Allahabad HC: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के रवैये पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए राज्य में नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति को ‘शर्मनाक’ करार दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि यूपी पुलिस को नागरिकों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की कोई खास परवाह नहीं है और ऐसा लगता है कि इन अधिकारों का उल्लंघन करना पुलिस के लिए एक आम बात बन चुकी है. यह सख्त टिप्पणी न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने औसद अहमद नामक व्यक्ति की हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका पर सुनवाई के दौरान की. याचिकाकर्ता का आरोप था कि पुलिस ने उसे अवैध तरीके से हिरासत में रखा है.
CCTV खराब होने के पुलिसिया बहाने पर भड़का कोर्ट
अदालत ने सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा अक्सर बनाए जाने वाले सीसीटीवी खराब होने के बहाने पर बेहद गंभीर रुख अपनाया. पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि गैर-कानूनी हिरासत के मामलों में पुलिस ऐसा बहाना नहीं बना सकती. अदालत ने माना कि सीसीटीवी फुटेज को जानबूझकर छिपाया गया ताकि सच्चाई को दबाया जा सके. ऐसे में केवल याचिकाकर्ता का यह दावा ही मान लेना काफी है कि उसे अवैध रूप से बंद रखा गया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लेते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया. अदालत ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए. इसके साथ ही, कोर्ट ने कानून के उल्लंघन पर जवाबदेही तय करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह सात दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को हर्जाने (खर्च) के तौर पर 20,000 रुपये का भुगतान करे.
पुलिस स्टेशन के बाहर से जबरन उठाने का आरोप
बिजनौर के रहने वाले औसद अहमद ने दावा किया कि बिजनौर पुलिस ने उन्हें 5 सितंबर, 2026 को हिरासत में ले लिया था, लेकिन उनकी औपचारिक गिरफ्तारी 7 सितंबर, 2026 को दिखाई गई. अपनी याचिका में, औसद की बेटी (जो इस मामले में पहली याचिकाकर्ता हैं) ने आरोप लगाया कि सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों और एसओजी (SOG) अधिकारियों ने उनके पिता को बिजनौर के नागल पुलिस स्टेशन के बाहर से जबरन उठा लिया. वे दोनों वहां पुलिस के बुलाने पर गए थे, क्योंकि अहमद के खिलाफ हनीट्रैप का एक मामला दर्ज किया गया था.
CCTV फुटेज पेश नहीं कर पाई पुलिस
याचिका के अनुसार, वे 5 सितंबर 2026 को दोपहर लगभग 2:30 बजे पुलिस स्टेशन पहुंचे. जब वे अपनी गाड़ी में बैठे थे और SHO से संपर्क कर रहे थे, तभी पुलिस स्टेशन के गेट के पास एक कार अंदर आई. आरोप है कि उस गाड़ी से चार लोग उतरे, उन्होंने उनकी कार को घेर लिया और जबरन अहमद को अपने साथ ले गए. इन आरोपों की सच्चाई का पता लगाने के लिए हाई कोर्ट ने पहले राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वे 5 सितंबर को दोपहर 1 बजे से 7 सितंबर की सुबह 10 बजे तक के पुलिस स्टेशन के CCTV फुटेज पेश करें. हालांकि, जब यह मामला सुनवाई के लिए आया, तो राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि उस अवधि का CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं है.
SHO के रवैये पर भी जताई नाराजगी
राज्य सरकार ने 5 सितंबर की एक ‘जनरल डायरी’ एंट्री का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि आंधी-तूफान के कारण बारिश का पानी केबल के जरिए CCTV सिस्टम में चला गया, जिससे सिस्टम खराब हो गया और काम करना बंद कर दिया. इस बात पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि एक के बाद एक कई मामलों में, जब भी यह कोर्ट CCTV फुटेज मांगता है, तो ज्यादातर मामलों में यही रिपोर्ट आती है कि किसी न किसी कारण से CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं है. कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि गैर-कानूनी हिरासत के मामलों में पुलिस यह बहाना नहीं बना सकती कि CCTV सिस्टम खराब हो गया था. 3 नवंबर के अपने फैसले में, कोर्ट ने नांगल की SHO अनू कुमारी की भूमिका पर भी गौर किया और कहा कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा CCTV फुटेज नहीं दिया, जो इस मामले के फैसले के लिए जरूरी था.
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