Introduction
09 May, 2026
South Superstars turned Politician: दक्षिण भारत की मिट्टी में दो ही चीजें सबसे ज्यादा फेमस हैं सिनेमा और राजनीति. यहां की सिल्वर स्क्रीन सिर्फ एंटरटेन नहीं करती, बल्कि अक्सर ये तय करती है कि राज्य की कमान किसके हाथ में होगी. कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत में सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक धर्म है. खासतौर से तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की धरती पर यही दो चीज़ें सबसे ज़्यादा जुनून पैदा करती हैं. ये एक ऐसी अनोखी दुनिया है जहां एक्टर्स के लिए मंदिर बनाए जाते हैं, उनके कट-आउट्स का दूध से अभिषेक होता है और उनकी एक आवाज़ पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आते हैं. इसी फैन पावर को जब सही पॉलिटिकल डायरेक्शन मिलती है, तो वो इलेक्शन में वोटों की ऐसी सुनामी लाती है जो दशकों पुराने राजनीतिक किलों को ढहा देती है. हाल ही में तमिलनाडु की राजनीति में एक नया इतिहास रचा गया है. सुपरस्टार ‘थलपति’ विजय की पार्टी तमिलगा वेट्टी कज़गम यानी TVK ने 2026 के विधानसभा चुनावों में 108 सीटें जीतकर न सिर्फ सत्ताधारी गठबंधन को हिला दिया, बल्कि राज्य की दशकों पुरानी ‘टू-पार्टी’ राजनीति के ढांचे को हमेशा के लिए बदल दिया. विजय का ये उदय दक्षिण भारत की उसी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत दशकों पहले एम.जी. रामचंद्रन ने की थी. ऐसे में आज हम उन्हीं साउथ सुपरस्टार्स के बारे में जानेंगे जिन्होंने पर्दे पर तो धमाल मचाया ही, लेकिन जब वो राजनीति में आए तो गजब कर दिया.
Table of Content
- थलापति विजय
- एम.जी. रामचंद्रन
- एन.टी. रामा राव
- जे. जयललिता
- विजयकांत
- चिरंजीवी
- पवन कल्याण
- रजनीकांत और कमल हासन

थलापति विजय
शुरुआत थलापति विजय के साथ ही करते हैं. विजय की राजनीति में एंट्री कोई रातों-रात लिया गया इमोशनल फैसला नहीं था. उनके 30 साल के फिल्मी करियर पर अगर हम नज़र डालें, तो पता चलता है कि वो बहुत पहले से ही अपनी जमीन तैयार कर रहे थे. विजय का फिल्मी सफर साल 1980 के दशक में एक चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में शुरू हुआ था. उनके पिता एस.ए. चंद्रशेखर, खुद एक फेमस फिल्म मेकर और कम्युनिस्ट विचारधारा के सपोर्टर थे. उन्होंने ही विजय को साल 1992 में फिल्म में लीड एक्टर बनाकर लॉन्च किया. दिलचस्प बात ये है कि विजय के पिता हमेशा से चाहते थे कि उनका बेटा पॉलिटिक्स में जाए. उन्होंने ही विजय के शुरुआती कैरेक्टर्स को इस तरह चुना कि वो आम जनता से जुड़ सकें. साल 1990 के दशक में विजय एक ‘चॉकलेट बॉय’ और रोमांटिक हीरो थे. लेकिन 2000 के दशक में उन्होंने अपना रुख बदला और अपनी ‘एंग्री यंग मैन’ की इमेज बनाई. असली बदलाव साल 2012 के बाद आया, जब उनकी फिल्म ‘कत्थी’ रिलीज़ हुई. इसमें उन्होंने किसानों के हक की बात की, ‘मेरसल’ में फ्री मेडिकल और जीएसटी के खिलाफ आवाज़ उठाई. इसके अलावा फिल्म ‘सरकार’ में इलेक्शन में होने वाली धांधली को मुद्दा बनाया. इन फिल्मों ने उन्हें सिर्फ एक एक्टर नहीं, बल्कि एक ‘सॉल्यूशन’ के रूप में पेश किया. साल 2024 में अपनी पार्टी TVK बनाने के साथ ही विजय ने अनाउंस कर दिया था कि वो अपनी फिल्म ‘जन नायक’ के बाद एक्टिंग छोड़ देंगे. विजय तब अपने करियर के पीक पर थे और एक फिल्म के लिए 100 से 200 करोड़ रुपये तक चार्ज करते थे. लेकिन विजय ने एक्टिंग छोड़ने का बड़ा फैसला लिया, क्योंकि उनका मानना है कि राजनीति कोई ‘पार्ट-टाइम’ काम नहीं है. उन्होंने कहा कि तमिलनाडु की जनता पूर्ण समर्पण की हकदार है. इसी ईमानदारी ने Gen Z के बीच उनकी साख को पत्थर की लकीर बना दिया. यही वजह है कि आज वो तमिल नाडु की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके हैं.
