Home Latest News & Updates जलियांवाला बाग नरसंहार: खूनी इतिहास की वह 13 अप्रैल; जब बुजुर्ग और महिलाओं पर चलीं अंधाधुंध गोलियां

जलियांवाला बाग नरसंहार: खूनी इतिहास की वह 13 अप्रैल; जब बुजुर्ग और महिलाओं पर चलीं अंधाधुंध गोलियां

by Sachin Kumar
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April 13 Jallianwala Bagh Massacre

Introduction

Jallianwala Bagh Massacre : 13 अप्रैल वह खौफनाक तारीख है, जो भारतीय इतिहास के कैलेंडर पर स्याही से नहीं बल्कि खून से लिखी गई थी. आज जलियांवाला बाग नरसंहार स्मृति दिवस है. यही वह दिन है जब मौत ने भी जिंदगी की भीख मांगी थी और इंसानी लाशों ने इस धरती को कोख बनाकर ढक लिया था. 13 अप्रैल, 1919 को बर्बरता का वह चरम था जिसके निशान आज भी अमृतसर के उस बाग में मिल जाएंगे और इस घटना ने भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था. हालांकि, अंग्रेजों ने इस हत्याकांड के लिए आज तक भारत से माफी नहीं मांगी है और न ही कभी इसके बारे में कोई गंभीर चर्चा की.

13 अप्रैल, 1919 वह तारीख है जो अंग्रेजी शासन की क्रूरता को बयां करता है और आज भी जब उस बाग को कोई देखने के लिए जाता है तो वह जख्म ताजे हो जाते हैं. साथ ही इतिहास की यह वह घटना है जिसको कभी भूला नहीं जा सकता है. ये दिखाता है कि हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई करते हुए कितनी कुर्बानियां दी थीं.

Table Of Content

  • अचानक दिया फायरिंग का ऑर्डर
  • एकमात्र रास्ता कर दिया था बंद
  • कुआं भी नहीं बचा सका जान
  • रॉलेट एक्ट से भड़का था विद्रोह
  • क्या था कानून में?
  • 13 अप्रैल को हुआ जलियांवाला बाग
  • 1933 में इंग्लैंड पहुंचे थे ऊधम सिंह
  • झंडे को झुका दिया गया

अचानक दिया फायरिंग का ऑर्डर

13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी का त्योहार था और इसको पूरे प्रांत में काफी उत्साह से मनाया जा रहा था. इसी दिन पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग में हजारों की संख्या में आम लोग जुटे थे और कई लोग अपने परिवार के साथ यहां पर मेला देखने के लिए आए थे. साथ ही कुछ लोग ऐसे भी थे जो शांति से अपनी बात लोगों के सामने रखने के लिए आए थे. हालांकि, भारी संख्या उन लोगों की थी जो बैसाखी का त्योहार मनाने के लिए आए थे. उस दौरान माहौल काफी शांत था और किसी को नहीं पता था कि कुछ ही देर में क्या होने वाला है.

Jallianwala Bagh Massacre

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एकमात्र रास्ता कर दिया था बंद

खुशियां मनाने के लिए इकट्ठा हुए लोगों के बीच जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ यहां पर पहुंच गया. डायर ने बिना किसी चेतावनी के बाहर निकलने वाले रास्ते को बंद कर दिया, ताकि उस वक्त कोई भी व्यक्ति बाग से जान बचाने के लिए बाहर नहीं निकल सकें. इसके बाद अचानक उसने सैनिकों को निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया गया. बताया जाता है कि डायर ने करीब 10 मिनट तक गोलियां चलवाईं और उस वक्त जब लोग जान बचाने के लिए दीवार की तरफ भागे तो भी कुछ नहीं कर पाए, क्योंकि दीवारें काफी ऊंची थीं जिसे वह पार नहीं कर पाए.

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कुआं भी नहीं बचा सका जान

अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों से बचने के लिए जब लोगों को कहीं रास्ता नहीं दिखा तो वहां पर मौजूद एक कुएं में लोगों ने कूदना शुरू कर दिया. उन लोगों को लगा कि शायद इस कुएं में कूद जाएंगे तो जान बच जाएगी. कुछ ही देर में कुआं भी लाशों के ढेर से भरने लगा. आज भी उस बाग की दीवारों पर निशान नजर आते हैं और वहां पर मंजर इतना खौफनाक था कि सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

April 13 Jallianwala Bagh Massacre

रॉलेट एक्ट से भड़का था विद्रोह

ब्रिटिश सरकार ने लोगों पर शिकंजा कसने के लिए नए-नए कानून पारित करना शुरू कर दिया था. इसकी वजह से लोगों के बीच में गुस्सा बढ़ने लगा और उसी बीच गुस्साए लोगों के जख्म पर नमक लगाने का काम ब्रिटिशों के रॉलेट एक्ट ने किया. फर्स्ट वर्ल्ड वार के बाद ब्रिटिशों ने देश में ऐसे कानून बनाना शुरू कर दिया जिससे लोगों को पूरी तरह कैदी बना दिया जाए और कहीं से भी विरोध का स्वर न उठ सकें.

लोगों को दबाने के लिए जस्टिस रॉलेट की अध्यक्षता में कमेटी ने एक बिल रॉलेट एक्ट तैयार किया. यह कानून 1918 में तैयार कर दिया गया था. इसके बाद 6 फरवरी और 18 मार्च 1919 को तमाम विरोधों के बाद भी कानून को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में पारित कर दिया गया.

