When India Needed Venezuela Support: अक्सर दोस्ती की मिसालें दी जाती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि सात समंदर पार कोई देश भारत की पुकार पर अपनी पूरी ताकत झोंक दे? ऐसा एक देश है वेनेजुएला, जिसने बिना किसी की परवाह किए भारत का तब साथ दिया, जब किसी को उम्मीद नहीं थी.
23 January, 2026
अक्टूबर 1968 की बात है, इंदिरा गांधी अपनी लैटिन अमेरिकी ट्रिप के अंतिम पड़ाव यानी वेनेजुएला पहुंचीं. उनकी ये जर्नी सिर्फ 18 घंटे की थी, लेकिन वेनेजुएला ने उनके स्वागत में जो किया, वो आज भी याद किया जाता है. प्रोटोकॉल को किनारे रखकर एयरपोर्ट पर खुद राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और कैबिनेट मंत्रियों का पूरा जत्था उनके स्वागत के लिए खड़ा था. दशकों पुरानी ये कहानी सिर्फ दो देशों के कूटनीतिक रिश्तों की नहीं है, बल्कि ये कहानी है उस भरोसे और जज्बे की, जो सात समंदर और दो महाद्वीपों की दूरी को भी छोटा कर देती है. आज जब हम 2026 के ग्लोबल सिनेरियो में भारत की बढ़ती ताकत को देखते हैं, तो हमें उन पुराने दोस्तों को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने उस दौर में हमारा साथ दिया था, जब दुनिया के कई बड़े देश हमसे मुंह मोड़ चुके थे. उन्हीं में से एक दोस्त है, वेनेजुएला.
एक दोस्ती ऐसी भी
अक्सर कहा जाता है कि इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में न कोई परमानेंट दोस्त होता है और न ही दुश्मन. लेकिन भारत और वेनेजुएला के बीच के रिश्तों ने इस कहावत को कई बार चैलेंज किया है. इस अटूट रिश्ते की सबसे मजबूत नींव रखी गई थी साल 1968 में, जब उस टाइम की भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साउथ अमेरिका के रिसोर्सेस से भरे देश की यात्रा की थी. अक्टूबर 1968 का वो टाइम डिप्लोमैटिक हिस्ट्री में दर्ज हो गया. दरअसल, तब इंदिरा गांधी दक्षिण अमेरिका के दौरे पर थीं, जिसमें ब्राजील, चिली, अर्जेंटीना और उरुग्वे जैसे देश शामिल थे. इस दौरे का सबसे खास पड़ाव था वेनेजुएला की राजधानी काराकास. ये जर्नी सिर्फ 18 घंटे की थी. काराकास के ‘साइमन बोलिवर मैकेटिया’ एयरपोर्ट पर वो सीन किसी सेलिब्रेशन से कम नहीं था. आमतौर पर कूटनीतिक प्रोटोकॉल के तहत कुछ चुनिंदा अधिकारी ही स्वागत के लिए आते हैं, लेकिन वेनेजुएला ने सारे कायदे-कानून किनारे रख दिए. एयरपोर्ट पर खुद राष्ट्रपति राउल लियोनी, उप-राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, अटार्नी जनरल और कैबिनेट मंत्रियों का पूरा जत्था खड़ा था. सुरक्षा की जिम्मेदारी खासतौर से वेनेजुएला की महिला कमांडो को सौंपी गई थी.
यह भी पढ़ेंःट्रंप का बड़ा यूटर्न, अब EU देशों पर नहीं लगेगा टैरिफ, ग्रीनलैंड पर बताया असली प्लान
भारत से इम्प्रेस
वेनेजुएला की जनता भारत के आजादी के संघर्ष से बहुत इंस्पायर थी. एयरपोर्ट पर भीड़ इतनी थी कि जर्नलिस्ट और आम लोग इंदिरा गांधी की एक झलक पाने के लिए बेताब थे. इंदिरा गांधी ने भी अपनी सादगी से सबका दिल जीत लिया. उन्होंने प्रोटोकॉल तोड़कर वहां के बच्चों और लोगों से फूल स्वीकार किए. वहां के लोगों के लिए वो किसी सुपरस्टार से कम नहीं थीं. उस वक्त वेनेजुएला के नेशनल टेलीविजन पर जब इंदिरा गांधी की तस्वीरें चलीं, तो लोग उन्हें देखते रह गए. ब्लैक चेक वाली ग्रीन कल की साड़ी, गले में मोतियों की एक सिंपल माला और हाथ में घड़ी पहने इंदिरा गांधी का रूप वेनेजुएला के लोगों के दिलों में बस गया. एक विदेशी ने लिखा था कि उनके ‘इम्पोजिंग स्टैचर’ ने वहां के लोगों को दीवाना कर दिया था. विदेशी जर्नलिस्ट हर्नान लुसेना मोलेरो ने अपनी रिसर्च में लिखा है कि रनवे पर दोनों देशों के झंडे लहरा रहे थे और पत्रकारों की इतनी भीड़ थी कि उन्हें संभालने में सेना के पसीने छूट रहे थे. वेनेजुएला की जनता भारत के स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी के आदर्शों से बहुत ज्यादा इंस्पायर थी. वहां की जनता उनके उत्तराधिकारी के रूप में इंदिरा गांधी को देख रही थी.
