Why Filmmakers Moved From Rahman: दुनियाभर में भारत का नाम रौशन करने वाले इडियन म्यूजिशियन ए आर रहमान काफी टाइम से विवादों में हैं. हालांकि, इस बीच हर किसी का ध्यान इस बात पर गया है कि, वाकई में रहमान और बॉलीवुड में दूरियां बढ़ रही हैं. आप भी जानें इसकी वजह.
23 January, 2026
एआर रहमान का नाम सुनते ही कानों में एक खूबसूरत म्यूज़िक सुनाई देने लगता है. जय हो, लुका छुपी, बरसो रे मेघा, जश्न ए बहारा जैसे गाने कानों में गूंजने लगते हैं. ‘रोजा’ से लेकर ‘ताल’ और ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ तक, रहमान ने न सिर्फ इंडियन म्यूज़िक को बदला, बल्कि इसे ऑस्कर की दहलीज तक पहुंचाया. लेकिन आज फिल्मी गलियारों में चुपचाप ये चर्चा हो रही है कि फिल्ममेकर्स अब इस मैजिकल म्यूजिशियन से किनारा क्यों करने लगे हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो डायरेक्टर्स कभी रहमान के एक ट्यून के लिए महीनों इंतजार करते थे, वो अब नए ऑप्शन्स ढूंढ़ रहे हैं?
गुलजार की नजर में रहमान
मशहूर गीतकार गुलजार आज भी ए आर रहमान को म्यूज़िक का आखिरी ‘जीनियस’ मानते हैं. उनका कहना है कि आरडी बर्मन और मदन मोहन के बाद अगर किसी ने म्यूज़िक के फॉर्मेट को पूरी तरह बदला, तो वो रहमान ही है. गुलजार यहां तक कहते हैं कि उन्होंने पिछले 27 सालों से कोई फिल्म इसलिए डायरेक्ट नहीं की क्योंकि उन्हें आरडी बर्मन या रहमान के कद का कोई संगीतकार मिला ही नहीं.

सुभाष घई ने की तारीफ
वहीं, ‘ताल’ जैसी म्यूजिकल हिट देने वाले सुभाष घई कहते हैं कि रहमान का म्यूज़िक एक नशे की तरह है।. हालांकि, वो ये भी एक्सेप्ट करते हैं कि रहमान की अपनी शर्तें होती हैं और वो अपने ही पेस पर काम करना पसंद करते हैं. सुभाष घई जब फिल्म ‘किस्ना’ बना रहे थे तब, ए आर रहमान इतने बिज़ी थे कि उन्हें इस्माइल दरबार से मदद लेनी पड़ी थी. दरअसल, उस वक्त ए आर रहमान एक इंटरनेशनल प्रोजेक्ट में बिजी थे.
बजट और डिमांड
आज के दौर में जहां फिल्में करोड़ों के दांव पर लगी होती हैं, वहां टाइम ही सबसे कीमती है. कई डायरेक्टर-प्रोड्यूसर्स का मानना है कि रहमान के साथ काम करना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है. एक फिल्म मेकर ने बताया कि रहमान की फीस आज के दौर के बाकी कंपोजर्स से लगभग 3 गुना ज्यादा है. इसके अलावा, उनकी एक और शर्त होती है कि फिल्म को ‘एआर रहमान म्यूजिकल’ के तौर पर ब्रांड किया जाए.
बड़ी प्रोब्लम
सबसे बड़ी प्रोब्लम देरी को लेकर आती है. दरअसल, कई बड़ी फिल्मों की रिलीज डेट इसलिए आगे बढ़ानी पड़ी क्योंकि ए आर रहमान के गाने टाइम पर तैयार नहीं थे. संजय लीला भंसाली जैसे परफेक्शनिस्ट डायरेक्टर ने भी ‘बाजीराव मस्तानी’ के लिए ए आर रहमान से बात की थी. हालांकि, उनका वर्किंग स्टाइल और टाइमिंग को देखते हुए भंसाली ने खुद ही फिल्म का म्यूज़िक तैयार करने का फैसला किया.
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नए टैलेंट की धमक
हिंदी सिनेमा में अब तक प्रीतम, विशाल-शेखर और अमित त्रिवेदी जैसे म्यूज़िक कंपोजर्स का दबदबा है. हालांकि प्रीतम पर भी कभी-कभी लेट-लतीफी के आरोप लगते आए हैं. लेकिन वो फिर भी डायरेक्टर्स की पसंद बने हुए हैं. आजकल फिल्मों में एक ही कंपोजर की बजाय ‘मल्टी-कंपोजर’ ट्रेंड चल पड़ा है. यानी एक फिल्म, पांच गाने और पांच अलग-अलग संगीतकार. इससे काम जल्दी होता है और वैरायटी भी मिलती है.
साउथ से टक्कर
साउथ फिल्म इंडस्ट्री की बात करें तो, वहां भी अनिरुद्ध रविचंदर, देवी श्री प्रसाद और एम.एम. कीरावनी जैसे नाम ए आर रहमान को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. ये म्यूज़िक कंपोज़र रहमान के मुकाबले कम फीस लेते हैं और डेडलाइन को भी फॉलो करते है. एसएस राजामौली और एम.एम. कीरावनी की जोड़ी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो आपस में बेहतर तालमेल के साथ ब्लॉकबस्टर म्यूज़िक दे रहे हैं.

गिर रही है क्वालिटी?
इंडस्ट्री में कुछ लोगों का ये भी मानना है कि रहमान के म्यूज़िक की क्वालिटी में पहले जैसी बात नहीं रही. हाई फीस और लंबे इंतज़ार के बावजूद, पिछले कुछ टाइम में उनके गाने उस तरह का चार्टबस्टर मैजिक क्रिएट नहीं कर पाए हैं, जैसा 90s या 2000 की शुरुआत में होता था. ये कहना गलत नहीं है कि आज का बॉलीवुड एक ऐसे मोड़ पर है जहां जीनियस होने से ज्यादा प्रोफेशनल होना और टाइम पर काम देना मायने रखता है. रहमान बेशक म्यूज़िक की दुनिया के सम्राट हैं, लेकिन बदलती फिल्म इंडस्ट्री और बढ़ते कॉम्पटीशन ने उन्हें एक ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया है, जहां डायरेक्टर्स के पास अब और भी कई रास्ते है.
हिट्स की लाइन
वैसे हम सभी ए आर रहमान के म्यूज़िक के फैन हैं. उन्होंने अपने अब तक के करियर में रंग दे बसंती, रॉकस्टार, रोज़ा, मिमि, स्लमडॉग मिलियनेयर, गुरू, गजनी, जोधा अकबर, एनिमल, छावा, रंगीला, जाने तू या जाने ना, हाईवे जैसी हिट फिल्मों में म्यूज़िक दिया है.
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