Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति द्वारा अलग रह रही पत्नी पर आर्थिक नियंत्रण रखना क्रूरता और उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं आता.
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति द्वारा अलग रह रही पत्नी पर आर्थिक नियंत्रण रखना क्रूरता और उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं आता. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने पति के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के मामले को खत्म करने से इनकार कर दिया था. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि जब तक कोई मानसिक या शारीरिक क्षति न हो, तब तक पति द्वारा वित्तीय नियंत्रण रखना क्रूरता नहीं है. न्यायमूर्ति नागरत्ना ने फैसला देते वक्त टिप्पणी की कि भारतीय समाज में अक्सर पुरुष महिलाओं की आय पर नियंत्रण रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसे आधार बनाकर व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए.
न हो कानून का दुरुपयोग
पीठ ने यह भी माना कि यदि पति पत्नी को भेजे गए धन के खर्च का विवरण मांगता है, तो इसे क्रूरता का कृत्य नहीं कहा जा सकता. अदालत के अनुसार, वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानूनों का दुरुपयोग निजी दुश्मनी निकालने के लिए नहीं होना चाहिए. इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वैवाहिक मतभेदों और वास्तविक आपराधिक क्रूरता के बीच एक स्पष्ट रेखा होना आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को शिकायतों से निपटने में अत्यंत सतर्क और सावधान रहना चाहिए और वैवाहिक मामलों से निपटते समय व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना चाहिए. अदालत ने खर्चों को लेकर हुए विवाद पर कहा कि यह वैवाहिक जीवन में आम है.
पति की याचिका पर हुई सुनवाई
कहा कि ऐसे कृत्यों को क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्व न्यायिक निर्णय पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद आरोपी पति के खिलाफ लगाए गए किसी भी आरोप को सिद्ध नहीं किया जा सकता. यह फैसला पति द्वारा 27 अप्रैल, 2023 के उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर आया है, जिसमें उसके और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि फैसले में की गई टिप्पणियां पक्षों के बीच लंबित किसी भी वैवाहिक या अन्य कार्यवाही में बाधा नहीं बनेंगी, जिनका निर्णय उनके अपने गुण-दोष के आधार पर और कानून के अनुसार किया जाएगा.
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