Ishwar Bhardwaj: योग जगत के प्रख्यात विद्वान, शिक्षाविद, शोधकर्ता और योग के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन समर्पित करने वाले प्रो. डॉ. ईश्वर भारद्वाज का निधन हो गया. भारद्वाज का निधन योग समुदाय के लिए बड़ी क्षति है. योग के विशेषज्ञ उन्हें ‘भीष्म-पितामह’ के नाम जानते है. उनके सहज व्यक्तित्व के साथ-साथ योग विद्या में उनके व्यापक योगदान को याद किया जा रहा है.
भारत में बदली योग शिक्षा की दिशा
डॉ. भारद्वाज की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ एक योग शिक्षक की नहीं थी, बल्कि उन्होंने योग को आसन, प्राणायाम और ध्यान की पारंपरिक साधना से आगे ले जाकर विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले अकादमिक विषय, शोध का क्षेत्र और वैज्ञानिक अध्ययन का विषय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनकी करीब साढ़े तीन दशक से अधिक की अकादमिक और शोध यात्रा ने भारत में योग शिक्षा की दिशा बदलने में अहम योगदान दिया.
योग को विश्वविद्यालयों तक पहुंचाने की बड़ी पहल
डॉ. ईश्वर भारद्वाज की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक योग को उच्च शिक्षा के व्यवस्थित पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की दिशा में उनका काम माना जाता है. गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, 1984 में डॉ. भारद्वाज के विशेषज्ञ मार्गदर्शन में योग का चार महीने का डिप्लोमा शुरू हुआ. आगे चलकर यह एक वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा बना. इसके बाद योग को स्नातक स्तर पर वैकल्पिक विषय के रूप में शुरू किया गया और 1992 में योग में MA/M.Sc. तथा 1996 में PhD कार्यक्रम शुरू हुआ. विश्वविद्यालय इसे योग शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शुरुआती पहलों में गिनता है.
शोध के क्षेत्र में बड़ी भूमिका
डॉ. भारद्वाज ने योग में शोध की मजबूत अकादमिक परंपरा तैयार करने में भी योगदान दिया. उन्होंने दो दशक से अधिक समय तक PhD शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया. अलग-अलग आधिकारिक प्रोफाइलों में उनके निर्देशन में 30 से अधिक और एक हालिया प्रोफाइल में 43 PhD पूर्ण होने का उल्लेख है. उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी संख्या में सेमिनार, कॉन्फ्रेंस और संगोष्ठियों में भाग लिया और कई कार्यक्रमों का आयोजन और अध्यक्षता भी की. एक संस्थागत प्रोफाइल के अनुसार उन्होंने 23 राष्ट्रीय और 4 अंतरराष्ट्रीय सेमिनार/कॉन्फ्रेंस आयोजित या अध्यक्षता की. उनके नाम 90 से अधिक शोध एवं लेख प्रकाशित होने तथा चार पुस्तकों के लेखन का भी उल्लेख मिलता है.
भारत से विदेशों तक योग का प्रचार
योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक पहचान दिलाने की दिशा में भी डॉक्टर भारद्वाज ने काम किया. उन्होंने चीन, थाईलैंड, मॉरीशस, कनाडा और नेपाल सहित कई देशों की यात्राएं कीं और योग शिक्षा तथा शोध के विस्तार से जुड़े कार्य किए. गुरुकुल कांगड़ी के योग विभाग का विस्तार भी इसी सोच को दिखाता है. विभाग के अनुसार उसके प्रशिक्षित विद्यार्थी भारत के अलावा अमेरिका, मॉरीशस, दुबई, थाईलैंड, इंडोनेशिया, ब्रिटेन, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, जापान, रूस और चीन जैसे देशों में योग के प्रचार-प्रसार से जुड़े.
आज जब योग दुनिया भर में स्वास्थ्य, मानसिक शांति, जीवनशैली और समग्र स्वास्थ्य से जोड़ा जा रहा है. तब उसके अकादमिक और शोध आधारित विस्तार में डॉ. ईश्वर भारद्वाज जैसे विद्वानों की भूमिका को याद करना बेहद जरूरी है. उनके निधन से योग जगत ने एक ऐसे शिक्षक और विद्वान को खो दिया. जिसने योग को केवल सिखाया नहीं, बल्कि योग को पढ़ने, पढ़ाने, समझने, शोध करने और दुनिया तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था को मजबूत करने में जीवन लगा दिया.
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