Kidney Diseases: किडनी के मरीजों के लिए राहतभरी खबर है. अब उन्हें डायलिसिस जैसी जटिल प्रक्रियाओं से नहीं गुजरना पड़ेगा, साथ ही कम खर्च में ही इलाज हो सकेगा. डॉक्टर शुरुआत में ही बीमारी का पता लगा लेंगे और सटीक इलाज शुरू कर देंगे, जिससे वे स्वस्थ जीवन जी सकेंगे. यह संभव किया है IIT मद्रास और CMC के शोधकर्ताओं ने. IIT मद्रास और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (CMC) वेल्लोर के शोधकर्ताओं ने किडनी की बीमारियों का जल्द पता लगाने के लिए तीन नए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित टूल्स विकसित किए हैं. यह तकनीक दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करने वाली किडनी की समस्याओं की जांच को और आसान बनाएगी.
शुरुआत में ही चलेगा बीमारी का पता
इन तकनीकों में पहला एक मशीन लर्निंग मॉडल है, जो मरीज की क्लिनिकल और लैबोरेटरी रिपोर्ट के आधार पर क्रोनिक किडनी डिजीज के जोखिम का पहले ही अनुमान लगा लेता है. दूसरा एक डीप लर्निंग सिस्टम है, जो स्वचालित रूप से CT स्कैन का विश्लेषण कर किडनी को चार श्रेणियों नॉर्मल, सिस्ट, स्टोन और ट्यूमर में सटीक रूप से बांटता है. तीसरा एक 3D इमेजिंग प्लेटफॉर्म है, जो ट्यूमर के आकार और किडनी पर उसके प्रभाव का सटीक आकलन करने के लिए CT स्कैन को 3D विजुअल्स में बदल देता है. यह भारतीय नवाचार किडनी के इलाज और सटीक सर्जरी में गेम चेंजर साबित होगा. IIT मद्रास के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर GL सैमुअल ने बताया कि किडनी की बीमारियां शुरुआती स्टेज में अक्सर बिना किसी लक्षण के होती हैं और काफी नुकसान होने तक इनका पता नहीं चल पाता है.
कम खर्च में होगा इलाज
इन AI टूल्स का मकसद डॉक्टरों को तेज़ी से और सही नतीजे देकर मदद करना है, खासकर तेज़ी से बदलते हेल्थ केयर माहौल में. ये टूल्स बीमारी का जल्दी पता लगाने में मदद कर सकते हैं, जिससे बीमारी के बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो सकती है और डायलिसिस जैसे महंगे इलाज की ज़रूरत कम हो सकती है. टीम का मकसद ऐसे इंटेलिजेंट सिस्टम बनाना था जो डॉक्टरों को तेज़ी से और सही जानकारी के आधार पर फ़ैसले लेने में मदद कर सकें. सैमुअल ने कहा कि हमने ऐसे टूल्स बनाने के लिए क्लीनिकल जानकारी के साथ-साथ मशीन लर्निंग का इस्तेमाल किया, जो किडनी की बीमारियों का जल्दी पता लगाने और मरीज़ के हिसाब से ज़्यादा डिटेल वाली जानकारी देने में मदद करेंगे. CT इमेज क्लासिफायर को 12,000 से ज़्यादा इमेज के साथ ट्रेन किया गया है और यह स्वस्थ किडनी को सिस्ट, पथरी और ट्यूमर से अलग पहचान सकता है.
बीमारी का जल्दी पता लगाना बहुत जरूरीः जेनिफर
IIT मद्रास की रिसर्च स्कॉलर जेनिफर डिलाइटा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किडनी की बीमारियों के मामले में बीमारी का जल्दी पता लगाना बहुत ज़रूरी है. डिलाइटा ने कहा कि ये AI टूल्स जोखिम वाले मरीज़ों का जल्दी पता लगाने और उनके इलाज की बेहतर योजना बनाने में मदद कर सकते हैं. मरीज़ के हिसाब से बनाया गया इमेजिंग फ़्रेमवर्क बहुत उम्मीद जगाता है क्योंकि यह बीमारी के दायरे की ज़्यादा पूरी तस्वीर देने के लिए स्टैंडर्ड माप से आगे बढ़कर काम करता है. टीम ने इसे और ज़्यादा सटीक बनाने और इसे इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों के लिए आसानी से समझने लायक बनाने पर भी काम किया ताकि वे इसके आधार पर अनुमान लगा सकें.
क्रोनिक किडनी डिजीज के जोखिम का लगेगा सटीक अनुमान
यह स्टडी किडनी का ‘डिजिटल ट्विन’ बनाने की दिशा में एक अहम कदम है. इसमें AI की मदद से इमेज एनालिसिस और मरीज़ के हिसाब से 3D एनाटॉमिकल मॉडल को मिलाकर पर्सनल क्लिनिकल फ़ैसले लिए जा सकते हैं. इसके ज़रिए मरीज़ के अंगों के वर्चुअल ट्विन का इस्तेमाल करके हर मरीज़ के लिए अलग-अलग इलाज की निगरानी, अनुमान और योजना बनाई जा सकती है. रिसर्चर इन AI टेक्नोलॉजीज़ को कम से कम चीर-फाड़ वाले पहनने योग्य सेंसिंग सिस्टम और डिजिटल ट्विन प्लेटफ़ॉर्म के साथ लंबे समय तक जोड़ने पर भी काम कर रहे हैं, ताकि किडनी की सेहत की पर्सनल निगरानी की जा सके. AI टूल्स के जरिए क्रोनिक किडनी डिजीज के जोखिम का सटीक अनुमान लग सकेगा.
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News Source: PTI
