Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है कि देश में मज़दूरों को सबसे कम वेतन और देखभाल मिलती है. समाज उनकी शारीरिक मेहनत की कद्र और सम्मान करने में भी नाकाम रहा है. यह टिप्पणी जस्टिस विमल कुमार की पीठ ने एक दोषी की याचिका पर सुनवाई के दौरान की. दोषी को सोने की कोशिश कर रहे एक मज़दूर पर हमला करने के आरोप में पांच साल की सज़ा सुनाई गई थी. मज़दूर ने केवल दोषी और अन्य लोगों द्वारा किए जा रहे शोर-शराबे पर आपत्ति जताई थी. कोर्ट ने दोषी वीर पाल की सज़ा को ‘हत्या की कोशिश’ के अपराध से बदलकर ‘खतरनाक हथियारों से जान-बूझकर चोट पहुंचाने’ का अपराध कर दिया.
कोर्ट ने घटाई दोषी की सजा
कोर्ट ने माना कि तथ्यों से यह साबित नहीं हुआ कि उसमें हत्या की कोशिश का इरादा या जानकारी थी. कोर्ट ने पांच साल की जेल की सज़ा को घटाकर तीन साल कर दिया. जस्टिस विमल कुमार यादव ने 18 सितंबर को दिए अपने फ़ैसले में कहा कि दिन भर की कड़ी शारीरिक मेहनत के बाद शरीर को फिर से ताज़गी देने के लिए रात में अच्छी और शांत नींद की ज़रूरत होती है, ताकि अगले दिन के कामों को किया जा सके, जिनमें हमेशा ही कड़ी शारीरिक मेहनत शामिल होती है. यह देश में मज़दूरों की एक आम और कभी न खत्म होने वाली दुर्दशा बन गई है. जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह है कि इस वर्ग को सबसे कम वेतन मिलता है, उनकी सबसे कम देखभाल होती है और उनकी सबसे कम परवाह की जाती है.
पश्चिमी देशों में मजदूरों का काफी महत्व
कोर्ट ने कहा कि यह हालात की बहुत दयनीय स्थिति है जहां समाज शारीरिक मेहनत की कद्र और सम्मान करने में नाकाम रहा है, जबकि पश्चिमी देशों में शारीरिक मेहनत का उचित मेहनताना दिया जाता है और उसे महत्व दिया जाता है. यह घटना 17 मार्च 2002 की रात को हुई थी, जब पीड़ित राजिंदर कुमार चांदनी चौक के लाजपत राय बाज़ार में एक दुकान के बरामदे में सो रहा था, जहां वह काम करता था. दोषी पाल और दूसरों की हरकत से परेशान होकर पीड़ित ने उनसे ऐसा व्यवहार न करने को कहा. लेकिन इससे दोषी व्यक्ति भड़क गया, उसने पीड़ित को धक्का दिया और एक धारदार हथियार से उस पर हमला कर दिया.
झगड़े से पीड़ित की नींद में पड़ रहा था खलल
कोर्ट ने पाया कि दोषी ने पीड़ित को घायल करने के लिए धारदार हथियार का इस्तेमाल किया था. ट्रायल कोर्ट ने पाल को दोषी ठहराया और उसे पांच साल की जेल की सज़ा सुनाई. ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देते हुए पाल ने तर्क दिया कि यह घटना अचानक हुई थी और इसके पीछे कोई पूर्व योजना या साज़िश नहीं थी. अदालत ने गौर किया कि राजिंदर कुमार ने इसलिए दखल दिया था क्योंकि पाल और दूसरों के बीच हो रहे झगड़े से उनकी नींद में खलल पड़ रहा था. सज़ा में बदलाव पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने ध्यान दिया कि यह घटना 2002 की है और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पाल का पिछला रिकॉर्ड संदिग्ध लगे या इस मामले के बाद वह किसी और घटना में शामिल रहा हो.
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News Source: PTI