यह भी पढ़ेंः भारत का गणतंत्रः आप ने अंकों का ऐसा संगम पहले कभी नहीं देखा! तारीखः 26… दिनः 26 वां… साल 26
जब टीवी पर छाईं इंदिरा
इंदिरा गांधी ने भी अपनी सादगी से वहां के लोगों का दिल जीत लिया. एयरपोर्ट पर ही उन्होंने राष्ट्रपति लियोनी से कहा कि उन्हें लोगों और वहां रहने वाले भारतीय बच्चों से फूल स्वीकार करने दिए जाएं. वेनेजुएला के सरकारी टेलीविजन चैनल OCI ने उस दिन के सीन को लाइव टेलिकास्ट किया. वेनेजुएला के हजारों घरों में उस दिन सिर्फ इंदिरा गांधी की ही बातें हो रही थीं. वेनेजुएला के लोगों के लिए इंदिरा गांधी सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि शक्ति और गरिमा का प्रतीक बन चुकी थीं.
वेनेजुएला बना भारत की ढाल
इंदिरा गांधी के इस दौरे के ठीक 3 साल बाद, 1971 में भारत पर मुसीबत आई. ईस्ट पाकिस्तान, जो अब बांग्लादेश बन चुका है, उस में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के कारण लाखों शरणार्थी भारत आ रहे थे. अमेरिका जैसे देश उस टाइम पाकिस्तान को सपोर्ट कर रहे थे. उस वक्त भारत को इंटरनेशनल सपोर्ट की सख्त जरूरत थी. जब ज्यादातर देशों ने न्यूट्रल रहने का सेफ रास्ता चुना, तब वेनेजुएला भारत के सपोर्ट में मजबूती से खड़ा रहा. वेनेजुएला की नेशनल कांग्रेस (संसद) ने खुद पहल करते हुए एक प्रपोज़ल दिया, जिसमें भारत का समर्थन किया गया और बांग्लादेश के लोगों की आजादी की पुकार को जायज ठहराया गया. इतना ही नहीं, वेनेजुएला ने लेटिन अमेरिकी पार्लियामेंट में भी भारत के पक्ष में माहौल बनाया. क्यूबा के बाद वेनेजुएला ही वो दूसरा देश था जिसने मई 1972 में बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी. ये भारत की विदेश नीति और इंदिरा गांधी के 1968 में बोए गए दोस्ती के बीजों की बहुत बड़ी जीत थी.
यह भी पढ़ेंः दावोस में विश्व आर्थिक मंच: स्वीडिश PM का सख्त संदेश- ग्रीनलैंड पर नाटो नहीं होगा ब्लैकमेल
एक जैसी राय
1970 के दशक में भारत और वेनेजुएला ने वैश्विक मंचों पर भी एक-दूसरे का हाथ थामा. दोनों ही देश साउथ अफ्रीका में चल रहे रंगभेद और नामीबिया पर साउथ अफ्रीका के अवैध कब्जे के सख्त खिलाफ थे. संयुक्त राष्ट्र में दोनों ने मिलकर इन मुद्दों पर आवाज उठाई. इसके अलावा 1960 और 70 के दशक में दोनों देश हथियारों की होड़ के खिलाफ थे. वेनेजुएला का मानना था कि हथियारों पर खर्च होने वाला पैसा डेवलपमेंट में लगना चाहिए और यही भारत की भी नीति थी. फिर 1978 में वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति कार्लोस एंड्रेस पेरेज ने विकासशील देशों को उन महाशक्तियों से सावधान रहने की चेतावनी दी थी जो अपनी मर्जी छोटे देशों पर थोपना चाहती थीं.
मदर टेरेसा का असर
वेनेजुएला में भारतीयों की संख्या कभी बहुत ज्यादा नहीं रही. 1970 के दशक में वहां 100 से भी कम भारतीय रहते थे, जिनमें बिजनेसमैन, टीचर और मिशनरी शामिल थे. लेकिन इस छोटी सी कम्युनिटी ने वहां की इकोनॉमी और सोसाइटी पर गहरी छाप छोड़ी. 1977 तक, मदर टेरेसा की ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ ने वेनेजुएला में 6 सेंटर बना लिए थे. वहां करीब 20 भारतीय नन दिन-रात सेवा में जुटी थीं. खुद मदर टेरेसा ने वहां 10 दिनों का दौरा किया था, जिससे भारत के प्रति वहां के लोगों का सम्मान और बढ़ गया. उसी बीच, भारत के करीब 60 इंजीनियर्स ने वेनेजुएला के बोलिवर राज्य के प्यूर्टो ऑर्डाज शहर में एक बड़ा स्टील प्लांट लगाने में बड़ी भूमिका निभाई. भारत की टेक्निकल एक्सपर्टीज ने वेनेजुएला की इंडस्ट्रीज को आगे बढ़ने में मदद की. हालांकि, बाद में तेल की कीमतों में गिरावट और आर्थिक संकट की वजह से भारतीयों का वहां जाना कम हो गया.
विरासत जो आज भी कायम है
इंदिरा गांधी से शुरू हुआ यह सफर ह्यूगो शावेज और निकोलस मदुरो के दौर तक जारी रहा. राष्ट्रपति शावेज ने साल 2005 में भारत का दौरा किया और भारत को अपना भाई बताया. ऑयल सेक्टर में दोनों देशों के बीच हुए समझौतों ने इस रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. इंदिरा गांधी की वो 18 घंटे की यात्रा सिर्फ एक दौरा नहीं था, बल्कि एक वादे की शुरुआत थी. वेनेजुएला ने साबित किया कि जब भारत को दुनिया के सपोर्ट की जरूरत थी, तो ये देश सबसे पहले अपनी बाहें फैलाकर खड़ा था.
यह भी पढ़ेंः भारत-स्पेन संबंधों में नया अध्याय: आतंकवाद के खिलाफ मुहिम और व्यापारिक रिश्तों में आएगा उछाल
