Mental Disorder: भारत के मानसिक स्वास्थ्य पर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. विशेषज्ञों ने बताया कि देश के लगभग 60% मानसिक विकार (Mental Disorder) 35 वर्ष से कम आयु के युवाओं में पाए जा रहे हैं.
Mental Disorder: नई दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित भारतीय मनोचिकित्सा सोसायटी के 77वें वार्षिक सम्मेलन (ANCIPS 2026) में भारत के मानसिक स्वास्थ्य पर चौंकाने वाला खुलासा हुआ. विशेषज्ञों ने बताया कि देश के लगभग 60% मानसिक विकार (Mental Disorder) 35 वर्ष से कम आयु के युवाओं में पाए जा रहे हैं. सम्मेलन में खुलासा हुआ कि मानसिक बीमारियों की शुरुआत की औसत आयु अब महज 19 से 20 वर्ष रह गई है. 28 से 31 जनवरी तक चलने वाले इस कार्यक्रम में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यह संकट किशोरों और युवाओं को तेजी से प्रभावित कर रहा है, जो भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है. सम्मेलन में प्रस्तुत वैश्विक और भारतीय अध्ययनों ने एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है. मॉलिक्यूलर साइकियाट्री पत्रिका में प्रकाशित एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन, जिसमें 7 लाख से अधिक व्यक्तियों पर नज़र रखी गई, से पता चला है कि 34.6 प्रतिशत मानसिक विकार 14 वर्ष की आयु से पहले, 48.4 प्रतिशत 18 वर्ष की आयु से पहले और 62.5 प्रतिशत 25 वर्ष की आयु तक शुरू हो जाते हैं.
युवाओं में बढ़ता जा रहा मानसिक संकट का ग्राफ
ये निष्कर्ष बताते हैं कि अधिकांश रोगियों के लिए मानसिक बीमारी वयस्कता से बहुत पहले शुरू हो जाती है, जो चुपचाप उनके शैक्षिक परिणामों, करियर पथ, रिश्तों और जीवन को प्रभावित करती है. विशेषज्ञों ने बताया कि 25 वर्ष की आयु तक ध्यान का अभाव, चिंता और खाने संबंधी विकारों के अधिकांश मामले सामने आ चुके होते हैं. इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी ने चेतावनी दी है कि जब मानसिक विकार शुरुआती अवस्था में होते हैं तो वे अक्सर दीर्घकालिक हो जाते हैं. एएनसीआईपीएस दिल्ली के आयोजन सचिव और होप केयर इंडिया के निदेशक डॉ. दीपक रहेजा ने कहा कि जब 60 प्रतिशत मानसिक विकार 35 वर्ष से कम आयु के लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत का मानसिक स्वास्थ्य संकट कहीं अधिक जल्दी सामने आ रहा है. ये वे वर्ष हैं जब युवक पढ़ाई कर रहे होते हैं, अपना करियर बना रहे होते हैं और समाज में योगदान दे रहे होते हैं.
10 सालों में 101.7% बढ़ा मानसिक विकार
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आत्महत्या अब 15 से 29 वर्ष की आयु के युवाओं में मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण है, जिससे युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियां केवल एक चिंता का विषय नहीं बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बन गई हैं. विशेषज्ञों ने इसका कारण शैक्षणिक दबाव, बेरोजगारी, सामाजिक अलगाव, डिजिटल अति-उपयोग, मादक पदार्थों के सेवन और अनसुलझे भावनात्मक कष्ट को बताया है. अध्ययनों से पता चलता है कि 2011 और 2021 के बीच 18 से 25 वर्ष की आयु के युवाओं में बार-बार होने वाली मानसिक परेशानी में 101.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. एएनसीआईपीएस के मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों ने बताया कि कोविड-19 महामारी, आर्थिक अनिश्चितता और बदलती सामाजिक संरचनाओं ने इस आयु वर्ग में तनाव, चिंता और अवसाद के लक्षणों को और भी तेज कर दिया है. ANCIPS 2026 की आयोजन समिति के अध्यक्ष और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज के पूर्व निदेशक डॉ. निमेश जी देसाई ने कम उम्र में शुरू होने वाली मानसिक बीमारियों को नजरअंदाज करने के गंभीर परिणाम बताए.
भविष्य में मानसिक समस्याएं और बढ़ने की चेतावनी
उन्होंने कहा कि डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग और आभासी दुनिया पर निर्भरता भविष्य में मानसिक समस्याओं को और बढ़ाएगी. भारत में बढ़ते मामलों का एक मुख्य कारण समय पर उपचार के प्रति जागरूकता की कमी है. यदि युवावस्था में शुरू होने वाले मानसिक विकारों का जल्दी इलाज न किया जाए, तो वे अक्सर जीवन भर बने रहते हैं. इसका प्रभाव न केवल व्यक्ति पर बल्कि परिवारों, कार्यस्थलों और समाज पर भी पड़ता है. इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि तेज सामाजिक परिवर्तन ने युवाओं के जीवन को काफी हद तक बदल दिया है. उन्होंने कहा कि आज के युवा तीव्र शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा, निरंतर डिजिटल तुलना, कनेक्टिविटी के बावजूद अकेलापन और रोजगार व रिश्तों के बारे में अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं.
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News Source: Press Trust of India (PTI)
