Introduction
17 March, 2026
Mastani Mahal: इतिहास की कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो महलों की ऊंची दीवारों और धूल भरी पुरानी फाइलों से निकलकर लोक-कथाओं, गीतों और हमारे दिलों की गहराई तक पहुंच जाती हैं. जब हम मराठा साम्राज्य के शानदार इतिहास की बात करते हैं, तो दिमाग में सबसे पहला नाम आता है ‘श्रीमंत पेशवा बाजीराव प्रथम’ का. ये वो योद्धा था जिसने 41 लड़ाइयां लड़ीं, जिनमें से एक भी नहीं हारी. लेकिन कभी ना हारने वाले इस सेनापति की कहानी तब तक अधूरी है, जब तक उसमें ‘मस्तानी’ का जिक्र न आए. पुणे की भीड़ भाड़ वाली गलियों और शोर के बीच एक ऐसा कोना है, जहां ये महान और विवादों में घिरी लव स्टोरी आज भी सुनाई जाती है. हम बात कर रहे हैं पुणे के फेमस ‘राजा दिनकर केलकर संग्रहालय’ में बने ‘मस्तानी महल’ के बारे में. ये महल सिर्फ ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि एक प्यार भरे दिल का वो समर्पण है जिसे उस टाइम के समाज ने ठुकरा दिया था. ऐसे में आज हम आपको उस सुहाने सफर पर ले चलेंगे, जहां की हवाओं में मस्तानी की पायल की झंकार और बाजीराव की वीरता के किस्से आज भी महसूस होते हैं.

Table of Content
- कौन थीं मस्तानी?
- अलग महल का फैसला
- महल की खूबसूरती
- मलबे से निकाला इतिहास
- जादुई दुनिया का दीदार
- अधूरा प्यार और विरासत
कौन थीं मस्तानी?
मस्तानी महल की चौखट पर कदम रखने से पहले उसके बारे में जानना जरूरी है, जिसके लिए इस महल की हर लकड़ी और पत्थर तराशा गया था. दरअसल, मस्तानी बाई बुंदेलखंड के महान राजपूत राजा महाराजा छत्रसाल की बेटी थीं. उनकी मां ‘रुहानी बाई’ एक फारसी बेगम थीं. यही वजह है कि मस्तानी की पर्सनेलिटी में राजपूतों का शौर्य और फारस की नजाकत का दिखती थी. मस्तानी सिर्फ एक सुंदर चेहरा नहीं थीं, बल्कि वो एक बेहतरीन घुड़सवार और तलवारबाज भी थीं. लड़ाई के मैदान में वो बाजीराव के कंधे से कंधा मिलाकर चलती थीं. साथ ही, वो म्यूज़िक, डांस और लिटरेचर की भी अच्छी समझ रखती थीं. साल 1728-29 में जब बाजीराव ने मुगल सेनापति मोहम्मद खान बंगश के खिलाफ महाराजा छत्रसाल की मदद की, तो छत्रसाल ने अपनी बेटी मस्तानी का हाथ बाजीराव को सौंप दिया. यहीं से शुरू हुई वो दास्तां, जिसने पुणे के पेशवा दरबार में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया. वैसे, ये सारी जानकारी हमें संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी में भी मिली, जिसमें रणवीर सिंह ने पेशवा बाजीवार का और दीपिका पादुकोण ने मस्तानी का रोल किया है. साल 2015 में रिलीज़ हुई इस फिल्म में बॉलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा ने बाजीराव की पत्नी काशीबाई का रोल किया है. 140 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस खूबसूरत फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 350 करोड़ रुपये का बिजनेस किया है.
