Rajasthan: राजस्थान के करौली जिले में स्थित पांचना बांध पर आज भी 74 गांवों में भारी विवाद चल रहा है. सिंचाई और पेयजल के लिए बनाया गया ये बांध सामाजिक तनाव और राजनीतिक खींचतान का मुद्दा बन गया है. एक तरफ जहां कमांड एरिया के 35 गांव बीते करीब दो दशकों से नहरों में पानी छोड़ने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ बांध क्षेत्र से जुड़े 39 गांव लगातार पानी छोड़ने की मना करते आ रहे हैं. पानी छोड़ने का विरोध करने वाले किसान सरकार से लिफ्ट परियोजना के तहत इन गांवों में पानी पहुंचाने की वकालत कर रहे हैं. वहीं, राजस्थान हाई कोर्ट इस बांध से पानी छोड़ने का आदेश दे चुका है और इसके बाद भी उसके आदेशों का पालन नहीं किया गया है.
सरकार के समझाने पर नहीं माने किसान
अब दोनों तरफ गांवों ने विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया है और सरकार की काफी समझाइश के बाद भी मामला सुलझने में नहीं आ रहा है. कोर्ट और सरकार भी इस मामले का समाधान नहीं निकल पा रहे हैं. विरोध इतना तेज हो गया है कि प्रशासन भी इस मामले में कोई कदम नहीं उठा पा रहा है. फिलहाल के लिए राजस्थान के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा और गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम ने मौके पर पहुंचकर किसानों को समझाकर आंदोलन खत्म करवा दिया है. लेकिन पानी छोड़ने को लेकर अभी आम सहमति नहीं बन पाई है. वहीं, जयपुर में होने वाली दोनों पक्षों के बीच बातचीत पर निर्भर करेगा कि बीस साल से जारी विवाद पर विराम लगेगा या फिर जारी रहेगा.
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क्यों बना बांध के पानी पर विवाद?
करौली शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर गुड़ला गांव के पास पांचना बांध भद्रावती, अटा, माची, बरखेड़ा और भैंसावत जैसी पांच नदियों के पानी को संग्रह करता है. यह पानी गंभीरी नदी के जरिए भरतपुर होते हुए उत्तर प्रदेश की तरफ बहता है. मामला यह है कि साल 1972 में पूर्वी राजस्थान में बाढ़ आई थी और उसके बाद से इस क्षेत्र में जल संरक्षण की कमी महसूस होने लगी. इसके बाद ही सरकार ने पांचना बांध बनाने की मंजूरी दी और इस बांध का कार्य 1978-79 में शुरू होकर 2004-05 में पूरा हो गया. वहीं, परियोजना का कुल कमांड एरिया 9,985 हेक्टेयर है जिसमें करौली और सवाई माधोपुर जिले के कई इलाके आते हैं. जब यह बांध तैयार हो रहा था उस वक्त इन नदियों से नहरों के माध्यम से किसानों को पानी उपलब्ध कराया जा रहा था. लेकिन, साल बदलते ही 2006 में हालात बिल्कुल उलट हो गए. बांध के आसपास में बसे गांवों ने इस बांध से पानी लेने का विरोध करना शुरू कर दिया. कुछ गांवों का कहना था कि पानी दूसरी तरफ जाने से उनके गांवों में पानी संकट पैदा हो सकता है और इसके बाद विवाद ने जन्म ले लिया. ये सभी 74 गांव दो गुट में बंट गए. एक गुट पानी छोड़ने के लिए प्रदर्शन करने लगा और दूसरा इसका विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आया. इस विवाद को 20 हो गए और आज भी इसका पूरी तरह समाधान नहीं निकल पाया.

पानी बना दो गुटों के गांवों की प्रतिष्ठा
पांचना बांध का विवाद अब सिर्फ जल बंटवारे तक सीमित नहीं रहा है. समय बीतने के साथ इसमें सामाजिक और जातीय तनाव की खाई भी पैदा होती चली गई और यह एक समय बाद प्रतिष्ठा का मुद्दा बना दिया गया. कमांड एरिया के 35 गांवों में मीणा समुदाय की आबादी अच्छी खासी है, जबकि बांध के आसपास 39 गांवों में गुर्जरों की भारी संख्या रहती है. ऐसे में पानी को लेकर शुरू हुआ विवाद जातीय संघर्ष तक पहुंच गया. सवाई माधोपुर में आने वाले गांवों के लोग पानी छोड़ने को लेकर बीते करीब तीन सप्ताह से आंदोलन पर बैठे हैं लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है. उनकी मांग थी कि हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस बांध से पानी छोड़ दिया जाएगा. लेकिन इसके बाद भी किसी अधिकारी ने इतनी हिम्मत नहीं जुटाई की वह बांध से पानी को छोड़ दें. इसी बीच धरने पर बैठी एक महिला ने कहा कि बीते करीब 20 साल से हमारे हिस्से का पानी नहीं मिल पाया है. खेती लगभग बारिश पर निर्भर हो गई है और भूजल का स्तर भी लगातार नीचे जा रहा है. ऐसे में हमारे सामने कई सारे संकट खड़े हो गए हैं. अगर हमें बांध का पानी नहीं मिला तो हमारी खेती सूख जाएगी और समय के साथ हमें पीने के पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा.
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200 करोड़ रुपये का हो रहा नुकसान
आंदोलन पर बैठ एक दूसरे शख्स ने कहा कि बांध से पानी नहीं छोड़े जाने की वजह से कमांड एरिया के किसानों को हर साल करीब 200 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हो रहा है. साथ ही खेती की जमीन अब बंजर होती जा रही है और अब धीरे-धीरे गांवों में पीने के पानी की भी कमी होती जा रही है. वहीं, दूसरी तरफ पांचना बांध के आसपास 39 गांव अपनी मांगों को लेकर अपनी आवाज बुलंद किए हुए हैं. बांध के आसपास इकट्ठा होकर वह नहरों में पानी छोड़ने का लगातार विरोध कर रहे हैं और इनकी मांग है कि सरकार लिफ्ट परियोजना के माध्यम से उनके खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था करें. विरोध कर रहे 39 गांवों के एक शख्स ने कहा कि हम बचपन से इस विवाद को देखते आ रहे हैं और अगर पानी छोड़ा गया तो हमारे इलाके में जल संकट गहरा जाएगा. हम लिफ्ट परियोजना के माध्यम से पानी छोड़ने के पक्ष में है.

