Cyber Fraud: दिल्ली हाईकोर्ट ने 640 करोड़ के साइबर धोखाधड़ी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दो चार्टर्ड अकाउंटेंटों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी.
Cyber Fraud: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को 640 करोड़ के साइबर धोखाधड़ी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दो चार्टर्ड अकाउंटेंटों भास्कर यादव और अशोक कुमार शर्मा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी. न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने अपने फैसले में कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग का यह जाल बेहद जटिल है. अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की दलील को सही माना कि अपराध की आय को कई स्तरों पर छुपाने की साजिश का खुलासा करने के लिए आरोपियों से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है. कोर्ट के अनुसार, आरोपी पेशेवर रूप से कुशल हैं. इसलिए मामले की तह तक जाने के लिए उनकी कस्टडी जरूरी है. सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान मामला केवल क्रिप्टोकरेंसी लेनदेन तक सीमित नहीं है, जो कि भारत में अपने आप में अपराध नहीं है. अदालत के अनुसार, आरोपियों की जिम्मेदारी केवल टैक्स चुकाने तक सीमित नहीं मानी जा सकती, क्योंकि यह मामला मध्यम वर्ग के भोले-भाले निवेशकों के साथ हुई एक व्यापक और जटिल धोखाधड़ी की ओर इशारा करता है.
हिरासत में पूछताछ जरूरी
अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए भी ‘देश की अर्थव्यवस्था’ के व्यापक हितों पर जोर दिया. कोर्ट ने कहा कि निवेशकों के धन की सुरक्षा और मामले की तह तक जाने के लिए गहन जांच आवश्यक है. इसके अतिरिक्त अदालत ने आरोपियों पर लगे गंभीर आरोपों पर संज्ञान लिया, जिनमें जांच अधिकारियों पर हमला करना, स्थानीय पुलिस को रिश्वत देना और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को नष्ट करना शामिल है. इन नई शिकायतों ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है, जिससे सार्थक पूछताछ की आवश्यकता अनिवार्य हो गई है. अदालत ने आगे कहा कि जांच आयोग को अपनी जांच में बैंक अधिकारियों की भूमिका का भी पता लगाना होगा. अदालत ने टिप्पणी की कि यह पीड़ितों की मेहनत की कमाई है, जिनकी एकमात्र गलती यह थी कि वे निवेश के माध्यम से अपने पैसे को बढ़ाना चाहते थे. उनकी इस इच्छा का कुछ धोखेबाजों ने फायदा उठाया और उन्हें विभिन्न योजनाओं में निवेश करने के लिए लुभाया, जो वास्तव में धोखाधड़ी वाली थी.
मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नहीं मिली राहत
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर यह अदालत संतुष्ट हो सके कि उनके जमानत पर रहते हुए कोई अपराध करने की संभावना नहीं है. इसलिए, ये दोनों अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज की जाती हैं. ईडी ने पहले एक बयान में कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग की जांच दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज की गई दो एफआईआर से शुरू हुई है, जो सट्टेबाजी, जुआ, नौकरियों और फिशिंग घोटालों से उत्पन्न 640 करोड़ रुपये के साइबर धोखाधड़ी पर दर्ज की गई थी. जांच एजेंसी के अनुसार, आरोप है कि यह घोटाला कुछ चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी और क्रिप्टो व्यापारियों के एक गठबंधन के माध्यम से चलाया जा रहा था, जो अपराध की आय को वैध बनाने के लिए मिलकर काम करते थे.
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News Source: Press Trust of India (PTI)
