Home Latest News & Updates हिरासत में यातना मानवाधिकारों का सबसे क्रूर उल्लंघन: भागलपुर कांड का हवाला देकर SC ने की सख्त टिप्पणी

हिरासत में यातना मानवाधिकारों का सबसे क्रूर उल्लंघन: भागलपुर कांड का हवाला देकर SC ने की सख्त टिप्पणी

by Sanjay Kumar Srivastava 5 November 2026, 6:13 PM IST (Updated 5 November 2026, 6:16 PM IST)
5 November 2026, 6:13 PM IST (Updated 5 November 2026, 6:16 PM IST)
हिरासत में हिंसा मानवाधिकारों का सबसे क्रूर उल्लंघन: भागलपुर ब्लाइंडिंग कांड का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

Human Rights: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में हिरासत में होने वाली हिंसा पर गहरी चिंता जताते हुए इसे मानवाधिकारों के उल्लंघन का सबसे क्रूर रूप करार दिया. जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उस पल से शुरू होती है जब उसे हिरासत में लिया जाता है, न कि उस समय से जब पुलिस औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज करती है. अदालत ने कहा कि हिरासत में होने वाली हिंसा देश की एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है. शीर्ष अदालत हमेशा से इस अमानवीय प्रथा को खत्म करने के प्रयास करती रही है, लेकिन दुर्भाग्यवश यह अब भी जारी है.

नागरिकों की गरिमा से समझौता नहीं

कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि पुलिस कस्टडी में किसी भी नागरिक की गरिमा और उसके मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता. यह फैसला पुलिस द्वारा प्रक्रियात्मक देरी के नाम पर की जाने वाली अवैध हिरासत और प्रताड़ना पर लगाम लगाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. बेंच ने कहा कि हिरासत में होने वाली हिंसा हमारे देश की एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है, जिसे न्यायिक रूप से भी माना गया है. यह कोर्ट पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को लेकर लगातार चिंतित रहा है. इसलिए, यह स्पष्ट है कि इस कोर्ट की हमेशा से यही कोशिश रही है कि पूछताछ के दौरान हिरासत में कोई हिंसा न हो, क्योंकि यह मानवाधिकारों के उल्लंघन के सबसे भयानक रूपों में से एक है.

‘डीके बसु मामले’ का भी किया जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने 1979-1980 की ‘भागलपुर ब्लाइंडिंग’ (जेल में कैदियों को अंधा करने की घटना) का भी जिक्र किया. उस मामले में कोर्ट ने कहा था कि बिना रिमांड के हिरासत में रखने पर रोक लगाने वाले प्रावधान बहुत अच्छे हैं, क्योंकि ये मजिस्ट्रेट को पुलिस जांच पर नजर रखने का मौका देते हैं. भागलपुर ब्लाइंडिंग’ बिहार के भागलपुर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की एक क्रूर घटना थी, जहां अक्टूबर 1979 से जुलाई 1980 के बीच पुलिस ने जानबूझकर विचाराधीन कैदियों (अंडरट्रायल कैदियों) को अंधा कर दिया था. कोर्ट ने ‘डीके बसु मामले’ का भी जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी के समय पालन किए जाने वाले कुछ विशेष दिशा-निर्देश तय किए थे.

पुलिस हिरासत में यातना और मौत चिंताजनक

बेंच ने कहा कि इसी तरह, डीके बसु मामले में, इस अदालत ने देश में हिरासत के दौरान होने वाली हिंसा और पुलिस की शक्तियों के दुरुपयोग को स्वीकार किया. अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के बावजूद, पुलिस हिरासत में यातना और मौत की बढ़ती घटनाएं एक चिंताजनक बात है. बेंच ने कहा कि महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अदालत ने दर्ज किया कि मानवाधिकारों का सबसे बुरा उल्लंघन जांच के दौरान होता है. इस दौरान पुलिस जानकारी या कबूलनामा निकलवाने के लिए ‘थर्ड डिग्री’ तरीकों का इस्तेमाल करती है. वे गिरफ्तारी को छिपाने के लिए या तो गिरफ्तारी दर्ज ही नहीं करते या फिर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने को सिर्फ लंबी पूछताछ बता देते हैं.

इलाहाबाद HC का सख्त आदेश: गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी के दो टावर होंगे ध्वस्त

You may also like

Live Times logo

Feature Posts

Newsletter

@2026 Live Time. All Rights Reserved.

Are you sure want to unlock this post?
Unlock left : 0
Are you sure want to cancel subscription?