Balochistan Insurgency: रविवार को पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा में चमन गेट के पास मिलिट्री के लोगों को ले जा रही एक ट्रेन पर आत्मघाती हमला हुआ. इस हमले में करीब 24 से 30 लोग मारे गए, जिसमें पाकिस्तानी सैनिक भी शामिल थे. वहीं 70 से ज्यादा लोग घायल हो गए. इस हमले की जिम्मेदारी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने ली. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी द्वारा किया गया यह कोई पहला हमला नहीं है. इससे पहले उन्होंने 11 मार्च 2025 को पूरी जाफर एक्सप्रेस को हाईजैक कर लिया था.
यह घटना बलूचिस्तान के बोलन जिले में मशकफ और पनेर के बीच रेलवे टनल नंबर 8 के पास हुई, जब ट्रेन क्वेटा से पेशावर जा रही थी. BLA ने ट्रेन पर कब्जा कर लिया और सैकड़ों यात्रियों और सुरक्षाकर्मियों को बंधक बना लिया था. करीब 30 घंटे तक ट्रेन हाईजैक थी. आखिर में सैन्य ऑपरेशन के दौरान 21 बंधक, चार सैनिक और 33 विद्रोही मारे गए और 350 से ज्यादा यात्रियों को बचाया गया. इससे भी पहले क्वेटा स्टेशन पर एक आत्मघाती हमले में 32 लोग मारे गए थे. बलूचिस्तान का यह विद्रोह कब खत्म होगा, यह कोई नहीं जानता. लेकिन, बलूचिस्तान अपनी ही सरकार का विद्रोह क्यों करता रहता है, यह जानना जरूरी हैं. इस खबर में आप पाकिस्तानी सरकार और बलूचिस्तान के बीच दशकों से चल रहा संघर्ष समझेंगे.
स्वतंत्र राज्य की मांग
पाकिस्तान और बलूचिस्तान के बीच तनाव भारत के बंटवारे के समय से शुरू हुआ. 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान स्वतंत्र देश बना. तभी से पाकिस्तान में बलूचिस्तान की आजादी की आवाज उठने लगी. उस समय बलूचिस्तान में चार रियासते थीं- मकरान, लास बेला, खारान और कलात शामिल थीं. इनमें से केवल कलात सबसे ताकतवर रियासत थी, जिसके सरदार थे अहमद यार खान थे.

बंटवारे से पहले अहमद यार खान ने अंग्रेजों के सामने स्वतंत्र बलूच राज्य की मांग की. खान के जिन्ना के साथ अच्छे संबंध थे, इसलिए उन्हें लगा कि जिन्ना मान जाएंगे. माउंटबेटन के कहने पर कलात और पाकिस्तान ने अगस्त, 1947 में यथास्थिति समझौते पर हस्ताक्षर किए. यथास्थिति समझौते में कहा गया कि कलात भारत के अन्य राज्यों से अलग है, लेकिन पाकिस्तान ही कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक उत्तराधिकारी होगा. इस तरह से पाकिस्तान को सर्वोच्चता मिल गई. पाकिस्तान ने इसके बाद अपना असली खेल खेलना शुरू किया.
दबाव के आगे झुक गए खान
अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने अपना रुख बदला और कलात पर पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव डालना शुरू कर दिया. 17 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सरकार ने कलात के तहत आने वाली तीन रियासतों को अपने साथ मिला लिया, क्योंकि वे भी पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे. इससे अहमद यार खान पर काफी दबाव पड़ा. इसी बीच, ऑल इंडिया रेडियो पर अफवाह फैल गई कि अहमद यार खान भारत में शामिल होना चाहता है. नतीजतन, 26 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान पहुंच गई. दबाव में आकर खान ने 27 मार्च को पाकिस्तान के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर किए.
बगावत की शुरुआत
उसी साल जुलाई में, अहमद यार खान के भाई, प्रिंस अब्दुल करीम ने समझौते के खिलाफ बगावत कर दी और यहीं से बलूचिस्तान की पहली आजादी की लड़ाई शुरू हुई. राजकुमार आगा अब्दुल करीम और मुहम्मद रहीम ने हथियार डालने से इनकार कर दिया और 1950 तक पाकिस्तानी सेना पर कई हमले किए. दोनों राजकुमारों ने बलूचिस्तान से समर्थन के बिना अकेले ही लड़ाई लड़ी.
