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हीरा उद्योग संकट में: 50% टैरिफ के बीच बजट से बदलावों की उम्मीद, राहत की आस में आभूषण व्यापारी

by Sanjay Kumar Srivastava
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सूरत का हीरा उद्योग संकट में: 50% टैरिफ के बीच बजट से बदलावों की उम्मीद, राहत की आस में आभूषण व्यापारी

सूरत के रत्न और आभूषण व्यापारी इन दिनों परेशान हैं क्योंकि उन्हें ट्रंप की तरफ से लगाए गए टैरिफ से ज्यादा लागत चुकानी पड़ रही है.

Union Budget 2026: सूरत के रत्न और आभूषण व्यापारी इन दिनों परेशान हैं क्योंकि उन्हें ट्रंप की तरफ से लगाए गए टैरिफ से ज्यादा लागत चुकानी पड़ रही है. इसलिए व्यापारी उम्मीद कर रहे हैं कि आगामी केंद्रीय बजट में उनके लिए भी नीतिगत बदलाव शामिल होंगे ताकि इन व्यवसायों को संकट से बाहर निकाला जा सके. उद्योग जगत के जानकारों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की तरफ से लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ की वजह से रत्न और आभूषण व्यापारियों के कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ा है. विशेषज्ञों का यह भी मानना ​​है कि अधिक मुक्त व्यापार समझौतों से नए निर्यात बाजार खुल सकते हैं और कीमती धातुओं पर ड्यूटी ड्रॉबैक लाभों की बहाली से लागत का दबाव कम हो सकता है. उद्योग जगत को उम्मीद है कि कच्चे हीरों का कारोबार करने वाली कंपनियों पर टैक्स में ढील दिए जाने से भारत विदेशी कंपनियों के लिए अधिक आकर्षक बन जाएगा.

कच्चे हीरों के व्यापार में लाभ कम

वर्तमान में सूरत डायमंड बोर्स क्षेत्र जैसे विशेष अधिसूचित क्षेत्रों में कार्यरत विदेशी खनन और हीरा व्यापार कंपनियों पर सेफ हार्बर ढांचे के तहत टैक्स लगाया जाता है, जिसमें न्यूनतम 4% लाभ मार्जिन माना जाता है. इसका मतलब है कि ऐसी कंपनियों को अपने कारोबार पर कम से कम 4% के अनुमानित लाभ पर टैक्स देना होता है. उद्योग जगत के जानकारों का तर्क है कि कच्चे हीरों के व्यापार में लाभ मार्जिन बहुत कम होता है, जिससे मौजूदा कर संरचना विदेशी कंपनियों के लिए व्यावसायिक रूप से व्यवहारिक नहीं रह जाती है. वे कैरेट टैक्स नाम की बेल्जियम-स्टाइल सिस्टम की मांग कर रहे हैं, जिसके तहत हीरा व्यापारियों पर वास्तविक उतार-चढ़ाव वाले लाभों के बजाय कारोबार से जुड़े मानकीकृत सूत्र के आधार पर टैक्स लगाया जाता है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फरवरी को केंद्रीय बजट पेश करेंगी. इस बजट से रत्न और आभूषण कारोबारी बड़ी उम्मीद लगाए बैठे हैं.

केरल के हथकरघा उद्योग की चिंताः पेशे से दूर भाग रहे यवा

केरल का हथकरघा उद्योग कभी हजारों कुशल कारीगरों की आजीविका का जरिया था. आज कम मजदूरी, कच्चे माल की बढ़ती लागत और सीमित सरकारी मदद की वजह से संकट में है.नतीजा ये है कि कई बुनकर काम छोड़ रहे हैं. युवा पीढ़ी पेशे से दूर भाग रही है. सदियों पुरानी परंपरा धीरे-धीरे गर्त की ओर बढ़ रही है. 30 साल से ज्यादा अनुभव रखने वाले सुकुमारन नायर पेशे के पतन के गवाह हैं. वे कहते हैं कि युवा पीढ़ी को इस पेशे की ओर आकर्षित करने और इसका खोया हुआ सम्मान फिर से पाने के लिए उचित मजदूरी और मजबूत मार्केटिंग अनिवार्य हैं. पारंपरिक बुनकर परिवारों की युवा पीढ़ी की दिलचस्पी इस शिल्प में नहीं है. फिर भी जो लोग इसे जिंदा रखना चाहते हैं, वो कहते हैं कि वे कुछ साल पहले राज्य सरकार की एक पहल की वजह से टिके हुए हैं. इसके तहत सरकारी स्कूलों को हथकरघा बुनकरों से वर्दी खरीदना अनिवार्य है.

कम मजदूरी से मोहभंग

दशकों से इस पेशे में लगे बुनकरों का कहना है कि कम मजदूरी बड़ी रुकावट है. उनका मानना ​​है कि अगर मजदूरी बेहतर हो तो ज्यादा युवा इस पेशे की ओर आकर्षित होंगे. अरविंद उन गिने-चुने युवा उद्यमियों में से हैं जो अब भी हथकरघा क्षेत्र से जुड़े हुए हैं. वे कच्चे माल की बढ़ती लागत और पावरलूम उत्पादों की बढ़ती मांग को इस क्षेत्र की गिरावट की मुख्य वजह बताते हैं. वे कहते हैं कि हथकरघा बुनकर होना अब सम्मानजनक पेशा नहीं रहा. उनका कहना है कि जब तक केंद्र सरकार वित्तीय मदद नहीं करती, तब तक इस धारणा को बदलना मुश्किल है. केरल हैंडलूम बुनकर सहकारी समिति यानी हैंटेक्स के मुताबिक 523 पंजीकृत समितियों में कई निष्क्रिय हो चुकी हैं. हैंटेक्स हथकरघा सहकारी समितियों की सर्वोच्च संस्था है. केरल हथकरघा उद्योग को उम्मीद है कि केंद्रीय बजट में उद्योग में नई जान फूंकने के लिए कदम उठाए जाएंगे.

ये भी पढ़ेंः बदल गई संसद की व्यवस्था: सांसदों को सीट पर ही लगानी होगी हाजिरी, विपक्ष के नेता और मंत्रियों को छूट

News Source: Press Trust of India (PTI)

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