Home राज्यMadhya Pradesh क्या है भोजशाला का इतिहास? जानें विवाद शुरू होने से लेकर HC में कानूनी लड़ाई तक

क्या है भोजशाला का इतिहास? जानें विवाद शुरू होने से लेकर HC में कानूनी लड़ाई तक

by Sachin Kumar
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History of Bhojshala

History of Bhojshala : मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला एक बार फिर चर्चाओं में आ गया है. काफी सालों से दो पक्षों में चल रहे विवाद के बीच मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है. दो जजों की पीठ ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है और वहां पर हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार दे दिया है. इसके अलावा कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण बात कही है कि इस स्थल पर हिंदू पूजा की परंपरा कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी. वहीं, हाई कोर्ट के फैसले के बाद प्रशासन अलर्ट मोड में आ गया है क्योंकि शुक्रवार को वहां पर नमाज अदा भी होती है.

  • ASI रिपोर्ट में मिले कौन से तथ्य?
  • रिपोर्ट मिलने के बाद हिंदू पक्ष की हुई जीत
  • हाई कोर्ट में चली लंबी कानूनी लड़ाई
  • किसने बनवाया भोजशाला?
  • परमांश का सांस्कृतिक चीजों से लगाव
  • ऐसे शुरू हुआ मंदिर का काला इतिहास
  • हिंदुओं में उल्लास और मुस्लिम पक्ष नाखुश
  • फैसले पर गरमाई राजनीति

ASI रिपोर्ट में मिले कौन से तथ्य?

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने भोजशाला के भीतर एक वैज्ञानिक सर्वे किया है और इसके बाद जब रिपोर्ट सामने आई तो कई चौंकाने वाले तथ्य देखने को मिले. ASI सर्वे के दौरान परिसर के भीतर से 94 मूर्तियां और प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष मिले हैं. ये सारी कलाकृतियां पत्थरों से बनी हैं और इन पर भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव जैसे देवी-देवताओं की आकृतियां दिख रही हैं. इसके अलावा अन्य कलाकृतियों में शेर, बाघ और विभिन्न पक्षियों के चित्र भी मिले हैं. साथ ही यहां पर ASI के सिक्के भी प्राप्त हैं और ये सिक्के परमार वंश के राजाओं के काल के हैं. ASI सर्वे के दौरान मिले इतने सारे ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर पता चलता है कि यह मंदिर राजा भोज और उनके शासनकाल के दौरान बनवाया गया था.

What is the history of Bhojshala

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रिपोर्ट मिलने के बाद हिंदू पक्ष की हुई जीत

ऐतिहासिक भोजशाला पर आए हाई कोर्ट के फैसले को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कोर्ट ने भोजशाला को मंदिर करार देते हुए हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार दिया है. साथ ही यह फैसला उस कानूनी लंबी लड़ाई का परिणाम है जिसमें हिंदू समाज के लोग लगातार मां सरस्वती का मंदिर होने का दावा करते हुए आए हैं. आपको बताते चलें कि भोजशाला का विवाद का नया कानूनी अध्याय साल 2022 में शुरू हुआ था. उस समय रंजना अग्निहोत्री और उनके सहयोगियों ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की तरफ से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में भोजशाला में पूजा अर्चना की मांग की गई थी. इसके बाद 11 मार्च, 2024 को हाई कोर्ट ने ASI को पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया था और इसके बाद ASI ने करीब 98 दिनों तक सर्वे करने के बाद 15 जुलाई, 2024 को 2000 पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी थी.

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हाई कोर्ट में चली लंबी कानूनी लड़ाई

हाई कोर्ट की इंदौर की डबल बेंच ने 6 अप्रैल, 2026 से इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू की. 12 मई 2026 तक चली सुनवाई में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने अपने-अपने दावे और साक्ष्य कोर्ट के सामने प्रस्तुत किए. करीब एक महीने तक चली सुनवाई के दौरान हजारों की संख्या में दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और ऐतिहासिक तथ्यों को सामने पेश किए. इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया.

History of Bhojshala

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किसने बनवाया भोजशाला?

इतिहास की किताबों को पलटने पर पता चलता है कि परमार वंश के सबसे प्रभावशाली राजा भोज ने साल 1034 में इस भव्य परिसर को तैयार करवाया था. साथ ही धार जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर भी यह बात कही गई है कि राजा भोज ने यहां पर एक बड़ी यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी और उसके बाद में भोजशाला के नाम से प्रसिद्धि मिली. दूसरी तरफ राजा भोज व्यक्तिगत रूप से ज्ञान, कला और साहित्य में गहन रुचि लेते थे और ऐसी इमारतों को संरक्षण देने का काम करते थे. हालांकि, बाद में आक्रांताओं और शासकों ने इस मंदिर के ढांचे को क्षतिग्रस्त करके इसे मस्जिद में बदलने का काफी प्रयास किया. हालांकि, मंदिर में उकेरी की कलाकृतियां और खंभों में बनी मूर्तियां आज भी मंदिर की गंवाई देती हैं.