सैन्य तानाशाही
1958 के बाद पाकिस्तान में मार्शल लॉ और वन यूनिट नीति लागू की गई, जिसके खिलाफ नवाब नौरोज खान ने हथियार उठाए. उन्होंने और उनके अनुयायियों ने पाकिस्तान के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया .पाकिस्तानी सरकार ने उस दौरान कुरान की कसम खाकर शांति समझौता किया, लेकिन बाद में पाकिस्तानी सेना ने नवाब को गिरफ्तार कर देशद्रोह के आरोप में कैद कर दिया. उनके बेटे और भतीजे को बाद में देशद्रोह और पाकिस्तानी सैनिकों की हत्या में सहायता करने के आरोप में फांसी दे दी गई. बाद में, नवाब नौरोज खान की कैद में मृत्यु हो गई.

1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया. बलूच स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन (BSO) और अन्य समूहों ने पहाड़ों पर जाकर सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. पाकिस्तान ने हवाई हमलों और बड़े पैमाने पर सेना का इस्तेमाल किया. इस संघर्ष में हजारों बलूच नागरिक और सैनिक मारे गए. 1977 में जनरल जिया-उल-हक के तख्तापलट के बाद यह अभियान थम गया.
नवाब अकबर खान बुगती की हत्या
2005 में सुई गैस संयंत्र में एक महिला डॉक्टर के बलात्कार की घटना हुई, जिसने इस संघर्ष को और हवा दे दी. इस मामले में पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने एक विवादित टिप्पणी कर दी थी, जिस पर बुगती समुदाय के लोग भड़क गए. उन्होंने हिंसक विद्रोह किया, जिसके कारण देशभर में कई जगह गैस का संकट आ गया. पाकिस्तान के पूर्व डिफेंस मिनिस्टर और बलूचिस्तान के पूर्व गवर्नर नवाब अकबर खान बुगती ने अन्य नेताओं के साथ मिलकर पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ हथियार उठा लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार के सामने 15 मांगें रखीं. इनमें से एक मांग यह थी कि बलूचिस्तान के लोगों को बलूचिस्तान के संसाधनों पर ज़्यादा अधिकार मिलने चाहिए. इसके बाद उनका पाकिस्तानी आर्मी के साथ टकराव हुआ और अगले ही साल बुगती की हत्या कर दी गई. उस समय के आर्मी चीफ और पाकिस्तान के पूर्व प्रेसिडेंट परवेज मुशर्रफ पर इस हत्या का आरोप लगा.
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी
इस हत्या से बलूचिस्तान के लोगों में पाकिस्तान के खिलाफ बहुत गुस्सा था और उनके अंदर अलग बलूचिस्तान के लिए चल रहे संघर्ष की आग और भड़क उठी. इसके बाद से बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ज्यादा एक्टिव हो गई, हालांकि इसका गठन साल 2000 में हुआ था. BLA ने सीधे पाकिस्तानी मिलिट्री और सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना शुरू कर दिया. BLA ने पारंपरिक गुरिल्ला युद्ध की तकनीकों को ज्यादा खतरनाक और मॉडर्न बना दिया है. संगठन की सुसाइड यूनिट, मजीद ब्रिगेड, अब पाकिस्तानी सिक्योरिटी फोर्सेज, मिलिट्री कैंप्स और स्ट्रेटेजिक जगहों पर बड़े पैमाने पर सुसाइड अटैक करती है. हाल के सालों में इस संगठन ने रेलवे लाइनों पर कई हमले किए हैं.

