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खतरे की घंटी : न गाड़ी मिलेगी, न विदेश उड़ान… क्या बांग्लादेश के पास अब बचे हैं गिनती के दिन?

by Sanjay Kumar Srivastava 9 July 2026, 9:57 PM IST
9 July 2026, 9:57 PM IST
बज गई खतरे की घंटी! न गाड़ी मिलेगी, न विदेश उड़ान... क्या बांग्लादेश के पास अब गिनती के दिन बचे हैं?

BANGLADESH ECONOMY: बांग्लादेश में खतरे की घंटी बज गई है. महंगाई और मंदी के चक्रव्यूह में देश फंस गया है. वीआईपी दौरे बंद हो गए हैं. अब न तो न गाड़ी मिलेगी, न ही विदेश उड़ान का मौका. ढाका से आए एक आदेश ने अफसरों व मंत्रियों की नींद उड़ा दी है. दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश इस समय बेहद गंभीर आर्थिक भंवर में फंसा हुआ है. देश की बिगड़ती व्यापक आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए वहां की सरकार ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है. बांग्लादेश के वित्त मंत्रालय ने गुरुवार (8 जुलाई) को देश में सख्त ‘मितव्ययिता के उपाय’ लागू करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है.

उड़ गए अफसरों के ‘हवाई’ सपने

इस नए सरकारी फरमान के तहत सरकारी अधिकारियों के हवाई जहाजों, पानी के जहाजों और मोटर गाड़ियों की खरीद पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है. इसके साथ ही, सरकारी खजाने के खर्च पर होने वाली अधिकारियों की तमाम विदेश यात्राओं, अंतरराष्ट्रीय सेमिनार और वर्कशॉप में भाग लेने पर भी पाबंदी लगा दी गई है. देश लगातार बढ़ती महंगाई, घटती विकास दर और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट के दोहरे प्रभाव से जूझ रहा है, जिसके चलते सरकार को अपनी बेल्ट कसनी पड़ी है.

क्या-क्या पाबंदियां हैं शामिल?

बांग्लादेश सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, यह नियम देश के सभी मंत्रालयों, विभागों, स्वायत्त निकायों, वैधानिक संगठनों और सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों पर तत्काल प्रभाव से चालू वित्त वर्ष (2026-27) के लिए लागू हो गया है.

ये हैं आदेश के मुख्य बिंदु

  • वाहनों की खरीद पर पूर्ण रोक: ऑपरेटिंग या विकास बजट के फंड से किसी भी प्रकार की कार, जीप, जलयान या विमान नहीं खरीदे जा सकेंगे. अधिकारियों को गाड़ियां खरीदने के लिए मिलने वाली ब्याज-मुक्त विशेष ऋण सुविधा को भी निलंबित कर दिया गया है.
  • इलेक्ट्रिक वाहनों की अनिवार्यता: केवल उन्हीं विभागों को गाड़ियां बदलने की अनुमति होगी जिनकी गाड़ियां 10 साल से अधिक पुरानी हो चुकी हैं. आपातकालीन सेवाओं (जैसे एम्बुलेंस और सुरक्षा वाहन) को छोड़कर, सभी नए खरीदे जाने वाले वाहन अनिवार्य रूप से पूर्ण इलेक्ट्रिक वाहन होने चाहिए, ताकि ईंधन के आयात खर्च को बचाया जा सके.
  • विदेश यात्राओं पर ताला: सरकारी पैसे से होने वाले सभी विदेशी प्रशिक्षण कार्यक्रम, सेमिनार, संगोष्ठी और वर्कशॉप रोक दिए गए हैं. केवल विदेशी छात्रवृत्ति या अनुदान पर मास्टर और पीएचडी करने वाले छात्रों/अधिकारियों को ही बाहर जाने की छूट मिलेगी.
  • निर्माण और भूमि अधिग्रहण पर रोक: नए सरकारी भवनों के निर्माण और भूमि अधिग्रहण के लिए फंड जारी करने पर रोक लगा दी गई है. केवल वही प्रोजेक्ट पूरे किए जाएंगे जो पहले ही 70% से अधिक पूरे हो चुके हैं.