History of Bhojshala

परमांश का सांस्कृतिक चीजों से लगाव

भोजशाला का विकास सिर्फ राजा भोज तक ही सीमित नहीं थी बल्कि उनके उत्तराधिकारों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया. साथ ही इसको ज्ञान का केंद्र के रूप में स्थापित किया. राजा भोज के बाद परमान के शासक उदयादित्य और नरवरमान ने भी इस मंदिर की सेवा की और इसको संरक्षण देने का काम करते रहे. इस मंदिर के एक शिला पर संस्कृत के दो विशेष पाठ लिखे हैं और इसमें परमार राजाओं की स्तुति भी दी गई है. साथ ही कवि मदन के प्राचीन के नाटक में भी इस स्थान का स्पष्ट वर्णन मां सरस्वती के मंदिर के रूप में मिलता है. वहीं, इस परिसर में वाग्देवी (सरस्वती) की मूल प्रतिमा 19वीं सदीं के अंत में अंग्रेज लंदन लेकर चले गए थे और वह मूर्ति ब्रिटेन के एक म्यूजियम की आज भी शोभा बढ़ा रही है.

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ऐसे शुरू हुआ मंदिर का काला इतिहास

भोजशाला का इतिहास कई हमलों की भी हिस्ट्री रही है. साल 1305 में क्रूर शासक अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार हमला करके इस ज्ञान के परिसर को खत्म करने की कोशिश की थी. इसके बाद 1401 में दिलावर खान गौरी ने इस परिसर के एक हिस्से में मस्जिद बनवाने का काम किया. साथ ही हमले करने का सिलसिला सिर्फ यही नहीं ठहरा 1514 में महमूद शाह खिलजी ने भोजशाला के शेष हिस्से को भी मस्जिद के स्वरूप में ढालने का प्रयास किया. वहीं, 1875 में ब्रिटिश मेजर किनकेड ने इस परिसर की खुदाई करवाने का काम किया और इस खुदाई में माता सरस्वती एक दिव्य प्रतिमा मिली. इसके बाद किनकेड इस मूर्ति को लेकर लंदन लेकर चला गया. इसके बाद यह प्रतिमा आज तक भारत नहीं आई.

History of Bhojshala

हिंदुओं में उल्लास और मुस्लिम पक्ष नाखुश

हाई कोर्ट की डबल बेंच ने पुरातात्विक, तकनीकी और ऐतिहासिक साक्ष्यों को आधार मानते हुए धार की भोजशाला को श्वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर स्वीकार किया है. इस बड़े फैसले के आते ही पूरे मध्य प्रदेश विशेषकर धार और इंदौर जिलों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है. वहीं, फैसले की खबर मिलते ही धार में सक्रिय हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं में भारी खुशी की लहर दौड़ गई. शहर के कई चौराहों पर कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़कर और मिठाई बांटकर उत्सव मनाया. प्रशासन ने सुरक्षा के लिहाज से भोजशाला परिसर के भीतर जाने पर पाबंदी लगा रखी थी इसलिए उत्साहित श्रद्धालुओं ने बाहर लगे पुलिस बैरिकेड्स पर ही फूल मालाएं चढ़ाकर अपनी आस्था प्रकट की. हिंदू पक्ष का कहना है कि वे इस लड़ाई को लंबे समय से लड़ रहे थे और आज न्याय की जीत हुई है. भोजशाला के बिल्कुल नजदीक ही मां सरस्वती अखंड संकल्प ज्योति मंदिर स्थित है, जहां पिछले कई वर्षों से 24 घंटे अखंड ज्योति जल रही है. हिंदू संगठनों ने संकल्प लिया है कि वे जल्द ही वाग्देवी की मूल मूर्ति को वापस लाकर यहां स्थापित करेंगे.

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दूसरी तरफ इस फैसले से मुस्लिम पक्ष में साफ तौर पर नाखुशी और मायूसी का माहौल देखा गया. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए धार के शहर काजी ने मीडिया से चर्चा में कहा कि हम अदालत के फैसले का सम्मान और स्वागत करते हैं, लेकिन हम इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं. हमारे वकील इस आदेश का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं और हम जल्द ही अपनी बात देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के समक्ष रखेंगे. इसके अलावा शुक्रवार जुमे की नमाज का दिन होने के कारण जिला प्रशासन ने सुरक्षा के बेहद कड़े और अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं. धार शहर को पूरी तरह से एक अभेद्य किले में तब्दील कर दिया गया है. हाईवे से लेकर अंदरूनी गलियों तक हाई-लेवल की पुलिस फोर्स और रिजर्व पुलिस बल तैनात है. कलेक्टर और एसपी खुद भारी पुलिस अमले के साथ लगातार गश्त कर रहे हैं. प्रशासन ने दोनों ही पक्षों से शांति और आपसी सौहार्द बनाए रखने की पुरजोर अपील की है.

फैसले पर गरमाई राजनीति

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने शुक्रवार को उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को पलट देगा, जिसमें धार में स्थित विवादित भोजशाला परिसर को मंदिर घोषित किया गया है. उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इसे ठीक करेगा और इस आदेश को पलट देगा. इसमें बाबरी मस्जिद फैसले से साफ तौर पर समानताएं दिखती हैं. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को घोषणा की कि धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है और केंद्र सरकार तथा ASI इसके प्रशासन और प्रबंधन पर फैसला ले सकते हैं.

इंदौर हाई कोर्ट ने भोजशाला पर ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है. कोर्ट ने भोजशाला को सरस्वती मंदिर माना है और यहां पर हिंदू पक्ष को पूजा पाठ करने की भी इजाजत दे दी है. कोर्ट ने ASI की 2000 पन्नों की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद यह फैसला सुनाया है और इस निर्णय के दौरान कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते कहा कि यहां पर पूजा निरंतरता से होती आ रही. वहीं, मुस्लिम पक्ष ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह इस फैसले से नाखुश हैं और इसको चुनौती देने के लिए वह सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे. अब देखना होगा कि शीर्ष अदालत इस मामले में कब फैसला देगी.

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