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पश्चिम एशिया तनाव से लेकर इबोला वायरस तक, अभी इन गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है दुनिया

by Amit Dubey 27 May 2026, 8:42 PM IST (Updated 27 May 2026, 8:43 PM IST)
27 May 2026, 8:42 PM IST (Updated 27 May 2026, 8:43 PM IST)
Top Global Issues

Top Global Issues: आज विश्व कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. इनमें युद्ध से लेकर वायरस और जलवायु परिवर्तन के भी मुद्दे हैं. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग मुद्दे और वह भी गंभीर मुद्दे देखे जा रहे हैं. बीते दो-तीन वर्षों से दुनिया कई चुनौतियों से जूझ रही है. एक तरह से आप कह सकते हैं कि ग्लोबल कोरोना वायरस के बाद दुनिया में कई ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जो कहीं न कहीं विश्व के अधिकांश देशों, उनकी अर्थव्यवस्थाओं और उनके नागरिकों को प्रभावित कर रही हैं.

देश-दुनिया की तमाम मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आज विश्व में भू-राजनीतिक तनाव, अर्थव्यवस्था को लेकर चुनौतियां, पर्यावरण को लेकर जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां और हेल्थ से जुड़े कई मुद्दे दिख रहे हैं. इनसे विश्व के पर्यावरण को नुकसान तो हो ही रहा है इसके अलावा दुनिया के कई क्षेत्रों में जारी युद्ध से हजारों लोगों की मौत भी हो रही है. लाखों लोग बेघर हो चुके हैं. अरबों की संपत्तियां नष्ट हो चुकी हैं. अब यहां हम पश्चिम एशिया संघर्ष से लेकर इबोला वायरस के प्रकोप तक की बात करेंगे, जिन्होंने दुनिया को एक अलग ही चुनौतिपूर्ण स्थिति में डाल दिया है. इनमें हम शुरुआत ईरान-अमेरिका तनाव से करेंगे और दुनिया में एनर्जी संकट(तेल, गैस संकट), रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-लेबनान/हिजबुल्लाह संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और इबोला वायरस के बारे में विस्तार से जानेंगे, तो चलिए शुरू करते हैं.

पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका संघर्ष

बीते 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला बोल दिया था. इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर सैयद अली हुसैनी खामनेई की मौत हो गई थी. अपने सुप्रीम लीडर की मौत से बौखलाए ईरान ने इजरायल सहित दुनिया के कई देशों में बनाए गए अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला शुरू कर दिया. उसने मिसाइल और ड्रोन की मदद से यूएई, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, ओमान समेत अन्य देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जोरदार हमला किया. इसके बाद पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका संघर्ष शुरू हो गया. इस संघर्ष में ईरान और अमेरिका, दोनों ही ओर से कई सैनिकों के मारे जाने की खबर है. हालांकि, मरने वालों की वास्तविक संख्या की अभी साफ-साफ जानकारी सामने नहीं आई है.

ईरान पर हमले की वजह की बात करें तो अमेरिका और इजरायल यह कभी नहीं चाहते हैं कि ईरान के पास अपना परमाणु हथियार हो. ईरान कई सशस्त्र समूहों और संगठनों का सहयोग करता है, जो अमेरिका और इजरायल समेत दुनिया के कई देशों के लिए आतंकी संगठन हैं. इनमें हिजबुल्लाह, हूती, हमास समेत अन्य ग्रुप हैं. अमेरिका इन्हें दुनिया के लिए खतरा बताता है. अगर ईरान के पास परमाणु हथियार हो गया तो यह इजरायल, अमेरिका के साथ-साथ उसके सहयोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है. अमेरिका ने ईरान को कुछ घातक मिसाइलों को भी न बनाने की सलाह दी थी, लेकिन ईरान परमाणु बम और मिसाइल बनाने की अपनी बात पर अड़ा रहा. इसके अलावा, ईरान में सत्ता परिवर्तन कराने को लेकर भी अमेरिका ने हमला किया था. अमेरिका ने ईरान में प्रदर्शनकारियों के ऊपर हमले, दमन और क्षेत्रीय अशांति को देखते हुए भी तेहरान पर अटैक किया था. वहीं, मध्य पूर्व एशिया में ईरान की बढ़ते ताकत को कम करना भी इस हमले की एक वजह बताई जा रही है.

