World Economy: कच्चा तेल वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन है, जो दुनिया की आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्फीति और शेयर बाजार को सीधे नियंत्रित करता है. तेल का प्रभाव सिर्फ ईंधन भरने वाले वाहनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह प्लास्टिक, उर्वरक, रसायन और रसद जैसे प्रमुख उद्योगों का मुख्य आधार भी है. दुनिया की औद्योगिक मशीनरी, माल परिवहन, कृषि और विमानन पूरी तरह से पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर है. जब भी तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो वैश्विक बाजार में हाहाकार मच जाता है. हालिया अमेरिका-ईरान युद्ध ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि दुनिया की आर्थिक महाशक्तियां कच्चे तेल के सामने कितनी बेबस हैं. इस युद्ध के कारण दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा गई, बल्कि भारत के लिए भी अभूतपूर्व संकट पैदा हो गया.
- तेल की कीमत तय करती है वैश्विक बाजार
- भारत को झटका: सप्लाई चेन ध्वस्त
- रसोई से लेकर सड़क तक हाहाकार
- मुद्रास्फीति का झटका
- संकट मोचक बनी मोदी सरकार
- सख्त प्रतिबंध की चेतावनी को किया नजरअंदाज
- युद्ध के बीच ईरान का भारत के प्रति नरम रुख
- रूसी विदेश मंत्री ने संकट पर की मोदी से चर्चा
- चीनी जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति

तेल की कीमत तय करती है वैश्विक बाजार
तेल की कीमत किसी भी देश की मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटा और शेयर बाजार की दिशा तय करती है. तेल का कारोबार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है. इसलिए जब तेल की कीमत बढ़ती हैं, तो विकासशील देशों को इसे खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे उनकी स्थानीय मुद्रा कमजोर हो जाती है. दुनिया का लगभग 20 से 25 प्रतिशत कच्चा तेल अकेले होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. जैसे ही अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हुआ, ईरान ने इस संकीर्ण समुद्री मार्ग को अवरुद्ध कर दिया, जिससे वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही पूरी तरह से बाधित हो गई. नतीजा यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत अचानक 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गईं. विश्लेषकों को इसके 175 डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद थी.
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भारत को झटका: सप्लाई चेन ध्वस्त
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत तेल आयात करता है. इसमें से लगभग आधा तेल (कुवैत, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात से) होर्मुज के रास्ते भारत आता है. भारत का कच्चे तेल का आयात मार्च में अचानक 13 प्रतिशत गिरकर 52 लाख बैरल प्रतिदिन से 45 लाख बैरल प्रति दिन हो गया. भारत अपनी घरेलू एलपीजी (रसोई गैस) की जरूरत का करीब 91 फीसदी खाड़ी देशों से आयात करता है. होर्मुज ब्लॉकेज के कारण देश में एलपीजी सप्लाई चेन बुरी तरह टूट गई.
रसोई से लेकर सड़क तक हाहाकार
इस संकट का सीधा और सबसे बड़ा प्रभाव भारत के आम नागरिकों और गृहिणियों पर पड़ा. आपूर्ति बाधित होने के कारण देश के कई हिस्सों में गैस सिलेंडर की डिलीवरी में 2 से 3 सप्ताह की देरी हुई. स्थिति को संभालने के लिए सरकार को मजबूरन एलपीजी सिलेंडरों की राशनिंग (सीमित वितरण) का सहारा लेना पड़ा.

मुद्रास्फीति का झटका
ईंधन की कमी और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमत के कारण परिवहन लागत में वृद्धि हुई. फल, सब्जियां, दूध और राशन जैसी जरूरी चीजें रातों-रात महंगी हो गईं. डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपने विदेशी मुद्रा भंडार से लगभग 12 से 15 बिलियन डॉलर बाजार में डालने पड़े. निवेशकों ने तेजी से शेयर बाजार से पैसा निकाला, जिसका आम जनता की बचत और म्यूचुअल फंड पर नकारात्मक असर पड़ा.
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संकट मोचक बनी मोदी सरकार
आपूर्ति पूरी तरह से ठप होने के कगार पर थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस आपदा को भांपते हुए बहुस्तरीय संकट प्रबंधन रणनीति अपनाई. भारत ने विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में भूमिगत संग्रहीत अपने आपातकालीन कच्चे तेल भंडार को तुरंत खोल दिया. इससे घरेलू रिफाइनरियों को तुरंत कच्चा तेल मिलता रहा और देश में पेट्रोल-डीजल की कमी नहीं हुई. तेल विपणन कंपनियां हर दिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाने के बाद भी जनता के लिए तेल की कीमत स्थिर रखने की कोशिश कर रही थीं. इस बीच सरकार ने देशवासियों से ‘वर्क फ्रॉम होम’ अपनाने और सार्वजनिक परिवहन (जैसे मेट्रो, बस, टेंपो) का उपयोग करने की अपील की ताकि देश कीमती डॉलर बचा सके.
सख्त प्रतिबंध की चेतावनी को किया नजरअंदाज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने रूस और ईरान से तेल खरीदने पर सख्त प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी थी. इसके बावजूद मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं करेगा और अपनी संप्रभुता के मुताबिक ही फैसले लेगा. भारत ने बड़ी चतुराई से अमेरिका से बातचीत की और विशेष ‘अस्थायी छूट’ प्राप्त कर ली.