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अलग महल बनाने का फैसला
बाजीराव पहले से ही ‘काशीबाई’ के साथ शादीशुदा थे. इसके अलावा पेशवा परिवार और पुणे का ब्राह्मण समाज मस्तानी को कभी स्वीकार नहीं कर पाया. उनके खान-पान, उनके आउटफिट्स और मस्तानी के धार्मिक बैकग्राउंड को लेकर पेशवा परिवार में कलह रहने लगी. मस्तानी को ‘शनिवार वाड़ा’ जो पेशवाओं का मेन किला था, उसके अंदर रहने की परमिशन नहीं दी गई. उन्हें हमेशा एक डांसर या दूसरी औरत की तरह ही देखा गया. बाजीराव, जो सात फीट लंबे एक निडर योद्धा थे, अपनी पर्सनल लाइफ में अपनों से ही हार रहे थे. अपनी प्यारी मस्तानी को समाज की कड़वी नजरों से बचाने और उन्हें एक रानी जैसा सम्मान देने के लिए, बाजीराव ने पुणे के कोथरुड इलाके में एक अलग और बहुत ही खूबसूरत महल बनवाया. यही वो जगह थी जिसे ‘मस्तानी महल’ कहा गया. ये महल मस्तानी की अपनी रियासत बना, जहां वो बाजीराव सुकून के पल बिताते थे.
महल की खूबसूरती
18वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में ‘वाड़ा’ वास्तुकला बहुत ज्यादा फेमस थी. मस्तानी महल इसी शैली का एक खूबसूरत नमूना था. वाड़ा शैली की खासियत ये होती थी कि इसमें एक बड़ा आंगन होता था, जिसके चारों तरफ नक्काशीदार लकड़ी के खंभों वाले बरामदे और कमरे होते थे. कोथरुड में बना ये महल बहुत बड़ा था. इसमें फव्वारे थे, म्यूज़िक नाइट के लिए खास दीवान-ए-खास था और मस्तानी के रियाज के लिए अलग कमरा भी. इस महल की लकड़ी की नक्काशी मुगल कालीन मेहराबों और राजस्थानी झरोखों से इंस्पायर थी, जो मस्तानी की अपने बुंदेलखंड की याद दिलाता था. लेकिन 1740 में बाजीराव के निधन के बाद, मस्तानी की भी रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई. उनकी मौत को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं. कुछ का कहना हैं कि मस्तानी को शनिवार वाड़ा में कैद किया गया था, तो कुछ का मानना है कि बाजीराव के गम में उनका दिल टूट गया और उनकी मौत हो गई. उनके जाने के बाद, ये महल लावारिस सा हो गया. पेशवा प्रशासन ने मस्तानी के वजूद को मिटाने की कोशिश में महल की देखभाल बंद कर दी और धीरे-धीरे वक्त की धूल ने इस इमारत को खंडहर बना दिया.

मलबे से निकाला इतिहास
आज अगर हम मस्तानी महल को देख पा रहे हैं, तो उसका पूरा क्रेडिट डॉ. दिनकर गोविंद केलकर को जाता है. डॉ. केलकर एक फेमस संग्राहक थे. 20वीं सदी के बीच में जब कोथरुड का मेन महल ढहने की कगार पर था और उसे पूरी तरह जमींदोज करने की तैयारी थी, तब डॉ. केलकर वहां पहुंचे. उन्होंने देखा कि महल की कीमती लकड़ी की नक्काशी और ऐतिहासिक पिलर्स को लोग जलाने या कचरे में फेंकने वाले थे. डॉ. केलकर ने अपनी पूरी जमापूंजी लगाकर उन अवशेषों को खरीदा. उन्होंने बड़ी सावधानी से लकड़ी के एक-एक पैनल, छत के टुकड़ों और खंभों को अलग करवाया और उन्हें ट्रक में लादकर अपने म्यूज़ियम यानी शुक्रवार पेठ में ले आए. वहां उन्होंने इन अवशेषों का इस्तेमाल करके मस्तानी महल के एक हिस्से को बिल्कुल उसी पुराने अंदाज में फिर से खड़ा किया, जैसे कभी वो हुआ करता था. ये दुनिया में अपनी तरह का इकलौता उदाहरण है जहां एक पूरे महल के कमरे को एक म्यूज़ियम के अंदर रिकंस्ट्रक्ट किया गया हो.