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एम.जी. रामचंद्रन (MGR)
अगर दक्षिण भारत में फिल्म स्टार्स के पॉलिटिकल करियर के सक्सेस का कोई ‘फादर’ रहा, तो वो थे एम.जी. रामचंद्रन यानी MGR. उन्होंने वो ‘प्लेबुक’ लिखी जिस पर आज के स्टार्स चलने की कोशिश करते हैं. एमजीआर अपनी फिल्मों में हमेशा एक ऐसे हीरो रहे जो मां का सम्मान करता था, गरीबों के आंसू पोंछता था और कभी शराब या सिगरेट को हाथ नहीं लगाता था. जब उन्होंने साल 1972 में डीएमके से अलग होकर अपनी पार्टी AIADMK बनाई, तो लोगों को लगा कि परदे का मसीहा सच में उनकी जिंदगी बदलने आ गया है. फिर साल 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद एमजीआर ने ‘मिड-डे मील’ जैसी योजना शुरू की, जिसे आज पूरा देश फॉलो करता है. उन्होंने सिनेमा की पॉपुलैरिटी को सोशल वेलफेयर से जोड़ दिया. फिल्मों के साथ-साथ लोगों ने MGR के पॉलिटिकल करियर में भी उनका खूब साथ और प्यार दिया. यही वजह है कि वो साल 1987 में अपनी मृत्यु तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे. उनके अंतिम संस्कार में उमड़ी लाखों की भीड़ इस बात का सबूत थी कि वो एक एक्टर और पॉलिटीशियन से कहीं ऊपर बन चुके थे.

एन.टी. रामा राव (NTR)
नंदमूरि तारक रामा राव, जिन्हें दुनिया NTR के नाम से जानती है. उन्होंने जो किया, वो भारतीय राजनीति में एक केस स्टडी है. उन्होंने साबित किया कि अगर इमोशन्स और मुद्दा सही हो, तो जमी जमाई सत्ता को उखाड़ने में भी टाइम नहीं लगता. एनटीआर ने 17 फिल्मों में भगवान कृष्ण और राम की भूमिकाएं निभाई थीं. यही वजह है कि, जब वो अपनी ‘चैतन्य रथम’ पर सवार होकर इलेक्शन कैंपेन के लिए निकलते, तो लोग उनके पैरों में गिर जाते थे. साल 1982 में उन्होंने ‘तेलुगु आत्म-सम्मान’ के मुद्दे पर तेलुगु देशम पार्टी यानी TDP बनाई. उन्होंने नारा दिया कि दिल्ली के गलियारों में तेलुगु मान-सम्मान को गिरवी नहीं रखा जाएगा. सिर्फ 9 महीनों में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ज़बरदस्त लहर को रोकते हुए आंध्र में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई. साल 1983 में वो राज्य के 10वें मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 2 रुपये किलो चावल जैसी योजनाएं देकर खुद को गरीबों का मसीहा साबित किया. वो 3 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे. इस बीच उन्होंने दक्षिण भारत और नेशनल लेवल पर अपनी एक अलग पहचान बनाई. 18 जनवरी, 1996 को हैदराबाद में 72 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन आंध्र प्रदेश की संस्कृति, सिनेमा और सियासत में उनका नाम हमेशा के लिए अमर हो गया.
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जे. जयललिता
जे. जयललिता, को उनके फैंस प्यार से ‘अम्मा’ कहते थे. वो भारतीय राजनीति की एक ऐसी ‘आयरन लेडी’ थीं जिन्होंने एक सक्सेसफुल एक्ट्रेस से लेकर 6 बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया. कम ही लोग जानते हैं कि जयललिता पढ़ने में बहुत तेज़ थीं और वकील बनना चाहती थीं. लेकिन परिवार को फाइनेंशियल सपोर्ट देने के लिए उन्हें सिर्फ 15 साल की उम्र में एक्टिंग की दुनिया में कदम रखना पड़ा. उन्होंने अपने करियर में 140 से ज्यादा फिल्मों में काम किया. वो अपने टाइम की सबसे महंगी एक्ट्रेस बनीं. उनकी और एम.जी. रामचंद्रन (MGR) की जोड़ी ने परदे पर सक्सेस के झंड़े गाड़ दिए. फिर उन्होंने साल 1982 में राजनीति में एंट्री की. हालांकि, जयललिता का फिल्मी करियर जितना शानदार था, उनका पॉलिटिकल करियर उतना ही चैलेंजिंग रहा. एमजीआर के निधन के बाद उन्होंने न सिर्फ AIADMK पार्टी को बिखरने से बचाया, बल्कि उसे देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक मशीनों में से एक में बदल दिया. एमजीआर की मृत्यु के बाद पार्टी के अंदर के पुरुषों ने ही उन्हें धकेलने की कोशिश की. यहां तक कि विधानसभा में उनके साथ बदसलूकी की गई. लेकिन जयललिता ने हार नहीं मानी और कसम खाई कि वो अब मुख्यमंत्री बनकर ही सदन में लौटेंगी. जीतने के बाद उन्होंने तमिलनाडु को एक वेलफेयर स्टेट बनाया. उन्होंने सरकारी योजनाओं को अपने नाम से जोड़ दिया, जैसे- ‘अम्मा कैंटीन’, ‘अम्मा पानी’, ‘अम्मा नमक’. इससे गरीब जनता को सीधे तौर पर अहसास हुआ कि उनकी मदद कौन कर रहा है. उनके नेक कामों की वजह से लोगों ने जयललिता को इतना प्यार दिया कि उन्हें ‘थलाइवी’ कहा जाने लगा.

