Home Latest News & Updates झारखंड में ग्रामीण हुनर का बढ़ा गौरवः भागैया और कुचाई सिल्क समेत 4 उत्पाद अब नजर आएंगे वैश्विक मंच पर

झारखंड में ग्रामीण हुनर का बढ़ा गौरवः भागैया और कुचाई सिल्क समेत 4 उत्पाद अब नजर आएंगे वैश्विक मंच पर

by Sanjay Kumar Srivastava 14 June 2026, 12:51 PM IST (Updated 14 June 2026, 12:52 PM IST)
14 June 2026, 12:51 PM IST (Updated 14 June 2026, 12:52 PM IST)
झारखंड में ग्रामीण हुनर का बढ़ा गौरवः भागैया और कुचाई सिल्क समेत 4 उत्पाद अब नजर आएंगे वैश्विक मंच पर

GI Tag: झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ग्रामीण कारीगरी को एक बड़ी कामयाबी मिली है. राज्य के चार प्रमुख उत्पादों भागैया सिल्क, कुचाई सिल्क, मुंडा ज्वेलरी और बांस शिल्प को प्रतिष्ठित ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशन’ (GI) टैग प्रदान किया गया है. नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (NABARD) ने इसे राज्य के बुनकरों और कारीगरों के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है.

बांस शिल्प को मिली नई पहचान

नाबार्ड के अनुसार, यह सफलता स्वयं सहायता समूहों, किसानों और सरकारी विभागों के साथ कई वर्षों के केंद्रित प्रयासों का परिणाम है. विशेष रूप से, झारखंड के बांस शिल्प को इस सूची में शामिल करने से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस से बेहद खूबसूरत और उपयोगी सामान बनाने वाले ग्रामीण कलाकारों के हुनर को नई पहचान मिलेगी.

यह जीआई टैग राज्य की अनोखी पारंपरिक विरासत को सुरक्षित रखने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा. NABARD ने दावा किया कि उसने इन पारंपरिक उत्पादों की खासियतों की पहचान करने, उत्पादकों को संगठित करने, वैल्यू चेन को मजबूत करने, डॉक्यूमेंटेशन में मदद करने, संबंधित पक्षों के साथ बातचीत में सुविधा देने और GI रजिस्ट्रेशन की पूरी प्रक्रिया के दौरान जरूरी मदद और मार्गदर्शन देने में अहम भूमिका निभाई. भागैया सिल्क और कुचाई सिल्क को मिली पहचान से झारखंड की समृद्ध रेशम उत्पादन परंपराओं पर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान गया है.

रोजगार को मिलेगा बढ़ावा

बयान में कहा गया है कि स्थानीय ज्ञान और पारंपरिक कारीगरी पर आधारित ये रेशम की किस्में ग्रामीण समुदायों में पीढ़ियों से चली आ रही कुशलता को दर्शाती हैं. GI स्टेटस से इनकी असलियत को सुरक्षित रखने, बाज़ार में इनकी पहचान बढ़ाने और उत्पादकों को अपने उत्पादों के लिए बेहतर दाम पाने में मदद मिलेगी. बयान में कहा गया कि इसी तरह, मुंडा आभूषणों को मिली GI पहचान मुंडा आदिवासी समुदाय की खास कलात्मक परंपराओं का सम्मान करती है. अपने अनोखे डिज़ाइन, कारीगरी और सांस्कृतिक महत्व के कारण ये आभूषण झारखंड की समृद्ध आदिवासी विरासत को दर्शाते हैं. GI टैग इस पारंपरिक ज्ञान को बचाने और आदिवासी कारीगरों के लिए बेहतर रोज़गार के अवसर पैदा करने में मदद करेगा.

झारखंड की बांस की कारीगरी को शामिल करने से उन ग्रामीण कारीगरों की रचनात्मकता और हुनर ​​को मान्यता मिलती है जो स्थानीय रूप से उपलब्ध बांस से कई तरह के उपयोगी और सजावटी उत्पाद बनाते हैं. इससे राज्य भर में बांस के कारीगरों के लिए टिकाऊ रोज़गार को बढ़ावा मिलने, उद्यम विकास को प्रोत्साहित करने और बाज़ार तक पहुंच मजबूत होने की उम्मीद है. नाबार्ड ने कहा कि उसने पिछले कुछ वर्षों में क्लस्टर विकास, उत्पादक संस्थाओं को मजबूत करने, कौशल विकास, डिज़ाइन में सुधार, बाज़ार से जोड़ने की पहल और ब्रांडिंग में मदद के ज़रिए स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक कारीगरी और ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम किया है.

GI पहचान झारखंड के लिए गर्व की बात

नाबार्ड के झारखंड रीजनल ऑफिस की चीफ जनरल मैनेजर दीपमाला घोष ने कहा कि GI पहचान झारखंड के लिए गर्व की बात है, क्योंकि ये उत्पाद राज्य की समृद्ध पारंपरिक जानकारी, कारीगरी और सांस्कृतिक विरासत को दिखाते हैं. उन्होंने कहा कि GI टैग न केवल ऐसे उत्पादों को पहचान और कमर्शियल वैल्यू देता है, बल्कि युवा पीढ़ी को इन पारंपरिक कलाओं को बनाने के लिए प्रोत्साहित भी करता है, जिससे इनका संरक्षण सुनिश्चित होता है.

उन्होंने बताया कि नाबार्ड प्रदर्शनियों, ग्रामीण हाटों, खरीदार-विक्रेता बैठकों और अन्य मार्केटिंग प्लेटफॉर्म के ज़रिए इन उत्पादों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है. GI रजिस्ट्रेशन से बाजार में इनकी मौजूदगी और मज़बूत होगी और साथ ही राज्य भर के कारीगर समुदायों को फायदा होगा. उन्होंने आगे कहा कि GI पहचान से ब्रांडिंग, एक्सपोर्ट, पर्यटन को बढ़ावा देने और वैल्यू एडिशन के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है. साथ ही, यह भी सुनिश्चित होगा कि इन उत्पादों से होने वाला आर्थिक फायदा सीधे उन समुदायों को मिले जिन्होंने पीढ़ियों से इन परंपराओं को संजोकर और आगे बढ़ाया है.

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News Source: PTI

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