ईरान-अमेरिका के बीच जारी संघर्ष को लेकर बीते दिनों अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर लिखा, “इस्लामी गणराज्य ईरान के साथ बातचीत बहुत अच्छी तरह से आगे बढ़ रही है! यह या तो सभी के लिए एक ‘शानदार समझौता’ होगा, या फिर कोई समझौता होगा ही नहीं.” उन्होंने सोमवार को कहा कि युद्ध समाप्त करने के लिए ईरान के साथ बातचीत “अच्छी तरह” आगे बढ़ रही है.

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दुनिया में तेल और गैस का संकट

ईरान और अमेरिकी के इस संघर्ष की वजह से दुनिया में तेल संकट देखा जा रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित हो जाने से विश्व में एनर्जी सप्लाई का करीब 20 फीसदी हिस्सा पूरी तरह से प्रभावित है. भारत समेत कई देशों में तेल और गैस के दाम बढ़ रहे हैं. अगर होर्मुज का रास्ता जहाजों के लिए पहले की तरह नहीं खुला तो दुनिया में तेल और गैस का संकट और भी गहरा हो सकता है. इससे इनकी कीमतों में काफी बढ़ोतरी होगी और दुनिया के कई देशों के नागरिकों को महंगाई का सामना करना पड़ेगा.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की बात करें तो यह दुनिया का बहुत ही महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. यह जब से ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव में युद्ध का केंद्र बना है, तब से इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया है. फारस और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग 33 किमी चौड़ा और करीब 167 किमी लंबा है. विश्व की एनर्जी सप्लाई इस रास्ते पर बहुत ही अधिक निर्भर है. रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया का करीब 20 से 25 फीसदी तेल और गैस का व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होता है. यह रास्ता एशियाई बाजारों तक करीब 80 फीसदी से अधिक तेल की सप्लाई का माध्यम है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से पूरी दुनिया तो प्रभावित हुई ही है, लेकिन उससे भी अधिक इसने एशियाई बाजारों को प्रभावित किया है.

भारत इस रास्ते से 30 से 50 फीसदी तक कच्चे तेल और गैस का आयात करता है. होर्मुज बाधित होने से दुनिया में तेल और गैस के संकट देखे जा रहे हैं. इनकी वजह से कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, डॉलर की मांग बढ़ रही है और भारतीय करेंसी रुपया और शेयर बाजार में भी गिरावट देखी जा रही है. विदेशी निवेशक शेयर बाजार में बिकवाली कर रहे हैं.

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चार साल से रूस-यूक्रेन युद्ध जारी

फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच जंग शुरू हुई थी. जानकारी के अनुसार, हमले की शुरुआत रूस ने की थी. ऐतिहासिक पहलुओं को देखें तो मालूम होता है कि एक समय था जब रूस और यूक्रेन दोनों ही सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन उसके टूटने के बाद इसमें से कई देश बाहर निकले, तब रूस और यूक्रेन भी एक-दूसरे से अलग होते हुए दिखे थे. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का मुख्य कारण यूक्रेन का नाटो में शामिल होने की जिद्द है.
रूस नहीं चाहता कि अमेरिका के नेतृत्व वाला नाटो का प्रभाव उसके बॉर्डर तक पहुंच जाए. वह नहीं चाहता कि यूक्रेन नाटो का हिस्सा बने. रूस के प्रेसिडेंट व्लादिमीर पुतिन का मानना है कि रूस और यूक्रेन के लोग एक ही हैं और सोवियत संघ के खत्म होने के बाद यूक्रेन को रूस के साथ या इसके प्रभाव में रहना चाहिए. वहीं, यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की नॉटो में शामिल होने की अपनी जिद्द पर अड़े हुए दिखाई देते रहे हैं. हालांकि, रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध और तनाव को शुरू हुए चार साल से अधिक हो चुके हैं. इन दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने की कई बार कोशिश भी हुई है. खुद अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने इन दोनों देशों के राष्ट्रपतियों से अलग-अलग मीटिंग की, लेकिन अभी तक इसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पाया है. आज भी रुक-रुक तक रूस और यूक्रेन के बीच हमले होते रहते हैं.

विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग में अभी तक दोनों देशों से करीब 10 से 15 लाख लोग मारे और जख्मी हुए हैं. मतलब कि इन आंकड़ों में मरने और जख्मी होने वाले दोनों की संख्या शामिल है. कई मीडिया रिपोर्ट्स में इस जंग से हताहत होने वालों की संख्या 20 लाख तक भी बताई गई है. इसमें दोनों देशों के नागरिक, सैनिक और अन्य देशों के भी कुछ लोग शामिल हैं.

