Rising Temperature in India: ‘हाय ये गर्मी’, गर्मियां आते ही सभी की जुबान से सिर्फ यही निकलता है. हीटवेव शुरू होते ही गर्मियां सिर्फ एक मौसम नहीं, बल्कि संकट बन जाती है. मई की शुरुआत के साथ ही कई राज्यों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है. दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की गर्मी लोगों को झुलसा रही है और हीटस्ट्रोक के मामले बढ़ने लगे हैं. गर्मियों की धूप उन लोगों के लिए सबसे खतरनाक होती है, जो बाहर धूप में काम करते हैं. हालात ऐसे हैं कि हीटवेव अब सिर्फ थोड़े समय की समस्या नहीं रही. ये हर साल लंबा और ज्यादा खतरनाक होती जा रही हैं.
भारत जैसे बड़े और घनी आबादी वाले देश के लिए बढ़ती गर्मी चिंता की बात बनती जा रही है. हीटवेव न सिर्फ लोगों की सेहत पर असर डाल रही हैं, बल्कि खेती, पानी, बिजली और इकॉनमी को भी प्रभावित कर रही है. इसके साथ ही भारत में मौसम का पैटर्न भी तेजी से बदल रहा है. पहले सर्दियां और वसंत समय पर आते थे, लेकिन अब देर से आते हैं और जल्दी चले जाते हैं. मौसम विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर समय रहते पर्यावरण की सुरक्षा और कार्बन एमिशन को कंट्रोल नहीं किया गया, तो आने वाले सालों में भारत में गर्मी और भी खतरनाक हो सकती है.
दुनिया में सबसे ज्यादा गर्म है भारत
रियल-टाइम ग्लोबल तापमान रैंकिंग के अनुसार, दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 95 से 98 शहर भारत में स्थित हैं. वहीं, Aqi.in की रैंकिंग में, अत्यधिक गर्मी की स्थिति वाले सभी 100 शहर भारत के ही हैं. आंकड़ों के हिसाब से देखें तो, 1961 से 2021 के बीच हीटवेव के दिनों की संख्या में लगभग 2.5 दिनों की बढ़ोतरी पहले ही हो चुकी है. इसलिए, यह समझना बहुत जरूरी हो गया है कि हीटवेव इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं, इसके मुख्य फैक्टर क्या हैं और हम इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं.

क्या है हीटवेव?
जब किसी क्षेत्र का तापमान लंबे समय तक 40°C या सामान्य से 5-6 °C ज्यादा रहता है, तो उसे हीटवेव कहा जाता है. इसे आम भाषा में लू चलना कहते हैं. दिल्ली, यूपी, बिहार, राजस्थान, एमपी, हरियाणा, महाराष्ट्र और ओडिशा में अक्सर मई-जून की गर्मी में तापमान 45°C या उससे पार चला जाता है. दक्षिण राज्यों में तापमान कम रहता है लेकिन उमस वाली गर्मी होती है. हीटवेव सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जानवरों और फसलों के लिए भी खतरनाक होता है. हीटवेव के दौरान सरकार को पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित करनी पड़ती है. हीटवेव में लंबे समय तक काम करने से लोगों को हीटस्ट्रोक की समस्या होती. हीटस्ट्रोक होने पर तुरंत सावधानी नहीं बरती गई तो, व्यक्ति की जान भी जा सकती है.
बदलता मौसम पैटर्न
भारत में मौसम का चक्र धीरे-धीरे बदल रहा है. जहां पहले सर्दियां नवंबर से फरवरी तक महसूस होती थीं, वहीं अब ठंड दिसंबर से जनवरी तक ही सिमट कर रह गई है. इसके अलावा वसंत का मौसम अब गायब सा हो गया है. पहले फरवरी और मार्च के महीने सुहावने हुआ करते थे. अब, जैसे ही फरवरी आती है, तापमान अचानक 30°C से ऊपर पहुंच जाता है. भारत में इस बदलते हुए मौसम पैटर्न का कारण भी पृथ्वी का बढ़ता तापमान है.
बढ़ती गर्मी का कारण
ग्लोबल वार्मिंग- विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी बढ़ने का सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है. पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है. इस घटना के पीछे मुख्य वजह कार्बन उत्सर्जन है. कारखानों, गाड़ियों और कोयले से चलने वाले पावर प्लांट से निकलने वाला धुआं वातावरण में जमा हो रहा है, जिसमें कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड होता है. यह गैस धरती की गर्मी को रोक लेती है, जिससे तापमान बढ़ता है. इसके अलावा आजकल की खेती, पशुपालन और लैंडफिल से मीथेन निकलती है, जो गर्मी सोखने में कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना ज्यादा असरदार है. इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के अनुसार, वैश्विक औसत तापमान औद्योगिकरण से पहले की तुलना में 1.1°C बढ़ चुका है.
अल नीनो- अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं गर्मी को और बढ़ा देती हैं. अल नीनो के दौरान, प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ जाता है, जिसका असर भारत समेत कई देशों के मौसम पर पड़ता है. अल नीनो सक्रिय होने पर तापमान सामान्य स्तर से ऊपर चला जाता है, जिससे भारत की ओर आने वाली मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं. इस कारण कई राज्यों में सूखे जैसे हालात हो जाते हैं. महासागरों के गर्म होने की दर 2005 के बाद से तेजी से बढ़ी है और पिछले दो दशकों में यह लगभग दोगुनी हो गई है.

