Forgotten Indian sarees: अगर आप भी उन लड़कियों में से हैं, जिन्हें साड़ी पहनना बहुत पसंद है, तो आज आपके लिए भारत की वो भूली-बिसरी साड़ियां लाए हैं, जो फिर से फैशन में आनी चाहिएं.
19 march, 26 march
किसी भी इंडियन वेडिंग में चले जाइए, आपकी आंखें भारी कांजीवरम और चमचमाती बनारसी साड़ियों की चमक से चौंधिया जाएंगी. हमें ये साड़ियां पसंद हैं, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के हैंडलूम इतिहास की असली नींव इन भारी सिल्क की साड़ियों पर नहीं, बल्कि उन साड़ियों पर टिकी थी जो बहुत कंफर्टेबल, लोकल और स्मार्ट थीं? अफसोस की बात ये है कि सस्ते सिंथेटिक कपड़ों और मशीनों की बाढ़ में हमारी सैकड़ों ऐतिहासिक बुनाइयां कहीं खो गई हैं. फास्ट फैशन हमें खुशी तो दे सकता है, लेकिन ये हमारी विरासत की कीमत पर आ रहा है. ऐसे में आज हम आपके लिए वो 7 मास्टरपीस लेकर आए हैं, जिन्हें आज के दौर में फिर से ट्रेंड में लाने की जरूरत है.

कुनबी चेक-गोवा
जब आप गोवा के बारे में सोचते हैं, तो आपके दिमाग में खूबसूरत बीच की तस्वीरें आती हैं. लेकिन क्या आपने ‘कुनबी’ के बारे में सुना है? आदिवासी समुदायों की ये ट्रेडिशनल लाल और काले चेक वाली साड़ी ‘बैकस्ट्रैप लूम’ पर बुनी जाती थी. महिलाएं इसे छोटा करके पहनती थीं ताकि धान के खेतों में आसानी से काम कर सकें. पुर्तगाली शासन के ड्रेस कोड और मॉर्डन मशीनों ने इसे लगभग खत्म ही कर दिया था. आज बहुत कम बुनकर इस टेक्निक को जानते हैं, जबकि इसका मिनिमलिस्ट पैटर्न मॉडर्न फैशन के लिए एकदम परफेक्ट है.

सिद्दिपेट गोल्लाभामा-तेलंगाना
ये साड़ी कपड़े पर कहानी कहती है. इसमें एक ‘गोल्लाभामा’ यानी एक दूध बेचने वाली महिला की खूबसूरत तस्वीरें बनी होती हैं जो सिर पर मटका ले जा रही होती हैं. खास बात ये है कि ये कोई बाद में की गई कढ़ाई नहीं है, बल्कि बुनकर इसे कपड़े की बुनाई के साथ ही धागों से तैयार करते हैं. ये काम बहुत मेहनत और बारीकी मांगता है. आज के दौर में इनके कारीगरों को इस मेहनत की सही कीमत नहीं मिल रही है, जिसकी वजह से नई पीढ़ी इस आर्ट से दूर हो रही है.
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औरंगाबाद का हिमरू
मुगल काल की जड़ों से जुड़ा ‘हिमरू’ सिल्क और कॉटन का शानदार कॉम्बिनेशन है. फारसी शब्द ‘हम-रूह’ का अर्थ है ‘समान’, यानी जो प्योर रेशम जैसा दिखे. ये आपको भारी ब्रोकेड जैसा रॉयल लुक देता है. वहीं, कॉटन की वजह से भारत की चिलचिलाती गर्मी से भी बचाता है. आज बाजार में असली हिमरू की जगह मशीनों पर बनी सस्ती कॉपी बिक रही हैं, जो इस आर्ट को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं.

गुजरात का मशरू
पाटन, गुजरात के कारीगरों ने ‘मशरू’ का इन्वेंशन एक खास वजह से किया था. दरअसल, धार्मिक नियमों के मुताबिक, रेशम को सीधे स्किन से छूने की परमिशन नहीं थी. तब कारीगरों ने एक रास्ता निकाला, जिसमें कपड़े के बाहर की तरफ शानदार रेशम हो और अंदर की तरफ मुलायम सूत यानी कॉटन. ये कंफर्ट और लक्जरी का शानदार कॉम्बिनेशन है. हालांकि असली हाथ से बुना हुआ मशरू अब मिलना बहुत मुश्किल है.

महाराष्ट्र की करवत काटी
जब महाराष्ट्र की साड़ियों की बात आती है, तो सबका ध्यान पैठणी पर ही जाता है. वहीं, महाराष्ट्र की ‘करवत काटी’ को अब लोग भूलते जा रहे हैं. प्योर टसर सिल्क से बनी इस साड़ी का नाम इसके ‘आरी के दांत’ यानी करवत जैसे दिखने वाले बॉर्डर से पड़ा है. हालांकि, अब इसे पहनने वालीं और बनाने वाले, दोनों ही कम हैं.

कर्नाटक-पट्टेड़ा अंचू
नॉर्थ कर्नाटक की ये साड़ी 10वीं शताब्दी जितनी पुरानी है. ये साड़ी टिकाऊ फैशन का बेहतरीन एग्जांपल है. इसके बोल्ड मस्टर्ड या लाल बॉर्डर और चेक वाली बॉडी इसकी खासियत है. सबसे अच्छी बात ये है कि इस साड़ी को दोनों तरफ से पहना जा सकता है. यानी ये ‘रिवर्सिबल’ है. इसके अलावा इसमें न फॉल की जरूरत है, न लाइनिंग की और न ही प्रेस की. सिंथेटिक साड़ियों के आने से ये साड़ी बाजारों से गायब हो गई. हालांकि, ईको-फ्रेंडली फैशन के हिसाब से इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता.
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