब्रह्म मुहूर्त में जागना, आठवां जमीन पर सोना, नौवां दिन में तीन प्रार्थना करना, दसवां पूर्वजों को अर्पण करना, ग्यारहवां दान, बारहवां आत्म-चिंतन करते हुए मंत्र जपना, तेरहवां आध्यात्मिक सभाओं में जाना, चौदहवां तय जगह से बाहर न जाना, पंद्रहवां किसी की बुराई न करना, सोलहवां संतों और तपस्वियों की सेवा करना, सत्रहवां मंत्र जपना और भक्ति गीत गाना, अठारहवां दिन में सिर्फ़ एक बार खाना, उन्नीसवां ज़मीन पर सोना, बीसवां गर्मी के लिए आग का इस्तेमाल न करना और इक्कीसवां नियम है देवी-देवताओं की पूजा करना.
कितने दिन तक करते हैं कल्पवास
कल्पवास पौष पूर्णिमा से लेकर माघ पूर्णिमा तक किया जाता है यानी पूरे एक महीने. इसके अलावा भक्त एक रात्रि, तीन रात्रि, 11 दिन, 1 महीने, 3 महीने ,6 महीने , 6 साल या 12 साल के लिए रख सकते हैं. माना जाता है कि कल्पवास करने वाले को इच्छित फल मिलता है और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है. भक्त यह भी मानते हैं कि सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने का फल सिर्फ माघ मेले में कल्पवास करने से मिल जाता है. कल्पवास के लिए पूर देश से साधु संत प्रयागराज में आते हैं और आध्यात्मिक ज्ञान का आदान-प्रदान करते हैं.
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