जंगलों की कटाई– पेड़ हवा से CO2 सोखकर धरती को ठंडा रखते हैं. खेती के लिए शहरीकरण और जंगलों को साफ करने से सीधे तौर पर हवा में गर्मी फंसाने वाली गैसें जमा हो रही हैं.
अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट- आज के शहरों की पहचान कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और बहुत सारी गाड़ियां हैं. वे दिन भर गर्मी सोखते हैं और रात में भी तापमान को ठंडा होने से रोकते हैं, जिससे शहर गांव के इलाकों से कई डिग्री ज्यादा गर्म हो जाते हैं. इसके अलावा एयर कंडीशनर का ज्यादा इस्तेमाल और जल निकायों (तालाबों, झीलों) का सूखना शहरों को और भी ज्यादा गर्म बना रहा है. जहां AC घर के अंदर ठंडक देता है, वहीं वह गर्म हवा को बाहर निकालता है, जिससे आस-पास के इलाके का तापमान बढ़ जाता है.
ज्यादा गर्मी का असर
बिजली संकट
जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, घरों और ऑफिसों में एयर कंडीशनर और कूलर का इस्तेमाल भी बढ़ता है. इसका बिजली की मांग पर सीधा असर पड़ता है. अक्सर हालात इतने गंभीर हो जाते हैं कि बिजली की मांग रिकॉर्ड तोड़ स्तर तक पहुंच जाती है. हमारा मौजूदा पावर ग्रिड और ट्रांसफॉर्मर इतने भारी लोड को संभालने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं. यही वजह है कि गर्मियों के महीनों में ट्रांसफॉर्मर खराब होने और लंबे समय तक बिजली गुल रहने की घटनाएं ज्यादा होने लगती हैं. सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है जब रात में बिजली चली जाती है, क्योंकि उसी समय लोगों को राहत की सबसे ज्यादा जरूरत होती है.
सेहत के लिए बढ़ता खतरा
बढ़ता तापमान अब सिर्फ एक असुविधा नहीं रह गया है, बल्कि जान का खतरा बन गया है. हीटवेव के कारण अस्पतालों में हीटस्ट्रोक (लू लगने) के मामलों में बढ़ोतरी होती है. सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को है जिन्हें रोजाना धूप में बाहर काम करना पड़ता है- जैसे मजदूर, किसान, डिलीवरी करने वाले लोग और सड़क पर काम करने वाले लोग. इसके अलावा, बहुत ज्यादा गर्मी बच्चों, बुज़ुर्गों और दिल की बीमारी या डायबिटीज जैसी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है. कई मामलों में, इंसान का शरीर बढ़ते तापमान को झेल नहीं पाता, जिससे जान जाने का खतरा बढ़ जाता है.

खेती, पानी और महंगाई पर असर
छोटी सर्दियां और लंबी गर्मियां मॉनसून के चक्र को बिगाड़ रही हैं. अगर बारिश में देरी होती है या बारिश कम होती है, तो जमीन के नीचे का पानी (ग्राउंडवॉटर) तेजी से घटने लगता है. इसका खेती-बाड़ी पर बुरा असर पड़ता है, जिससे फसलों की पैदावार कम हो जाती है. जब अनाज, फलों और सब्ज़ियों की बाजार में सप्लाई कम हो जाती है, तो महंगाई बढ़ना तय है. यानी बढ़ते तापमान का असर सिर्फ मौसम तक ही सीमित नहीं है, यह आम आदमी की जेब पर भी सीधा असर डाल सकता है.
क्या भविष्य और भी ज़्यादा खतरनाक हो सकता है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले सालों में हालात और भी ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं. भारत के कई इलाकों में “वेट-बल्ब तापमान” की स्थिति पैदा हो सकती है. आसान शब्दों में कहें तो, इसका मतलब यह है कि हवा में गर्मी और नमी इतनी ज़्यादा होगी कि शरीर का पसीना ठीक से सूख नहीं पाएगा. पसीना शरीर को ठंडा रखने का काम करता है, लेकिन जब यह सूख नहीं पाता, तो शरीर अपने तापमान को ठीक से नियंत्रित नहीं कर पाता. अगर ऐसे हालात लंबे समय तक बने रहे, तो एक स्वस्थ व्यक्ति की जान भी खतरे में पड़ सकती है. इसके अलावा आने वाले सालों में हीटवेव के दिनों की संख्या बढ़कर 12 से 18 दिनों के बीच पहुंच सकती है.

हम क्या कर सकते हैं?
बढ़ती गर्मी को रोकने का कोई तत्काल समाधान संभव नहीं है, लेकिन सही कदम उठाकर इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है. शहरी इलाकों में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने, गाड़ियों का इस्तेमाल कम करने की और जल निकायों को संरक्षित करने की जरूरत है. साथ ही नई इमारतों को इस तरह से डिजाइन किया जा सकता है कि वे कम गर्मी सोखें. इसके अलावा, सरकारों को गरीबों और बेघर लोगों के लिए सार्वजनिक ‘कूलिंग सेंटर’ स्थापित करने चाहिए. बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता कम करना और सौर तथा पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना भी बहुत जरूरी है. साथ ही, शहरो में जल संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता देना, भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं.
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