Home Latest News & Updates उत्तराखंड में जनगणना के लिए ‘खास प्लान’: 1500 ‘घोस्ट विलेज’ बनेंगे चुनौती, खाली घरों की एक महीने तक निगरानी

उत्तराखंड में जनगणना के लिए ‘खास प्लान’: 1500 ‘घोस्ट विलेज’ बनेंगे चुनौती, खाली घरों की एक महीने तक निगरानी

by MayankRai
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उत्तराखंड में जनगणना के लिए 'खास प्लान':1500 'घोस्ट विलेज' बनेंगे चुनौती, खाली घरों की एक महीने तक होगी निगरानी

Uttarakhand Census: उत्तराखंड में जनगणना का पहला चरण इसी अप्रैल में शुरू होने जा रहा हैं. सरकारी स्तर पर तैयारी भी पूरी कर ली गई है.

Uttarakhand Census: उत्तराखंड में जनगणना का पहला चरण इसी अप्रैल में शुरू होने जा रहा हैं. सरकारी स्तर पर तैयारी भी पूरी कर ली गई है लेकिन इन सबके बीच सवाल यह उठ रहा है कि उन ‘घोस्ट विलेज’ की गिनती कैसे होगी जो सालों से खाली पड़े हैं. राज्य गठन के बाद पहाड़ के कई गांव देखते ही देखते पूरी तरह खाली हो चुके हैं. उत्तराखंड में रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण हजारों गांव खाली हो चुके हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ‘घोस्ट विलेज’ कहते हैं. ‘घोस्ट विलेज’ (Ghost Village) या भूतिया गांव का मतलब ऐसे गांवों से है जो पूरी तरह से वीरान, सुनसान और उजाड़ हो चुके हैं, जहां अब कोई इंसान नहीं रहता.

सुपरवाइजर करेंगे ‘भूतिया गांवों’ का सर्वे

2018 तक यह सरकारी आंकड़ा 734 था लेकिन अब इसकी संख्या 1500 के करीब पहुंच चुकी है. जिसमें सबसे अधिक खाली हुए गांवों की संख्या उस जनपद पौड़ी की है जिसने प्रदेश को चार मुख्यमंत्री दिए. इस बीच जनगणना के प्रथम चरण में घरों की गिनती होनी है. विभाग दावा कर रहा है कि इसके लिए व्यवस्था की गई है और हर गांव में खाली पड़े घरों का सर्वे कराया जाएगा. जनगणना विभाग द्वारा खाली पड़े गांवों के लिए सुपरवाइजर की नियुक्ति की जाएगी. हर खाली घर की एक महीने तक मॉनिटरिंग होगी अगर कोई मिला तो उस घर को काउंटिंग में शामिल कर लिया जाएगा. वहीं कोई नहीं आया तो उस घर को खाली घर में शामिल कर लिया जाएगा. हालांकि, राज्य मामलों के जानकार इसे व्यर्थ की कवायद मान रहे हैं.

मकानों की मैपिंग में लगाए गए कर्मचारी

खुद पौड़ी जिले के रहने वाले पहाड़ मामलों के जानकार राजीव थपलियाल का कहना है कि जो घर सालों से खाली पड़े हैं, पूरा का पूरा गांव खाली है वहां किसी तरह का प्रयास किया जाना भी सरकारी धन और सरकारी तंत्र का फिजूल इस्तेमाल हो साबित होगा. रोजगार के लिए अपने गांव के घरों से दूर जा चुके लोगों का वापस आना मुश्किल है क्योंकि अब उनके घर और गांव पूरी तरह वीरान हो चुके हैं. अब लोग उन गांवों को बस देखने आते हैं कि ये इलाका कभी कैसा रहा होगा. बहरहाल, जनगणन विभाग द्वारा तमाम कर्मियों को मकानों की मैपिंग में लगाया तो जरूर जा रहा है लेकिन यक्ष प्रश्न यही है कि क्या सालों से खाली पड़े गांव और घरों का सही सही आंकड़ा मिल पाएगा.

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