MP High Court: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि यदि कोई रेप पीड़िता 24 हफ्ते तक की अपनी प्रेग्नेंसी को खत्म करना चाहती है, तो उसे इसके लिए अदालत से इजाजत लेने की कोई आवश्यकता नहीं है. हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस संदीप एन भट्ट ने 11 अगस्त को एक 16 वर्षीय रेप पीड़िता के पिता द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया. याचिका में लगभग 18 हफ्ते के गर्भ को गिराने की अनुमति मांगी गई थी.अदालत ने जबलपुर बेंच के 20 फरवरी 2025 के एक पुराने आदेश का हवाला दिया.
सभी अस्पतालों को आदेश की जानकारी देने का आदेश
सिंगल जज बेंच ने स्पष्ट किया कि यौन उत्पीड़न, बलात्कार या इनसेस्ट (पारिवारिक यौन शोषण) की शिकार महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के मामलों में, यदि गर्भ 24 सप्ताह तक का है, तो ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971’ के प्रावधानों के तहत किसी भी न्यायिक कार्यवाही या अदालती मंजूरी की जरूरत नहीं है. इसके साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य स्वास्थ्य विभाग के कमिश्नर को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे इस आदेश की जानकारी सभी संबंधित सरकारी और निजी अस्पतालों को दें, ताकि भविष्य में पीड़ित लड़कियों को समय पर उचित इलाज मिल सके और उन्हें कानूनी प्रक्रियाओं के कारण परेशान न होना पड़े.
रेप पीड़ितों को राहत
याचिकाकर्ता के वकील आशीष चौबे ने PTI को बताया कि नाबालिग रेप पीड़िता ने अपने पिता के ज़रिए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अनचाही प्रेग्नेंसी को कानूनी रूप से खत्म करने के लिए उचित निर्देश देने की मांग की थी. उन्होंने कहा कि नाबालिग लड़की रेप से हुई प्रेग्नेंसी को आगे नहीं बढ़ाना चाहती क्योंकि वह बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव से गुज़र रही है. हाई कोर्ट ने 2025 के फ़ैसले में कहा था कि यौन उत्पीड़न, रेप या इनसेस्ट (परिवार के सदस्य द्वारा यौन शोषण) की शिकार महिलाओं या लड़कियों के मामले में, 20 हफ़्ते तक की प्रेग्नेंसी को एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर खत्म कर सकता है.
पॉक्सो नियम: आपातकालीन इलाज में कागजी बाधा नहीं
वहीं, अगर प्रेग्नेंसी 20 हफ़्ते से ज़्यादा लेकिन 24 हफ़्ते से कम की है, तो ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971’ की धारा 3 और उसके तहत बने नियमों के अनुसार, दो रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर इसे खत्म कर सकते हैं. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में कानूनी कार्यवाही करने की ज़रूरत नहीं है. कोर्ट ने यह भी कहा कि यह बताना भी ज़रूरी है कि ‘बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) नियम, 2020’ का नियम 6(3) मेडिकल प्रैक्टिशनर, अस्पताल या किसी अन्य मेडिकल सुविधा केंद्र को यह निर्देश देता है कि वे किसी बच्चे को इमरजेंसी मेडिकल देखभाल देने के लिए किसी कानूनी या मजिस्ट्रेट के आदेश या किसी अन्य दस्तावेज़ की मांग न करें.
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News Source: PTI