रूस और यूक्रेन एक-दूसरे पर एयर स्ट्राइक, मिसाइल अटैक, ड्रोन अटैक और कई अत्याधुनिक हथियारों से हमला करते हुए दिखे हैं. बता दें कि रूस और यूक्रेन के बीच जंग के चार साल से अधिक समय हो गए हैं. अभी तक दोनों के बीच में कोई समझौता नहीं हो पाया है. हाल ही में रूस ने यूक्रेन को चेतावनी दी है कि कीव पर हमले तेज किए जाएंगे. इसी कड़ी में मास्को ने यूक्रेन पर मंगलवार को 100 से अधिक ड्रोन और दो बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया. रूस ने सोमवार को विदेशी नागरिकों और राजनयिकों से आग्रह किया कि वह जितना जल्दी हो सके राजधानी कीव को छोड़ दें. साथ ही वहां पर रहने वाले निवासी भी सैन्य और सरकारी संगठनों से दूर रहे. मास्को ने कहा कि कीव पर सुनियोजित हमले की तैयारी की जा रही है.

हिजबुल्लाह के 100 से अधिक ठिकानों पर हमला

इजरायल एक साथ कई युद्धों में दिख रहा है. वह अमेरिका के साथ संयुक्त रूप से ईरान पर हमला करने के बाद अभी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर अटैक करता हुए दिखा. इसके अलावा वह गाजा में हमास को भी टारगेट कर रहा है. मंगलवार 27 मई को इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के 100 से अधिक ठिकानों पर हमले किए. इसमें हिजबुल्लाह के कई सदस्यों के मारे जाने की भी बात कही जा रही है. ये तेज हमले और झड़पें इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा लेबनान भर में हिजबुल्लाह को निशाना बनाकर और अधिक तेज हमले करने की अनुमति देने की घोषणा के बाद हुईं. इस बीच, इजरायल के एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि सेना ने लेबनान में एक अतिरिक्त बटालियन बुला ली है.

इजरायल की सेना ने कहा कि उसने रात भर में दक्षिणी लेबनान और पूर्वी बेका घाटी क्षेत्र में हिजबुल्लाह के 100 से अधिक ठिकानों पर हमला किया. उन्होंने आगे बताया कि इस दौरान सेना ने भंडारण सुविधाओं, कमान केंद्रों और निगरानी चौकियों को निशाना बनाया जिनका उपयोग उत्तरी इजरायल में इजरायली सैनिकों और निवासियों पर हमला करने के लिए किया जाता था. बता दें कि इजरायल ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह को आतंकी संगठन मानता है और अपने देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए इसपर लगातार हमले करता रहा है. लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से इजरायली हमलों में लेबनान में कम से कम 3,185 लोग मारे गए हैं और 9,600 से अधिक लोग घायल हुए हैं.

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इजरायल-हमास जंग और संघर्ष

इजरायल और हमास में साल 2023 से जंग जारी है. इसकी शुरुआत फिलिस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास के द्वारा 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमले के बाद हुई थी. इस हमले में इजरायल के 1200 से अधिक लोग/यहूदी मारे गए थे और 251 अन्य को बंधक बना लिया गया था. इसके बाद इजरायल ने गाजा में हमास के खिलाफ ताबड़तोड़ सैन्य अभियान शुरू कर दिया था. इस दौरान इजरायल ने हमास के कई लड़ाकों और टॉप कमांडरों को मार गिराया. इजरायल ने अक्टूबर 2023 में हमास के हमलों के जवाब में गाजा में अपना आक्रमण शुरू किया था. गाजा स्थित फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि इजरायली गोलीबारी में 72,700 से अधिक फिलिस्तीनी मारे गए हैं. गाजा की हमास सरकार का हिस्सा यह मंत्रालय, नागरिकों और आतंकवादियों की मौतों का विस्तृत विवरण नहीं देता है.