विजयकांत
इस लिस्ट में अगला नाम है विजयकांत का. साउथ सिनेमा के फेमस एक्टर और पॉलिटीशियन, जिन्हें फैंस प्यार से ‘कैप्टन’ भी कहते थे. विजयराज अलग्रस्वामी उर्फ विजयकांत ने साल 1979 में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की. अपने करियर में उन्होंने 150 से ज्यादा फिल्मों में काम किया. फिल्म ‘कैप्टन प्रभाकरन’ की बंपर सक्सेस के बाद उन्हें ‘कैप्टन’ कहा जाने लगा. विजयकांत की सबसे बड़ी खासियत उनका अच्छा नेचर था. वो अपनी फिल्मों के सेट पर सबके लिए एक जैसा खाना खिलाने का ट्रेंड शुरू करने वाले पहले एक्टर्स में से एक थे. इतना ही नहीं उन्होंने नादिगर संगम के चेयरमैन के रूप में संगठन को लोन फ्री करने में बड़ा रोल प्ले किया. इसके बाद विजयकांत ने 2005 में अपनी पार्टी देशिया मुरपोक्कू द्रविदा कड़गम (DMDK) की स्थापना करके अपनी लाइफ का सबसे बड़ा चैप्टर शुरू किया. उन्होंने खुद को राज्य की दो बड़ी ताकतों, DMK और AIADMK, के ऑप्शन की तरह पेश किया और बहुत ही कम टाइम में ‘तीसरी बड़ी शक्ति’ बनकर सामने आए. साल 2011 में उनकी पार्टी ने शानदार परफॉर्मेंस देते हुए जयललिता की पार्टी के साथ गठबंधन किया और मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया. इसमें विजयकांत खुद विपक्ष के नेता बने. हालांकि, बाद में अपनी खराब सेहत की वजह से वो पॉलिटिक्स में उतने एक्टिव नहीं रह पाए. 28 दिसंबर 2023 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी तमिल राजनीति और सिनेमा में एक इंस्पिरेशन बनी हुई है.

चिरंजीवी
तेलुगु सिनेमा के ‘मेगास्टार’ कहे जाने वाले चिरंजीवी की जर्नी एक सिंपल परिवार से शुरू होकर साउथ फिल्मों के सबसे बड़े सिंहासन तक पहुंची है. कोनिडेला शिव शंकर वर प्रसाद उर्फ चिरंजीवी ने साल 1978 में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी. 150 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके चिरंजीवी ने न सिर्फ अपनी बेहतरीन एक्टिंग, बल्कि अपने अनोखे डांस स्टाइल और जबरदस्त एक्शन से तेलुगु सिनेमा को एक नई पहचान दी. साल 1990 के दशक में उनकी पॉपुलैरिटी ऐसी थी कि उन्हें ‘द न्यू गॉड ऑफ सिनेमा’ कहा जाने लगा. सिनेमा में उनके इसी योगदान के लिए उन्हें पद्म विभूषण और पद्म भूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा जा चुका है. साल 2008 में उन्होंने अपनी पार्टी ‘प्रजा राज्यम’ (PRP) की स्थापना की थी. हालांकि, उन्होंने भी NTR जैसी सक्सेस सोची थी. लेकिन 2009 के चुनावों में उनकी पार्टी को उतनी सीटें नहीं मिलीं, जितनी की उम्मीद थी. इसके बाद 2011 में उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया और बाद में यूपीए सरकार में केंद्रीय पर्यटन मंत्री का काम संभाला. मगर, कुछ टाइम के बाद उन्होंने एक्टिव पॉलिटिक्स से दूरी बना ली और दोबारा सिनेमा की दुनिया में वापसी की. आज वो न सिर्फ एक बड़े स्टार हैं, बल्कि अपने ‘चिरंजीवी चैरिटेबल ट्रस्ट’ के जरिए से ब्लड और आई बैंक जैसे बड़े सोशल वर्क से भी जुड़े हुए हैं.
