Home Latest News & Updates क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग…जब भगवान भोलेनाथ के लिए दहकते अंगारों पर नंगे पैर दौड़ पड़े सैकड़ों भक्त

क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग…जब भगवान भोलेनाथ के लिए दहकते अंगारों पर नंगे पैर दौड़ पड़े सैकड़ों भक्त

by Live Times 31 May 2026, 4:39 PM IST
31 May 2026, 4:39 PM IST
क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग...जब भगवान भोलेनाथ के लिए दहकते अंगारों पर नंगे पैर दौड़ पड़े सैकड़ों भक्त

Folk Culture: झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और अगाध आस्था का अनूठा संगम रांची के पिठौरिया में देखने को मिला. मौका था ऐतिहासिक महादेव मंडा पूजा का, जो श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ संपन्न हुई. भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए आयोजित इस नौ दिवसीय अनुष्ठान में भक्ति का ऐसा रूप देखने को मिला जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया. क्या बच्चे,क्या बुजुर्ग क्या महिलाएं, सभी ने दहकते अंगारों पर चलकर शिव के प्रति अपनी अटूट आस्था का परिचय दिया. ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के साथ पूरा पिठौरिया शिवमय नजर आया. ​पिठौरिया के इस भव्य धार्मिक आयोजन में 251 भोक्ताओं और 301 सोक्ताओं ने बेहद कठिन व्रत रखकर भगवान भोलेनाथ की आराधना की.

आस्था देख दंग रह गए लोग

वहीं दहकते अंगारों पर चलना, जहां नंगे पैर जलते कोयलों पर चलकर भोक्ताओं ने अपनी अटूट श्रद्धा का परिचय दिया. दूर-दूर से पहुंचे हजारों श्रद्धालु इस अलौकिक दृश्य को देखकर श्रद्धा से नतमस्तक हो गए. रात के समय पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से आए कलाकारों ने मनमोहक छऊ नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. अगले दिन मंडा पूजा का मुख्य आकर्षण झूलन कार्यक्रम रहा, जिसमें पारंपरिक महिला वेशभूषा में सजे-धजे भोक्ताओं ने ऊंचे लठ के सहारे हवा में झूलते हुए श्रद्धालुओं पर फूलों की बारिश की. मान्यता है कि इन फूलों को अपने आंचल में लेने से घर में सुख-समृद्धि आती है, जिसके लिए भक्तों में होड़ मची रही. ​इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत नागवंशी राजाओं के शासनकाल में हुई थी, जो शिव के परम उपासक थे और जिन्होंने ग्रामीण संस्कृति को संरक्षण दिया.

माता सती की याद में होती है पूजा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह कठिन पूजा माता सती के आत्मबलिदान की स्मृति में की जाती है, जहां भक्त अग्नि-परीक्षा जैसे नियमों से गुजरकर अपने आत्मसंयम का प्रदर्शन करते हैं. झारखंड की लोक संस्कृति में मंडा पूजा आदिवासी और सदानी परंपराओं के आपसी समन्वय का भी एक बड़ा प्रतीक है. पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, सामूहिक उपवास और लोकनृत्यों के माध्यम से होने वाला यह आयोजन समाज को आपसी एकता का संदेश देता है और अपनी इस अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को आज भी मजबूती से सहेजे हुए है.

लोक-संस्कृति का अनूठा प्रतीक है धार्मिक अनुष्ठान

मंडा पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और लोक-संस्कृति का अनूठा प्रतीक है. झारखंड की इस पावन धरा पर यह आयोजन आदिवासी और सदानी परंपराओं के बीच आपसी मेलजोल और समन्वय की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर पेश करता है. पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, भक्ति में डूबे लोकनृत्य, सामूहिक उपवास और भगवान भोलेनाथ की कड़े नियमों से होने वाली यह आराधना सदियों से समाज को सामाजिक एकता के सूत्र में पिरोती आ रही है. बदलते दौर में भी पिठौरिया का यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने और इस अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक बड़ा संदेश दे जाता है.

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  • रांची से संजय सिंह की रिपोर्ट

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