Delhi Women Commission: देश के बड़े नेशनल न्यूज़ चैनल LIVE TIMES की ग्राउंड रिपोर्ट का बड़ा असर देखने को मिला है. दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय ने महिला आयोग के बंद रहने पर गहरी चिंता जताई है.
- खुशबू के साथ अरुण गंगवार की रिपोर्ट
Delhi Women Commission: देश के बड़े नेशनल न्यूज़ चैनल LIVE TIMES की ग्राउंड रिपोर्ट का बड़ा असर देखने को मिला है. राजधानी दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़ी सबसे अहम संवैधानिक संस्था दिल्ली महिला आयोग पर ताला लटकने की खबर सबसे पहले LIVE TIMES ने ग्राउंड जीरो से दिखाई थी. चैनल की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ने न सिर्फ प्रशासनिक तंत्र को झकझोर दिया, बल्कि न्यायपालिका तक भी इसकी गूंज पहुंची. LIVE TIMES की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की गई, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने दिल्ली सरकार से जवाब तलब कर लिया है. इस पूरे घटनाक्रम ने दिल्ली की राजनीति और प्रशासन दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है.
जनवरी 2024 से खाली है चेयरपर्सन पद
दिल्ली महिला आयोग का चेयरपर्सन पद जनवरी 2024 से खाली पड़ा है. याचिका में कहा गया है कि चेयरपर्सन के अभाव में आयोग पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है. आयोग का कार्यालय कार्यदिवसों में भी बंद रहता है. हेल्प डेस्क काम नहीं कर रही. न कोई अधिकारी शिकायत सुनने के लिए मौजूद है और न ही स्टाफ. मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई. अदालत ने कहा कि यदि आयोग लंबे समय से काम नहीं कर रहा है, तो यह बेहद गंभीर विषय है. बेंच ने दिल्ली सरकार के वकील को निर्देश दिया कि सरकार से स्पष्ट निर्देश लेकर अदालत को सूचित करें कि आखिर आयोग को कार्यशील बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं. अगली सुनवाई 25 फरवरी को तय की गई है.
RJD सांसद ने दाखिल की है याचिका
यह याचिका RJD सांसद सुधाकर सिंह की ओर से दाखिल की गई है. याचिका में कहा गया है कि दिल्ली महिला आयोग का निष्क्रिय होना सीधे तौर पर महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15(3) (महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला दिया गया है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि जब राजधानी दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के सबसे अधिक मामले दर्ज होते हैं, तब ऐसी स्थिति में महिला आयोग का निष्क्रिय होना और भी गंभीर हो जाता है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने अदालत में कहा कि यह विडंबना है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री स्वयं महिला हैं, इसके बावजूद महिला आयोग महीनों से ठप पड़ा है. उन्होंने अदालत से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के लिए बनाई गई संस्था का इस तरह बंद रहना असंवैधानिक और अमानवीय है.
LIVE TIMES ने उजागर की खामियां
LIVE TIMES की टीम ने जब आयोग के दफ्तर का दौरा किया, तो वहां ताला लटका मिला. रिपोर्ट में दिखाया गया कि कार्यालय परिसर में न तो कोई गतिविधि है और न ही कोई शिकायत दर्ज कराने वाला तंत्र काम कर रहा है. स्थानीय महिलाओं ने कैमरे पर बताया कि वे शिकायत लेकर आईं, लेकिन उन्हें कोई अधिकारी नहीं मिला. चैनल की इस रिपोर्ट ने सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी. सवाल उठने लगे कि आखिर दिल्ली महिला आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था महीनों से निष्क्रिय कैसे रह सकती है? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर राजनीतिक अनदेखी?
आयोग के ठप रहने से क्या असर?
दिल्ली महिला आयोग का गठन महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई, परामर्श, और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था. आयोग के तहत पारिवारिक काउंसलिंग सेंटर और रेप क्राइसिस सेल भी काम करते हैं. याचिका में कहा गया है कि आयोग के ठप होने से पारिवारिक काउंसलिंग की प्रक्रिया पूरी तरह बंद हो चुकी है. रेप क्राइसिस सेल की गतिविधियां भी ठहर गई हैं. ऐसे में पीड़ित महिलाओं को तत्काल सहायता और मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आयोग जैसे संस्थानों की भूमिका केवल शिकायत सुनने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे नीतिगत सुझाव देने, जागरूकता अभियान चलाने और पुलिस-प्रशासन के साथ समन्वय बनाने का काम भी करते हैं. ऐसे में संस्था का निष्क्रिय रहना व्यापक प्रभाव डालता है.
अगली सुनवाई 25 फरवरी को
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह इस मामले को गंभीरता से ले रहा है. अदालत ने कहा कि यदि चेयरपर्सन का पद जनवरी 2024 से खाली है, तो सरकार को यह बताना होगा कि अब तक नियुक्ति क्यों नहीं की गई. अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो वह आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है. 25 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं. उम्मीद की जा रही है कि तब तक सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट करेगी और आयोग को कार्यशील बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी.
विपक्ष को मिला मौका
LIVE TIMES की इस खबर ने विपक्ष को भी सरकार पर निशाना साधने का मौका दे दिया है. राजनीतिक दल सवाल उठा रहे हैं कि जब दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले लगातार सामने आते हैं, तब महिला आयोग का निष्क्रिय रहना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है. सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे पर आवाज बुलंद की है. उनका कहना है कि महिला आयोग का सक्रिय होना महिलाओं के लिए एक मनोवैज्ञानिक सहारा भी होता है. जब पीड़ित महिला जानती है कि एक स्वतंत्र संस्था उसकी शिकायत सुनेगी, तो वह आगे आने का साहस करती है. हालांकि LIVE TIMES के सवाल पर बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि एक महीने के भीतर आयोग का गठन कर दिया जाएगा.
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