Nepal Floods: नेपाल इस समय सिर्फ तबाही के निशान नहीं मिटा रहा, बल्कि एक ऐसे अदृश्य संकट से भी जूझ रहा है, जिसका असर शायद लंबे समय तक दिखाई देगा. देश में आई पिछले एक दशक की सबसे घातक बाढ़ ने सैकड़ों परिवारों से उनके घर, जिंदगी और अपनों को छीन लिया है. पानी भले ही कई इलाकों से उतरने लगा हो, लेकिन लोगों के मन में बाढ़ अब भी मौजूद है. कई बच्चे रात में डरकर उठ जाते हैं. उन्हें लगता है कि बाढ़ फिर लौट आई है. कुछ बच्चे नींद में चीखते हैं कि पानी आ गया. वहीं, कई बड़े लोग लगातार घबराहट, बेचैनी और डर महसूस कर रहे हैं. परिवारों के बिछड़ने और अपनों का पता नहीं चलने की चिंता ने इस मानसिक दबाव को और बढ़ा दिया है.

900 से ज्यादा लोगों ने गवाई जान
बताया जा रहा है कि इस विनाशकारी बाढ़ में 900 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं, करीब 4,000 लोग अब भी लापता हैं. 11,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है. कई बस्तियां, मकान, सड़कें और पुल बाढ़ की तेज धार में तबाह हो गए हैं. बाढ़ के बाद शुरुआती दौर में सरकार और राहत एजेंसियों का पूरा ध्यान लोगों को बचाने, खाना-पानी पहुंचाने और सुरक्षित जगहों तक ले जाने पर था. हालांकि, अब जब तत्काल राहत का दौर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, तो एक नई जरूरत सामने आई है और वो है लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल. यही वजह है कि सरकार ने सबसे ज्यादा प्रभावित रसुवा और नुवाकोट जिलों में करीब 50 मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और मनोसामाजिक काउंसलरों को तैनात किया है. इसके अलावा बागमती प्रांत में 64 प्रशिक्षित काउंसलरों को तैयार रखा गया है, ताकि जरूरत बढ़ने पर उन्हें तुरंत प्रभावित इलाकों में भेजा जा सके.
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डर में गुजर रही हैं रातें
नुवाकोट के बिदुर में काम कर रहे मनोवैज्ञानिक गोपाल बोहरा के मुताबिक, कई लोग अभी इतने सदमे में हैं कि वे अपनी परेशानी शब्दों में भी नहीं बता पा रहे हैं. उनकी टीम ने ऐसे बच्चों को देखा है जो रात में बार-बार नींद से उठते हैं. वो रोते हुए कहते हैं कि बाढ़ वापस आ गई. ये डर बताता है कि प्राकृतिक आपदा खत्म होने के बाद भी उसका असर बच्चों के दिमाग में कितनी गहराई तक रह सकता है. वयस्कों में भी बेचैनी, लगातार डर और छोटी-सी आवाज पर चौंक जाने जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं. कई लोग अपने घर और सामान के साथ-साथ अपने पड़ोस, रिश्तेदारों और पूरे समुदाय को खोने के दर्द से भी गुजर रहे हैं.
पहले सुरक्षा, फिर काउंसलिंग
स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम में शामिल मनोचिकित्सक निराजन भट्टराई का कहना है कि इस समय सबसे जरूरी चीजें हैं, सुरक्षा, भोजन, रहने की जगह और जरूरी चिकित्सा सुविधा. बाढ़ की वजह से जिन लोगों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दवाएं बंद हो गई हैं, उन्हें दोबारा दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं. गंभीर नींद की समस्या से जूझ रहे लोगों को भी तत्काल चिकित्सा सहायता दी जा रही है. फिलहाल विशेषज्ञों का काफी समय परिवारों को दोबारा मिलाने, लोगों को आश्रय और चिकित्सा सेवाओं से जोड़ने में जा रहा है.

अब शुरू होगी असली परीक्षा
विशेषज्ञों की चिंता ये है कि बाढ़ का मानसिक असर अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है. आपदा के तुरंत बाद लोग किसी तरह सुरक्षित रहने और अपने परिवार को खोजने में व्यस्त रहते हैं. जब हालात सामान्य होने लगते हैं, तब डर, दुख, नींद की परेशानी और चिंता ज्यादा होती है. इसलिए नेपाल के लिए चुनौती सिर्फ टूटे पुल और बह चुके घरों को फिर से बनाना नहीं है. हजारों लोगों के अंदर पैदा हुए डर और दुख को भी समय, सहारे और सही इलाज की जरूरत होगी. पानी का स्तर नीचे जा सकता है, लेकिन लोगों के मन में उठी लहरों को शांत होने में शायद काफी समय लगेगा.
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News Source: PTI
