Economic Survey: भारत को 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने के लिए आर्थिक सर्वेक्षण ने कृषि क्षेत्र में बुनियादी सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया है.
Economic Survey: भारत को 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने के लिए आर्थिक सर्वेक्षण ने कृषि क्षेत्र में बुनियादी सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया है. वर्तमान में यह क्षेत्र राष्ट्रीय आय का लगभग 20% हिस्सा है, लेकिन देश का 46.1% कार्यबल इस पर निर्भर है, जो उत्पादकता की बड़ी चुनौती को दर्शाता है. सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि विकास की गति बनाए रखने के लिए उर्वरक क्षेत्र में सुधार, अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश, मजबूत सिंचाई प्रणालियों और फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना अनिवार्य है.
सरकार का लक्ष्य खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाना है ताकि यह देश की समग्र विकास दर का मुख्य इंजन बन सके.स्थिर कीमतों पर पिछले पांच वर्षों में इस क्षेत्र ने औसतन 4.4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है, जिसमें पशुधन और मत्स्य पालन ने अग्रणी भूमिका निभाई है. वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई. संसद में पेश किए गए सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए कहा गया है कि विकसित भारत की प्राप्ति समावेशी विकास को गति देने और लाखों लोगों की आजीविका में सुधार लाने में कृषि की केंद्रीय भूमिका होगी.
दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन में उल्लेखनीय प्रगति
हालांकि, सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन से कई गंभीर चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, जिनमें अनियमित मौसम पैटर्न, बढ़ते तापमान और फसल पैदावार को प्रभावित करने वाली चरम घटनाएं शामिल हैं. मानसून की बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में जल संकट गंभीर बना हुआ है. हालांकि भारत की कृषि वृद्धि वैश्विक औसत 2.9 प्रतिशत से अधिक रही है, फिर भी अनाज, मक्का, सोयाबीन और दालों सहित कई फसलों की पैदावार वैश्विक औसत से पीछे है. 2001-02 में कुल सिंचित क्षेत्र कुल फसल क्षेत्र का 41.7 प्रतिशत था, जो 2022-23 में बढ़कर 55.8 प्रतिशत हो गया है.
हालांकि, राज्यों और फसलों के बीच महत्वपूर्ण असमानताएं बनी हुई हैं, जहां सिंचाई कवरेज बाजरा के लिए 15 प्रतिशत से कम से लेकर धान के लिए लगभग 67 प्रतिशत तक है. सर्वेक्षण के अनुसार, उर्वरकों का उपयोग अभी भी अप्रभावी है. हाल के वर्षों में नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटेशियम अनुपात में गिरावट आई है, जिसका मुख्य कारण नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों की कीमतों में विकृतियां हैं. भारत ने दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन और बागवानी उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है, जो जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.
डेयरी क्षेत्र में चारे की कमी चिंताजनक
सर्वेक्षण में कहा गया है कि सिंचाई, डिजिटल विस्तार, बेहतर भंडारण और सहकारी समितियों तथा मूल्य शृंखलाओं के सुदृढ़ीकरण में प्रगति के कारण भारतीय कृषि नए अवसरों के दौर में प्रवेश कर रही है. फिर भी छोटे भू-जोत, जलवायु जोखिम, उत्पादकता में अंतर और कमजोर बाजार जैसी चुनौतियां किसानों की आय पर लगातार प्रभाव डाल रही हैं. सर्वेक्षण में कहा गया है कि आगे बढ़ने के लिए गहन सुधारों, जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने, किसान और पशु संगठनों को सशक्त बनाने, बाज़ार और लॉजिस्टिक्स में सुधार करने की आवश्यकता है. इसमें कहा गया है कि निरंतर निवेश और नवाचार के साथ कृषि अधिक लचीली, प्रतिस्पर्धी और आय बढ़ाने वाली बन सकती है.
इसमें आगे कहा गया है कि खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स और उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मजबूत करना घरेलू और निर्यात बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए महत्वपूर्ण होगा. इसमें कहा गया है कि बागवानी, कृषि वानिकी, डेयरी, मुर्गी पालन और मत्स्य पालन जैसे उच्च विकास वाले क्षेत्रों का विस्तार समावेशी आर्थिक विकास और रोजगार सृजन, विशेष रूप से ग्रामीण समुदायों को और अधिक समर्थन दे सकता है. सर्वेक्षण में आगे कहा गया है कि हालिया प्रगति के बावजूद डेयरी क्षेत्र चारे की कमी का सामना कर रहा है.
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News Source: Press Trust of India (PTI)