आखिर क्यों बांग्लादेश को उठाना पड़ा यह कदम?

विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश के पास इस समय सरकारी खर्चों में कटौती करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. इसके पीछे कई आंतरिक आर्थिक कमजोरियां और बाहरी वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं.

  • बेलगाम महंगाई : बांग्लादेश के आम नागरिक पिछले कई महीनों से कमरतोड़ महंगाई का सामना कर रहे हैं. जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, देश की मुद्रास्फीति दर 9.16 प्रतिशत पर बनी हुई है. भले ही यह मई के 9.42% से मामूली कम है, लेकिन गैर-खाद्य महंगाई अभी भी 9.61% के ऊंचे स्तर पर है. इस अनियंत्रित महंगाई ने आम परिवारों के बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया है और बाजार में मांग कमजोर कर दी है.
  • धीमी विकास दर और आर्थिक सुस्ती: एशियाई विकास बैंक (ADB) और वर्ल्ड बैंक (World Bank) की रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश की आर्थिक विकास दर लगातार तीन वर्षों से गिर रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में बांग्लादेश की जीडीपी विकास दर घटकर महज 3.7% से 3.9% के बीच रहने का अनुमान लगाया गया है, जो सरकार के शुरुआती लक्ष्यों से बहुत कम है. निर्यात में आई सुस्ती और निजी निवेश में भारी कमी ने देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को चोट पहुंचाई है.
  • सरकारी राजस्व में भारी कमी: बांग्लादेश का राष्ट्रीय राजस्व बोर्ड (NBR) टैक्स कलेक्शन के अपने लक्ष्यों को पूरा करने में लगातार विफल रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सरकार का कुल टैक्स कलेक्शन लक्ष्य से 88,000 करोड़ टका कम रहा. इस राजस्व घाटे के कारण सरकार को देश चलाने के लिए बैंकिंग क्षेत्र से भारी मात्रा में कर्ज लेना पड़ा, जो तय सीमा से बहुत ज्यादा ऊपर निकल गया है.

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  • पश्चिम एशिया संकट का असर : वैश्विक मोर्चे पर, पश्चिम एशिया (Middle East) में जारी युद्ध और तनाव ने बांग्लादेश की मुश्किलें दोगुनी कर दी हैं. बांग्लादेश अपनी ऊर्जा जरूरतों जैसे कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के लिए आयात पर निर्भर है. इस संकट के कारण वैश्विक ईंधन की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, जिससे सरकार पर ऊर्जा सब्सिडी का बोझ बढ़ गया है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खाली हो रहा है. इसके अतिरिक्त, पश्चिम एशिया से आने वाले प्रवासियों के रेमिटेंस पर भी विपरीत असर पड़ने की आशंका बनी हुई है यानी प्रवासियों के रेमिटेंस (Remittance) से आशय उस धन या संपत्ति से है, जो किसी दूसरे देश में रह रहे या काम कर रहे प्रवासी द्वारा अपने मूल देश में अपने परिवार या रिश्तेदारों को भेजा जाता है. यह विदेशी मुद्रा कमाने और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को गति देने का एक बहुत बड़ा माध्यम है.
  • बैंकिंग क्षेत्र का संकट और घटता विदेशी मुद्रा भंडारः बांग्लादेश का बैंकिंग क्षेत्र इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. डूबते हुए कर्ज और खराब गवर्नेंस के चलते बैंकों के पास पूंजी की भारी कमी हो गई है. वर्ष 2026 की पहली तिमाही में कई कॉर्पोरेट क्षेत्रों और बैंकों के मुनाफे में भारी गिरावट दर्ज की गई है. कमजोर वित्तीय बफर और कम विदेशी मुद्रा भंडार के कारण देश किसी भी बाहरी आर्थिक झटके को झेलने की स्थिति में नहीं है.

आगे की राह और चुनौतियां

बांग्लादेश नवंबर 2026 में ‘अल्पविकसित देशों’ की श्रेणी से बाहर निकलकर विकासशील देशों की सूची में शामिल होने जा रहा है. इस महत्वपूर्ण मोड़ पर देश के सामने इतनी बड़ी आर्थिक चुनौतियां आना चिंता का विषय है. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि केवल सरकारी खर्चों को रोकने से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा.

