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होसबोले ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को किया नमन, कहा- ‘वंदे मातरम्’ समाज को जोड़ने वाला मंत्र

by Sanjay Kumar Srivastava
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Dattatreya Hosabale

Vande Mataram: RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने पर इसके रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को नमन किया.

Vande Mataram: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने शनिवार को राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने पर इसके रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को नमन किया. उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्र की आत्मा का गीत है, जो आज भी अपने दिव्य प्रभाव से देशभक्ति और राष्ट्रनिष्ठा की भावना जगाने में सक्षम है. होसबोले ने समाज में बढ़ती क्षेत्र, भाषा और जाति आधारित विभाजन प्रवृत्तियों पर चिंता जताते हुए लोगों से ‘वंदे मातरम्’ की भावना को आत्मसात करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि यह गीत समाज को एक सूत्र में जोड़ने की शक्ति रखता है और एकता का प्रतीक है. होसबोले ने कहा कि राष्ट्रीय गीत को भारत में सभी क्षेत्रों, समाज और भाषाओं में सार्वभौमिक स्वीकृति मिली है. उन्होंने कहा कि आज भी यह समाज की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पहचान और एकता की भावना के लिए एक शक्तिशाली आधार के रूप में कार्य करता है.

‘वंदे मातरम’ की भावना को करें आत्मसात

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चेतना के पुनरुद्धार और राष्ट्र निर्माण के इस पावन समय में इस महान मंत्र की भावना को आत्मसात किया जाना चाहिए. आरएसएस महासचिव ने कहा कि 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गाए जाने के बाद वंदे मातरम् देशभक्ति का मंत्र और राष्ट्र की आत्मा बन गया. उन्होंने कहा कि इस मंत्र की व्यापकता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि देश के कई विद्वानों और महान हस्तियों जैसे महर्षि अरबिंदो, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रमण्यम भारती, लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय और अन्य ने अपने समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के शीर्षक में ‘वंदे मातरम’ जोड़ा. उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी भी कई वर्षों तक अपने पत्रों का समापन ‘वंदे मातरम्’ से करते थे. होसबोले ने कहा कि मातृभूमि की वंदना करने वाले और सम्पूर्ण राष्ट्र में चेतना का संचार करने वाले अद्भुत मंत्र वंदे मातरम की रचना की 150वीं वर्षगांठ के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय गीत के रचयिता श्रद्धेय बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता है और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

राष्ट्र की आत्मा बना ‘वंदे मातरम्’

उन्होंने कहा कि टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में 1875 में रचित ‘वंदे मातरम्’ गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था. उन्होंने कहा कि तब से यह गीत न केवल देशभक्ति का मंत्र बन गया है, बल्कि एक राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना की आवाज और राष्ट्र की आत्मा भी बन गया है. होसबोले ने कहा कि इसके बाद ‘वंदे मातरम’ बंगाल विभाजन आंदोलन सहित भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सभी योद्धाओं का नारा बन गया. उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयंसेवकों सहित पूरे समाज से अपील करता है कि वे ‘स्व’ के विचार के आधार पर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय हों और राष्ट्रीय गीत से प्रेरणा लेकर इस अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भाग लें.

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