जादुई दुनिया का दीदार
राजा दिनकर केलकर म्यूज़ियम के अंदर मस्तानी महल का कमरा आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाता है. जैसे ही आप इसके अंदर कदम रखते हैं, आपको सागवान की पुरानी लकड़ी की हल्की भीनी महक आती है. इसके बाद आपकी नज़र नक्काशीदार छत और पिलर्स पर पड़ती है. कमरे की छत पूरी तरह से लकड़ी की बनी है, जिसमें बहुत बारीक और खूबसूरत नक्काशी की गई है. इसके खंभे शिल्प शास्त्र के नियमों के मुताबिक बनाए गए हैं, जो ऊपर की तरफ जाते हुए कलश की तरह दिखते हैं. इस कमरे का सबसे अट्रैक्टिव हिस्सा है मस्तानी का असली चांदी का आईना. इसे देखकर आपको खुशी होती है. शायद ये सोचकर कि कभी इस आईने ने मस्तानी की खूबसूरती और मुस्कान को कैद किया होगा. इसके पास ही उस दौर के कुछ इंस्ट्रूमेंट्स रखे हैं, जो दिखाते हैं कि मस्तानी कितनी बड़ी आर्ट और म्यूज़िक लवर थीं. साथ ही इस कमरे के फर्श पर मखमली कालीन और मसनद बिछे हैं. ऊपर कांच के एंटीक झाड़-फानूस लटके हैं. खिड़कियों पर लगी लकड़ी की जालियों से जब रोशनी छनकर कमरे में आती है, तो ऐसा लगता है जैसे समय ठहर गया हो.
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अधूरा प्यार और विरासत
मस्तानी महल को देखना एक कड़वा और मीठा एक्सपीरियंस है. मीठा इसलिए क्योंकि हम उस महान प्रेम कहानी के गवाह बनते हैं और कड़वा इसलिए क्योंकि ये हमें उस महल के विनाश की भी याद दिलाता है जो कभी बहुत ग्रेंड और खूबसूरत हुआ करता था. वैसे भी, डॉ. केलकर ने जो बचाया, वो सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है. असली महल का एक बड़ा हिस्सा आज कंक्रीट के जंगलों के नीचे दब चुका है. वैसे, ये महल हमें याद दिलाता है कि पेशवा बाजीराव ने मस्तानी के लिए जो लड़ाई लड़ी, वो सिर्फ सीमाओं को बढ़ाने के लिए नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान और अपने प्यार को समाज में जगह दिलाने के लिए भी थी. वहीं, मस्तानी के मरने के बाद उनके बेटे ‘शमशेर बहादुर’ को भी पेशवा परिवार ने काफी संघर्ष के बाद अपनाया था, जिन्होंने बाद में पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा साम्राज्य के लिए लड़ते हुए अपनी जान दे दी थी. आज के टाइम में जब हम प्यार और रिश्तों को बहुत जल्दी में जीते हैं, मस्तानी महल हमें पेशेंस और कमिटमेंट की कहानी सुनाता है. ये महल पुणे की संस्कृति का एक ऐसा हिस्सा है, जिसे देखे बिना पुणे की जर्नी अधूरी रहती है.

Conclusion
पुणे का ये मस्तानी महल हमें सिखाता है कि टाइम कितना भी मुश्किल क्यों न हो, सच्ची आर्ट और सच्चा प्यार अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है. कुछ लोगों की बदौलत आज भी बाजीराव और मस्तानी की यादें इन लकड़ी की नक्काशी में महक रही हैं. ये महल चीख-चीख कर कहता है कि इतिहास सिर्फ राजाओं की जीत और हार का नाम नहीं है, बल्कि उन इमोशन्स का भी नाम है जो समाज की बेड़ियों को तोड़कर अपनी जगह बनाते हैं. यानी अगली बार जब आप पुणे की सड़कों पर घूमें, तो उस खामोश महल को जरूर याद कीजिएगा, जिसने एक महान योद्धा की सबसे बड़ी कमजोरी और उसकी सबसे बड़ी ताकत, यानी उनकी ‘मस्तानी’ को पनाह दी थी. इसके अलावा अगर आप एक सोल ट्रैवलर हैं, इतिहास के शौकीन हैं या बस पुणे की संस्कृति को करीब से महसूस करना चाहते हैं, तो ये महल आपकी लिस्ट में सबसे ऊपर होना चाहिए.
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