Ritu Mandal: सपने अगर बड़े हों और उन्हें पूरा करने का जज्बा भी उतना ही मजबूत हो, तो आर्थिक कठिनाइयां और सीमित संसाधन भी सफलता की राह नहीं रोक सकते. पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली 20 वर्षीय रितु मंडल ने इसी बात को सच साबित कर दिखाया है. राजमिस्त्री की बेटी रितु ने अहमदाबाद में आयोजित पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप 2026 में दो स्वर्ण पदक जीतकर न केवल भारत का नाम रोशन किया, बल्कि योगासन के विश्व मंच पर नया इतिहास भी रच दिया.
रितु की इस उपलब्धि की खास बात यह है कि वह विश्व योगासन चैंपियनशिप में दो स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं. उनकी यह सफलता वर्षों की मेहनत, अनुशासन, त्याग और परिवार के अटूट समर्थन का परिणाम है. यह कहानी केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि उस संघर्ष की कहानी है जो छोटे गांवों और साधारण परिवारों से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने वाले लाखों युवाओं को प्रेरित करती है.
खेलने की उम्र में घंटों अभ्यास
रितु मंडल का बचपन किसी बड़े शहर या आधुनिक खेल सुविधाओं के बीच नहीं बीता. उनके पिता एक राजमिस्त्री हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति हमेशा मजबूत नहीं रही. बावजूद इसके, उनके माता-पिता ने कभी भी अपनी बेटी के सपनों को परिस्थितियों के बोझ तले दबने नहीं दिया. रितु बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें योगासन में रुचि थी.
धीरे-धीरे यह रुचि जुनून में बदल गई. जहां उनकी उम्र के कई बच्चे सामान्य गतिविधियों में व्यस्त रहते थे, वहीं रितु घंटों अभ्यास कर अपने कौशल को निखारने में लगी रहती थीं. आर्थिक चुनौतियां थीं, संसाधनों की कमी थी, लेकिन उनके इरादों में कभी कमी नहीं आई. विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतने के बाद रितु ने कहा कि उनके परिवार ने हर परिस्थिति में उनका साथ दिया. यही वजह है कि वह कठिन दौर में भी अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटकीं.
भाई बना कोच, मार्गदर्शक और सबसे बड़ा समर्थक
रितु की सफलता की कहानी में उनके बड़े भाई गौतम मंडल का नाम बेहद महत्वपूर्ण है. गौतम स्वयं योगासन खिलाड़ी रह चुके हैं और राज्य स्तर तक प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं. लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण उनका खेल करियर आगे नहीं बढ़ सका. हालांकि उन्होंने अपने सपनों को रुकने नहीं दिया. उन्होंने अपनी बहन रितु में वह संभावना देखी, जिसे वह खुद पूरा नहीं कर पाए थे. हाल ही में फिजियोथेरेपी की पढ़ाई पूरी करने वाले गौतम अब अपना अधिकांश समय रितु के प्रशिक्षण, फिटनेस और तकनीकी सुधार में लगाते हैं.
रितु कहती हैं कि उनके भाई ने कभी उन्हें यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अपनी मंजिल तक पहुंच चुकी हैं. हर उपलब्धि के बाद भी गौतम उन्हें और बेहतर बनने की सलाह देते हैं. उनका मानना है कि एक खिलाड़ी को हमेशा सीखते रहना चाहिए और यही सोच रितु को लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रही. रितु के शब्दों में, “मेरे भाई ने कभी नहीं कहा कि मैं परफेक्ट हूं. वह हमेशा कहते हैं कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है. यही बात मुझे लगातार मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है. विश्व योगासन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने से पहले भी रितु ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था.
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों से मुकाबला करने को तैयार
उन्होंने खेलो इंडिया यूथ गेम्स और खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में कांस्य पदक जीतकर अपनी क्षमता साबित की थी. इन प्रतियोगिताओं ने उन्हें बड़े मंच पर प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास दिया. राष्ट्रीय स्तर पर मिली सफलता ने उनके भीतर यह विश्वास जगाया कि वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ भी मुकाबला कर सकती हैं. इसी आत्मविश्वास और वर्षों की तैयारी के दम पर उन्होंने अहमदाबाद में आयोजित विश्व योगासन चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और ऐसा प्रदर्शन किया जिसने सभी को प्रभावित कर दिया. विश्व योगासन चैंपियनशिप में दुनिया के कई देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेने पहुंचे थे. प्रतियोगिता का स्तर बेहद ऊंचा था और हर खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहता था. ऐसे माहौल में रितु ने संतुलन, लचीलापन, शक्ति, एकाग्रता और तकनीकी सटीकता का शानदार प्रदर्शन किया.
रितु ने पहले ही संस्करण में भारत के लिए स्वर्णिम अध्याय लिख दिया. दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद भी रितु खुद को मंजिल पर नहीं मानतीं. उनके अनुसार यह यात्रा की शुरुआत भर है. उनका सपना है कि वह आने वाले वर्षों में लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करें और देश के लिए और अधिक पदक जीतें. रितु चाहती हैं कि योगासन को भविष्य में एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और अंततः ओलंपिक में शामिल किया जाए. उनका मानना है कि योग भारत की पहचान है और इसे विश्व खेल मंच पर वह सम्मान मिलना चाहिए जिसका यह हकदार है.
भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतना सबसे बड़ा सपना
रितु का सबसे बड़ा सपना भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतना है. वह मानती हैं कि यदि योगासन को ओलंपिक में जगह मिलती है तो भारतीय खिलाड़ियों के पास विश्व मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का सुनहरा अवसर होगा. खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रतिभा के साथ-साथ आर्थिक सहयोग भी बेहद जरूरी होता है. रितु ने अपनी सफलता में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया. विश्वविद्यालय उन्हें हर महीने 13 हजार रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान करता है.
रितु का कहना है कि यह सहायता उन्हें अपने परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाले बिना प्रशिक्षण जारी रखने में मदद करती है. इससे वह अपने भविष्य और खेल पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर पाती हैं. आज रितु मंडल की कहानी केवल एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं है. यह उन लाखों बेटियों की कहानी है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखती हैं. अहमदाबाद में जीते गए ये दो स्वर्ण पदक केवल उनके गले में नहीं चमक रहे, बल्कि उन सभी युवाओं के सपनों को रोशनी दे रहे हैं जो एक दिन देश का नाम विश्व मंच पर रोशन करना चाहते हैं. अब पूरा देश उस दिन का इंतजार कर रहा है जब रितु मंडल जैसी खिलाड़ी भारत के लिए ओलंपिक मंच पर भी इतिहास रचेंगी.