संकट में भारत का सबसे भरोसेमंद साथी रूस
जब खाड़ी देशों का रास्ता बंद हो गया तो भारत के पुराने दोस्त रूस ने दोस्ती का फर्ज निभाया. पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने भारत को ऊर्जा संकट से बचाया. रूस ने भारत को रियायती दरों पर कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति जारी रखी. मार्च और अप्रैल के दौरान रूस से भारत का तेल आयात अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. मई में भारत ने रूस से रिकॉर्ड 23 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया, जो भारत की कुल तेल आवश्यकता का लगभग 40% है. रूसी उप प्रधान मंत्री डेनिस मंटुरोव और उप ऊर्जा मंत्री पावेल सोरोकिन ने नई दिल्ली का दौरा किया और भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा का आश्वासन दिया. रूस ने चीन जाने वाले अपने कुछ तेल टैंकरों को भारत की ओर मोड़ दिया ताकि भारतीय रिफाइनरियों को तेल की कमी का सामना न करना पड़े.
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युद्ध के बीच ईरान का भारत के प्रति नरम रुख
युद्ध की विभीषिका झेल रहे ईरान का भारत के प्रति रवैया बहुत सहयोगात्मक और रणनीतिक था. अमेरिकी नाकेबंदी और प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने भारत के साथ अपने ऐतिहासिक और राजनयिक संबंध बनाए रखे. ईरान जानता था कि भारत एक तटस्थ वैश्विक शक्ति है. इसलिए, ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत को तेल की गुप्त और वैकल्पिक आपूर्ति प्रदान करने के प्रयासों का विरोध नहीं किया. ईरानी तेल की कुछ खेप फिर से भारत की ओर बढ़ी. ईरान ने भारत के इस रुख का स्वागत किया कि नई दिल्ली अपने द्विपक्षीय संबंधों पर किसी तीसरे देश के दबाव में फैसला नहीं करती. हालांकि ईरान ने होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों को सख्त चेतावनी जारी की थी, लेकिन उसने भारत के साथ कूटनीति के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भारतीय हितों को कम से कम नुकसान हो.

रूसी विदेश मंत्री ने मोदी से की चर्चा
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने गुरुवार (14 मई) को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. उन्होंने यूक्रेन और पश्चिम एशिया की स्थिति सहित आपसी हित के विभिन्न क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया. बैठक के दौरान प्रधान मंत्री ने बातचीत और कूटनीति के पक्ष में भारत के निरंतर रुख को आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका बताया. मोदी ने संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रयासों के लिए भारत के निरंतर समर्थन को भी दोहराया. उन्होंने कहा कि रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का स्वागत करते हुए खुशी हो रही है. हमने यूक्रेन और पश्चिम एशिया की स्थिति सहित विभिन्न क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया. संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के उद्देश्य से किए गए प्रयासों के लिए अपना निरंतर समर्थन दोहराया.
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चीनी जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति
उधर, गुरुवार को ईरान ने दर्जनों चीनी जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी है क्योंकि चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वार्ता के दौरान प्रमुख जलमार्ग के सैन्यीकरण के खिलाफ अपना रुख सख्त कर दिया है. 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया.

चीन की सरकारी शिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, ईरान की अर्ध-आधिकारिक फ़ार्स समाचार एजेंसी ने रिवोल्यूशनरी गार्ड-नेवी के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया कि बुधवार रात से ईरान ने ईरानी प्रबंधन प्रोटोकॉल के अनुपालन में 30 चीनी जहाजों को होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने गुरुवार को कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए खुला है, बशर्ते वे जलमार्ग से गुजरने के लिए ईरानी नौसैनिक बलों के साथ सहयोग करें.
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराई
पाकिस्तान के प्रधान मंत्री शहबाज शरीफ ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका-ईरान युद्ध ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित कर दिया है. उन्होंने लोगों से देश को आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए ठोस प्रयास करने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि जैसे पाकिस्तान परमाणु शक्ति बन गया है, हमें उसी प्रतिबद्धता और कड़ी मेहनत के साथ इसे आर्थिक शक्ति में बदलना होगा.
अमेरिका-ईरान युद्ध और होर्मुज संकट ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया. लेकिन भारत ने अपनी मजबूत ऊर्जा कूटनीति, घरेलू रणनीतिक भंडार के उपयोग और रूस जैसे अपने मित्र के समर्थन से इस भयंकर आर्थिक तूफान का सफलतापूर्वक सामना किया. मोदी सरकार का यह संकट प्रबंधन वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक मिसाल बन गया है, जिसने न केवल देश को भारी महंगाई से बचाया, बल्कि उसकी सामरिक स्वायत्तता भी बरकरार रखी.
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