पाकिस्तान पर शोषण का आरोप
प्राकृतिक संसाधनों का दोहन
पाकिस्तान के कुल खनिज संसाधनों का लगभग 80 प्रतिशत बलूचिस्तान में है, इसलिए पाकिस्तान किसी भी कीमत पर बलूचिस्तान को अलग नहीं करना चाहता. बलूचिस्तान में प्राकृतिक गैस, कोयले और ‘रेको डिक’ जैसी खदानों में सोने और तांबे के भंडार हैं, लेकिन इसका फायदा खुद बलूचों को नहीं मिल पाता. पाकिस्तान का उद्योग दशकों से पूरी तरह से सुई क्षेत्र के प्राकृतिक गैस पर चल रहा है, जबकि बलूच अपने बुनियादी ईंधन के लिए भी लड़ रहे हैं. पाकिस्तानी सरकार बुरी तरह से संसाधनों को लूट रही है, जिस कारण वहां की स्थानीय आबादी के मन में सरकार के प्रति नफरत भर गई है.
बनियादी सुविधाओं की कमी
इस आर्थिक नाइंसाफी का नतीजा बलूचिस्तान में बहुत ज़्यादा गरीबी और पिछड़ापन है. संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद, यह इलाका पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा प्रांत है, जहां साक्षरता दर बहुत कम है और स्वास्थ्य, शिक्षा और साफ पानी जैसी सुविधाओं तक पहुंच बहुत कम है. रोजगार की कमी होने के बावजूद, जब भी कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू होता है, तो अक्सर लोकल युवाओं की जगह पंजाब और दूसरे प्रांतों के लोगों को नौकरियां दी जाती हैं. पाकिस्तान की पार्लियामेंट में बलूचिस्तान का रिप्रेजेंटेशन कम है, जिससे नेशनल पॉलिसी बनाने में इसकी आवाजें ज्यादातर अनसुनी रह जाती हैं.
लापता बलूच
पाकिस्तानी सेना के लिए बलूचों की नफरत मानवाधिकार उल्लंघन से और बढ़ रही है. बलूच ट्राइब्स और एक्टिविस्ट्स का आरोप है कि मिलिट्री एजेंसियां बगावत को दबाने के लिए “किल एंड डंप” की नीति अपनाती हैं. इसके तहत, हजारों बलूच स्टूडेंट्स, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गैर-कानूनी तरीके से किडनैप करके गायब कर दिया जाता है. गोलियों से छलनी और टॉर्चर की गई उनकी कई लाशें बाद में सुनसान इलाकों में मिलती हैं. बलूच मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, हजारों बलूच लोग सालों से गायब हैं. इस दमन के कारण अब बलूच औरतें और बच्चे तक सड़कों पर उतरने पर मजबूर हैं.
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर

हाल के सालों में, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के आने से बलूचों में आक्रोश और बढ़ गया है. यह $65 बिलियन का मेगा-प्रोजेक्ट चीन के उत्तर-पश्चिमी शिनजियांग प्रांत से पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर पोर्ट तक बनाया जा रहा है. यह लगभग 3,000 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर है, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK), गिलगित-बाल्टिस्तान, पंजाब और सिंध प्रांतों से होकर गुजरता है. बलूच मानते हैं कि यह प्रोजेक्ट उनके वजूद के लिए खतरा है. उन्हें डर है कि चीनी दखल और बाहरी लोगों के बसने से वे खुद अपनी जमीन पर अल्पसंख्यक और गुलाम बन जाएंगे. इसलिए, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे अन्य ग्रुप्स ने पाकिस्तानी मिलिट्री के साथ-साथ चीनी इंजीनियरों को निशाना बना रहे हैं.
आजाद बलूचिस्तान का सपना
बलूचिस्तान के लोग 1947 से भी पहले से आजादी के लिए लड़ रहे हैं. इसके लिए, उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध के साथ-साथ हथियारबंद संघर्ष भी किया है, लेकिन पाकिस्तानी सरकार और सेना अलग बलूचिस्तान की मांग पूरी नहीं होने दे रही है. सालों से चल रहा यह झगड़ा पाकिस्तानी सरकार के लिए भी एक बड़ी समस्या बन गया है. बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल जमीनी इलाके का 44% हिस्सा है. अगर बलूचिस्तान आजाद हो जाता है, तो इससे न सिर्फ पाकिस्तान का क्षेत्रफल छोटा हो जाएगा, बल्कि उसका प्राकृतिक संसाधन पर कंट्रोल भी खत्म हो जाएगा. इसलिए, पाकिस्तान किसी भी कीमत पर अलग बलूचिस्तान नहीं बनने देना चाहता.
