Worlds First Residential University: आज ज्यादातर लोग सपना देखते हैं कि उनके बच्चे पढ़ने के लिए ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसी विदेशी यूनिवर्सटीज़ में जाएं. लेकिन एक टाइम ऐसा भी था जब दुनियाभर के लोग पढ़ने के लिए भारत की तरफ देखते थे.
28 January, 2026
आज जब हम ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज या हार्वर्ड की बात करते हैं, तो हमें लगता है कि पढ़ाई-लिखाई का सारा मॉडर्न सिस्टम वेस्टर्न से ही आया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब यूरोप के लोग ठीक से पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते थे, तब भारत में दुनिया की पहली ‘रेसिडेंशियल यूनिवर्सिटी’ थी. यानी एक ऐसी जगह जहां स्टूडेंट्स और टीचर साथ रहते थे. हम बात कर रहे हैं ऐतिहासिक नालंदा महाविहार की. बिहार का नालंदा सिर्फ एक स्कूल या कॉलेज नहीं था, बल्कि ज्ञान का एक ऐसा समंदर था जहां हजारों स्टूडेंट और टीचर एक साथ रहते, पढ़ते और मुद्दों पर बहस करते थे.

नालंदा कैंपस
नालंदा की स्थापना 5वीं शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के दौरान हुई थी. वैसे तो तक्षशिला भी बहुत पुराना सेंटर था, लेकिन रहने-खाने के अरेंजमेंट वाला पहला कैंपस नालंदा ही था. सोचिए, आज से करीब 1600 साल पहले एक ऐसा कैंपस था जहां लगभग 10 हज़ार स्टूडेंट्स और 2 हज़ार टीचर रहते थे. यहां सिर्फ धर्म की नहीं, बल्कि पॉलिटिक्स, मेडिकल, गणित, एस्ट्रोलॉजी और लॉजिक जैसे सब्जेक्ट्स की भी पढ़ाई होती थी. यहां चीन, कोरिया, जापान और तिब्बत जैसे दूर-दराज के देशों से लोग पढ़ने के लिए आते थे. फेमस चीनी ट्रेवलर ह्वेनसांग ने तो यहां के बारे में इतना कुछ लिखा है कि पढ़कर आज भी हर भारतीय को गर्व होता है.
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कैंपस की खासियत
नालंदा की सबसे खास बात थी इसकी लाइब्रेरी, जिसे ‘धर्मगंज’ कहा जाता था. कहते हैं कि इसमें लाखों पांडुलिपियां यानी हाथ से लिखी किताबें थीं. फिर 12वीं शताब्दी में आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसे जलाया, तो किताबें महीनों तक जलती रहीं. सोचिए, हमारे पास कितना सारा ज्ञान था जो राख हो गया.

विनाश और विरासत
सैकड़ों सालों तक नालंदा के खंडहर मिट्टी में दबे रहे. फिर 19वीं और 20वीं सदी में हुई खुदाई में जब इसके अवशेष बाहर आए, तो दुनिया भी दंग रह गई. इसका स्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग को देखते हुए साल 2016 में यूनेस्को ने नालंदा को ‘वर्ल्ड हेरिटेज साइट’ घोषित कर दिया. अच्छी खबर ये है कि हम अपनी इस विरासत को वापस पा रहे हैं. बिहार के राजगीर में नई नालंदा यूनिवर्सिटी बन चुकी है, जिसका उद्घाटन साल 2024 में हुआ था. ये नया कैंपस भी पुराने की तरह सस्टेनेबल और ग्लोबल है, जो भारत के उसी ‘विश्व गुरु’ वाले गौरव को वापस लाने की कोशिश कर रहा है.
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