April 13 Jallianwala Bagh Massacre

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क्या था कानून में?

रॉलेट एक्ट के तहत भारत में कोई भी क्रांतिकारी आंदोलन करेगा तो वह देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाएगा. साथ ही प्रशासन को बिना किसी वारंट के गिरफ्तारी करने की आजादी दी गई थीं और 2 साल तक जेल में रखा जा सकता था. इस कानून ने पूरे देश में विरोध की एक चिंगारी को जगा दिया था. इस दौरान देश में बंगाल और पंजाब में जमकर विरोध हो रहा था. पंजाब में तो हद से ज्यादा विरोध किया गया और लोग जगह-जगह बैठक करने लगे.

13 अप्रैल को हुआ जलियांवाला बाग

बैसाखी का त्योहार मनाने के लिए 15-20 हजार लोग इकट्ठा हुए और इस दौरान नेताओं के भाषण भी चल रहे थे. इसके बाद जनरल डायर ने सैनिकों को राइफलों के साथ वहां पर पहुंचा दिया. इसके बाद सैनिकों ने चारों तरफ से बाग को घेर लिया और एकमात्र बाहर निकलने वाले रास्ते को भी बंद कर दिया. लोगों ने इधर-उधर भागना शुरू कर दिया लेकिन इसके बाद भी वह अंग्रेजों की गोलियों से बच नहीं सकें. वहीं, आधिकारिक रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस हत्याकांड में 379 लोगों की मौत हुई है, जबकि इतिहासकार मानते हैं कि करीब डेढ़ हजार लोगों की मौत हुई थीं. मरने वालों में बूढ़ी औरतें, मर्द, औरत और मासूम बच्चे भी शामिल थे. जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद अंग्रेजी हुकूमत को लगा कि भारतीय डर जाएंगे लेकिन इसके बाद आंदोलन उग्र हो गया.

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1933 में इंग्लैंड पहुंचे थे ऊधम सिंह

ऊधम सिंह ने एक जाली पासपोर्ट के माध्यम से 1933 में ब्रिटेन में प्रवेश किया. 1937 में उन्हें लंदन के शेफर्ड बुश गुरुद्वारे में देखा गया और उस दौरान उन्होंने शानदार सूट पहन रखा था. साथ ही वह अपनी दाढ़ी भी कटा चुके थे और वहां पर वह ज्यादातर इंग्लिश में ही बात करते थे. इसी बीच उन्होंने अपने एक करीबी शख्स को बताया कि वह एक मकसद को पूरा करने के लिए इंग्लैंड आए हैं. जब माइकल ओ ड्वाएर को मारने के लिए ऊधम सिंह आगे बढ़े तो उन्हें लगा कि वह हाथ मिलाने के लिए आ रहे हैं. इसी बीच उन्होंने ऊधम सिंह के हाथ में बंदूक देखी और ऊधम ने बिना कोई समय गंवाए फायर करना शुरू कर दिया. गोली ड्वाएर की पसली को तोड़ती हुई उनके दिल के दाहिने हिस्से को भेदती हुई बाहर निकल गईं. इसके आधे घंटे के अंदर ही 150 पुलिस वालों ने कैक्सन हॉल को घेर लिया.

April 13 Jallianwala Bagh Massacre

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झंडे को झुका दिया गया

वहीं, इस घटना के बाद ब्रिटेन और लाहौर में झंडे को झुका दिया गया. हाउस ऑफ कॉमंस में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने ड्वाएर के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की. भारत में महात्मा गांधी ने इस हत्या की निंदा की थी और लंदन में 200 भारतीयों ने भी इकट्ठा होकर इस हत्या की निंदा की. इसके अलावा मुकदमे के दौरान ऊधम सिंह ने ब्रिटिश सरकार की साख को नीचा दिखाने में एक भी मौका नहीं छोड़ा. जज ने उनसे पूछा कि आप ये बताएं कि आपको फांसी की सजा क्यों न दी जाए? इस पर उधम सिंह ने कहा कि मुझे मौत की सजा की कोई परवाह नहीं है, क्योंकि मैं एक उद्देश्य को पूरा करने के बाद मर रहा हूं. मैंने इसलिए किया क्योंकि वह हमारे लोगों को कुचलना चाहता था और यही वजह है कि मैंने उसे कुचल दिया.

Conclusion

जलियांवाला बाग हथियाकांड ने पूरे भारतीय समाज को हिलाकर रख दिया और अंग्रेजी हुकूमत का क्रूर चेहरा पूरी तरह लोगों के सामने आ गया था. उसके बाद ही लोगों ने भी तय कर दिया कि अब इस हुकूमत भारत में रहने का अधिकार नहीं है. इसके अलावा देश में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम को भी इसने धार देने का काम किया. हालांकि, इस घटना को आज भी जब भारतीय समाज याद करता है तो वह खौफ में आ जाते हैं कि अंग्रेज कितने क्रूर हुआ करते होंगे. जनरल डायर ने मासूम लोगों को चारों तरफ से घेरकर मारा था और जब वह कुएं में जान बचाने के लिए कूदे तो वहां पर भी अपने सैनिकों को भेजकर गोली चलाने का आदेश दिया. शहीदों के बलिदानों को याद करते हुए सरकार ने एक भव्य स्मारक बनवाया है और हर साल स्मृति दिवस के मौके पर हजारों की संख्या में लोग यहां पर पहुंचते हैं और देश के फ्रीडम फाइटरों को याद करते हैं.

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