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पवन कल्याण
चिरंजीवी के छोटे भाई पवन कल्याण ने अपने भाई की गलतियों से सीखा. उन्होंने 2014 में जन सेना पार्टी (JSP) बनाई, लेकिन जल्दबाजी नहीं की. 2019 में वे चुनाव हार गए, लेकिन मैदान नहीं छोड़ा. वैसे, वो सिर्फ एक एक्टर और पॉलिटीशियन ही नहीं, बल्कि मार्शल आर्ट्स में ब्लैक बेल्ट भी हैं. वो अपनी फिल्मों में अक्सर खुद ही स्टंट और फाइट कोरियोग्राफ करते हैं. साल 2019 के विधानसभा चुनाव में वो खुद अपनी दोनों सीटें हार गए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. पवन कल्याण ने ज़मीनी मुद्दों पर लड़ना जारी रखा. उनकी मेहनत का फल उन्हें 2024 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिला. तब उनकी पार्टी ने 100% स्ट्राइक रेट के साथ चुनाव लड़ा और सभी 21 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की. आज वो आंध्र प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री हैं और उनके पास पंचायती राज और ग्रामीण विकास जैसे बड़े डिपार्टमेंट हैं.

रजनीकांत और कमल हासन
दक्षिण भारतीय राजनीति का ये चैप्टर इन दो दिग्गजों के बिना अधूरा है. कमल हासन ने साल 2018 में ‘मक्कल नीधि मय्यम’ (MNM) बनाई. उनका विजन मॉर्डन, करप्शन फ्री और साइंस बेस पॉलिटिक्स का था. वहीं, रजनीकांत की बात करें तो, उनके राजनीति में आने की अटकलें दशकों तक चलती रहीं, जिसे ‘भारतीय राजनीति का सबसे लंबा सस्पेंस’ कहा जाता है. साल 2017 में उन्होंने आखिरकार अपनी पार्टी बनाने का ऐलान किया. उनके फैंस में जबरदस्त एक्साइटमेंट थी. माना जा रहा था कि वो तमिलनाडु की सत्ता में बड़ा बदलाव लाएंगे. हालांकि, साल 2020 के अंत में, अपनी पार्टी लॉन्च करने से ठीक पहले, उन्होंने खराब हेल्थ और कोरोना महामारी का हवाला देते हुए एक्टिव पॉलिटिक्स से पीछे हटने का फैसला कर लिया. उन्होंने अपनी राजनीतिक इकाई ‘रजनी मक्कल मंद्रम’ को भंग कर दिया. उन्होंने ये क्लियर कर दिया कि वो अब कभी चुनावी राजनीति में कदम नहीं रखेंगे. कमल हासन ने साल 2019 के लोकसभा और 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारे. हालांकि, उन्हें चुनावी मैदान में वैसी सक्सेस नहीं मिली जैसी फिल्मी करियर में मिली. उनकी पार्टी का प्रदर्शन शहरी इलाकों में तो ठीक रहा, लेकिन वो गांव के वोटर्स के बीच अपनी पैठ नहीं बना सके. कमल हासन ने फिलहाल अपनी स्वतंत्र चुनावी लड़ाई के बजाय DMK गठबंधन को सपोर्ट दे रहे हैं.

Conclusion
दक्षिण भारत में सिनेमा और राजनीति का ये कॉम्बिनेशन सिर्फ हीरो-पूजा नहीं है. ये जनता की उस गहरी सोच का प्रतीक है जहां वो अपने रील लाइफ हीरो में रक्षक ढूंढते हैं. थलापति विजय ने अपनी विदाई फिल्म ‘जन नायक’ के जरिए मैसेज दे ही दिया कि वो अब लाइट, कैमरा और एक्शन की दुनिया छोड़कर धूप, धूल और धरती की राजनीति में उतर चुके हैं. 2026 के इलेक्शन रिजल्ट बताते हैं कि तमिलनाडु की यंद जेनेरेशन, अब पुराने दलों से आगे देख रही है. विजय के रूप में उन्हें एक ऐसा चेहरा मिला है जो उनकी भाषा बोलता है और मॉर्डन दिखता है. क्या विजय पॉलिटिक्स में एमजीआर और जयललिता जैसा एम्पायर खड़ा कर पाएंगे? यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल ‘थलापति’ ने भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चैप्टर लिखने की शुरुआत कर दी है.
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