आश्वासन के बाद धरने से हटे लोग
पांचना बांध के मुद्दे को सुलझाने को लेकर प्रशासन लगातार इस पर काम कर रहा है और बातचीत के माध्यम से इस मुद्दे को सुलझाने में लगा हुआ है. भरतपुर संभागीय आयुक्त नलिनी कठौतिया की अध्यक्षता में अभी तक कई दौर की बातचीत हो चुकी है. 23 जून को हुई दोनों पक्षों के बीच बातचीत सफल नहीं हो सकी और तीसरे दौर की यह सबसे बड़ी चर्चा थी, जो सफल नहीं हो सकी. वहीं, करौली कलेक्टर अक्षय गोदारा ने कहा कि संभागीय आयुक्त के स्तर पर कई दौर की वार्ताएं हुई हैं. हम आपसी सहमति से इस समस्या का समाधान निकालना चाहते हैं लेकिन अभी दो बिंदुओं पर गतिरोध बना हुआ है.

राजनीति भी बना बड़ा मुद्दा
वहीं, पांचना बांध को लेकर स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पर काफी लंबे समय बने विवाद की एक वजह राजनीति भी है. विवाद की शुरुआत होने के बाद प्रदेश में अभी तक कांग्रेस और बीजेपी की सरकारें बनती रही हैं. इसके बाद भी इस मुद्दे का समाधान कोई सरकार नहीं निकल पाई. साल 2007 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बीजेपी ने सरकार बनाई. इसके बाद अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आई और अब बीजेपी की सरकार है. लेकिन कोई मुद्दा को सुलझा नहीं पाया है. गुर्जर नेता अशोक धाबाई कहते हैं कि इस मामले को देखने के लिए हर बार समितियां बनाईं, सर्वे किया और आश्वासन दिए गए… लेकिन कोई ऐसा बीच का रास्ता नहीं निकल पाया है जिससे इसका पूरी तरह समाधान निकल सके. कई कमेटियां और सर्वे होने के बाद भी यह मामला जस का तस बना हुआ है. दूसरी तरफ गृह मंत्री जवाहर सिंह बेढम का कहना है कि पांचना के मुद्दे पर कई लोग राजनीति कर रहे हैं. हालांकि, इस दौरान उन्होंने किसी भी नेता का नाम नहीं लिया.
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आपको बताते चलें कि पूर्व राजस्थान की कई सीटों पर गुर्जर और मीणा समाज के लोगों का प्रभाव है. ऐसे में कोई राजनीतिक दल दोनों ही समुदाय में से किसी को भी निराश नहीं करना चाहता है. दूसरी ओर गुर्जर समाज और बीजेपी नेता विजय सिंह बैंसला भी पांचना बांध से जुड़े आंदोलन में शामिल हुए थे. उन्होंने भी इस दौरान कहा था कि जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं हो जाती है तब तक नहरों में पानी नहीं छोड़ा जाएगा. वहीं, गृह मंत्री ने कहा कि पहले भी विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए हैं लेकिन कोई भी परिणाम तक नहीं पहुंच पाया.
हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं सुलझा मामला
पानी छोड़ने को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई. हाई कोर्ट ने इस मामले में दो बार नहरों में पानी छोड़ने का आदेश दिया है. इस मामले में याचिका दायर करने वाले रघुवीर मीणा का कहना है कि हम चाहते हैं कि इस मुद्दे पर अदालत के निर्देशों का पालन हो. दूसरी तरफ प्रशासन को इस बात की आशंका है कि अगर जल्द ही इस मामले में समाधान नहीं निकल तो दोनों पक्षों के बीच में तनाव बढ़ सकता है. यही वजह है कि पुलिस और प्रशासन लगातार कड़ी निगरानी बनाए हुए है. हालांकि, अभी तक इस मामले में दूसरा पक्ष कोर्ट नहीं गया है और अशोक धबाई का कहना है कि वे लोग कोर्ट में गए लेकिन अभी तक हमने रुख नहीं किया है. उन्होंने कहा कि हम किसी का पानी नहीं रोक रहे हैं लेकिन हमारी मांग है कि लिफ्ट परियोजना के माध्यम से पानी को नहरों में छोड़ा जाए और वह लोग खेती के लिए वहां से यूज कर लें.

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