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ढाका स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग (CPD) के विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार को तात्कालिक मितव्ययिता के साथ-साथ दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान देना होगा. जब तक देश की कर प्रणाली को पारदर्शी नहीं बनाया जाता, बैंकिंग संकट को हल नहीं किया जाता और बाजार में जमाखोरों व कमजोर प्रतिस्पर्धा को दुरुस्त नहीं किया जाता, तब तक महंगाई को सहन करने योग्य स्तर (लगभग 7.5%) पर लाना बेहद मुश्किल होगा. अंतरिम सरकार और आने वाले महीनों की राजनीतिक स्थिरता ही यह तय करेगी कि बांग्लादेश इस गहरे संकट से उबरकर अपने निवेशकों का भरोसा दोबारा कैसे जीत पाता है. फिलहाल, बांग्लादेश के इस खर्च कटौती के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि देश इस समय ‘आर्थिक आपातकाल’ जैसी गंभीर स्थिति से निपटने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है.

महंगाई को काबू में रखने का प्रयास

यह कदम तब उठाया गया है जब वर्ल्ड बैंक (WB) और एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) जैसी बड़ी लोन देने वाली संस्थाओं ने 2026-2027 फाइनेंशियल ईयर में विकास दर के अपने पहले के अनुमानों को कम कर दिया है. वित्त विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि चूंकि देश लगातार महंगाई, धीमी विकास दर और दबाव वाले बैंकिंग सिस्टम का सामना कर रहा है, इसलिए इन उपायों का मकसद सीमित सरकारी संसाधनों का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना, महंगाई को सहने योग्य स्तर पर लाना और मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता बनाए रखना है. अधिकारी ने बताया कि इन निर्देशों के बारे में विस्तार से जानकारी देने वाला एक सर्कुलर जारी किया गया है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार ने सीमित सरकारी संसाधनों के समझदारी भरे इस्तेमाल के ज़रिए महंगाई को काबू में रखने और मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता बनाए रखने की कोशिशों के तहत ये प्रतिबंध लागू किए हैं.

सरकारी उद्यमों, वैधानिक संगठनों पर लागू होंगे नियम

अधिकारी ने कहा कि ये प्रतिबंध सभी सरकारी मंत्रालयों और एजेंसियों, स्वायत्त निकायों, सरकारी उद्यमों, वैधानिक संगठनों, पब्लिक सेक्टर कॉरपोरेशन, सरकारी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के ऑपरेटिंग और डेवलपमेंट बजट पर लागू होंगे. सरकार ने पिछले महीने 2026-2027 के लिए अपनी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) विकास दर का लक्ष्य 6.5 प्रतिशत तय किया था, जिसे स्वतंत्र वित्तीय विश्लेषकों और बहुपक्षीय संगठनों ने मौजूदा संरचनात्मक चुनौतियों को देखते हुए बहुत महत्वाकांक्षी बताया था. ADB ने बुधवार को अपने नवीनतम अनुमान में, ऊर्जा और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी चिंताओं के कारण 2026 में बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर का अनुमान 4.0 प्रतिशत से घटाकर 3.5 प्रतिशत कर दिया.

आर्थिक विकास दर में गिरावट

विश्व बैंक (WB) ने शुरू में बांग्लादेश की विकास दर 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था, लेकिन बाद में इसे दो बार घटाया – पहले अप्रैल 2026 में 3.9 प्रतिशत और फिर जून 2026 में 3.8 प्रतिशत किया. दोनों ऋणदाताओं ने इस सुस्ती के लिए कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया. उपभोक्ता खर्च पर असर डालने वाली उच्च मुद्रास्फीति, दबाव में चल रहा बैंकिंग क्षेत्र और कमजोर वित्तीय प्रबंधन, लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण निजी निवेश में कमी और ईरान युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मची उथल-पुथल से ऊर्जा सब्सिडी का बढ़ता बोझ.

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