वहीं, इजरायल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज और इजरायली सेना ने कहा कि मंगलवार 27 मई को किए गए हमलों में मोहम्मद ओदेह की मौत हो गई है. काट्ज ने कहा कि ओदेह इजरायल में 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमले के “मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक” था. इस हमले के कारण गाजा में दो साल से अधिक समय तक युद्ध चला. उन्होंने कहा कि उस नरसंहार के बाद से यह चौथी बार है जब इजरायल ने हमास के सैन्य विंग के प्रमुख की हत्या की है. इससे पहले, इज्ज अल-दीन अल-हद्दाद की हत्या 16 मई को हुई थी.

इजरायल गाजा में रुक-रुक कर कई बार हमला करते हुए दिखता रहा है. वह हमास को आतंकी संगठन मानता है और इसे वह जड़ से खत्म करने की बात हमेशा कहते रहा है. वहीं, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के अनुमानों के अनुसार, गाजा की 20 लाख से अधिक आबादी में से लगभग 90 प्रतिशत लोग बेघर हो चुके हैं. इनमें से अधिकांश लोग अब चूहों से भरे और गंदे पानी से भरे विशाल तंबू शिविरों में शरण लिए हुए हैं. वे जीवित रहने के लिए सहायता पर निर्भर हैं.
पिछले साल अक्टूबर में इजरायल और हमास के बीच हुआ युद्धविराम समझौता अभी भी नाजुक बना हुआ है. युद्धविराम लागू होने के बाद से इजरायली हमलों में 880 से अधिक फिलिस्तीनी मारे गए हैं. इजरायल का कहना है कि उसके हमले हमास द्वारा उल्लंघन या उसके सैनिकों को खतरे के जवाब में किए गए हैं, लेकिन फिलिस्तीनी स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि मृतकों में कई नागरिक भी शामिल हैं. इस दौरान गाजा में चार इजरायली सैनिक भी मारे गए हैं.

जलवायु परिवर्तन का संकट

दुनिया में जलवायु परिवर्तन एक बड़ा संकट और चुनौती बन चुका है. अभी सबसे अधिक चिंता पृथ्वी का बढ़ता तापमान है. इसकी वजह से ग्लेशियर पिछल रहे हैं. ग्लेशियर पिछलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है. इसका बढ़ना मानव जीवन के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है. भारत ही नहीं कई देशों में भी पेड़ों की अंधाधुंध कटाई देखी जा रही है. जितने पेड़ लगाए नहीं जा रहे हैं उससे कहीं अधिक काट दिए जा रहे हैं. इससे पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है. इतना ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों में जारी युद्ध से भी जलवायु परिवर्तन का संकट बढ़ रहा है और इससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है. दुनिया के कई देशों में इन वजहों से मौसम का संतुलन बिगड़ गया है. अत्यधिक गर्मी और अत्यधिक ठंड के बीच कई प्राकृतिक आपदाओं से हजारों लोगों की मौतें होती जा रही हैं. इसको लेकर भारत सहित कई देश चिंता व्यक्त कर चुके हैं और अपने-अपने स्तर से लोगों के बीच पर्यावरण को बचाने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाते हैं.

दुनिया के कई देशों में तेल, गैस और कोयले का अत्यधिक उपयोग मनुष्य के लिए हानिकारक गैस कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को लगातार बढ़ा रहा है. वहीं, पेड़ों की लगातार कटाई से इस गैस को सोखने की प्राकृतिक क्षमता भी कम होते जा रही है. पृथ्वी का तापमान बढ़ने से दुनिया में कहीं पर सूखा तो कहीं पर बाढ़, कहीं पर आंधी तो कहीं पर जंगलों में आग लगती हुई दिख रही है. इन सभी से मनुष्य जाति के साथ-साथ पशुओं और प्रकृति के अन्य जीवों को नुकसान हो रहा है. दुनिया जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट से जूझ रही है. इसको इस संकट से बचाने के लिए कई समझौते और फैसले भी होते रहे हैं. इनमें पेरिस समझौता खास रहा है, जिसमें ग्लोबल तापमान को एक तय मानक पर सीमित रखने का टारगेट रखा गया है. इसके अलावा नवीकरणीय ऊर्जा यानी कि Renewable Energy को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. इसके तहत पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिक से अधिक इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही जाती रही है.

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इबोला वायरस का कहर

दुनिया का एक हिस्सा इबोला वायरस के जूझ रहा है. इसकी तेज और खतरनाक प्रभाव को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दिया है. जी हां, युगांडा और कांगो में इबोला वायरस का प्रकोप जारी है. इस खतरनाक वायरस से अभी तक 200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 900 से अधिक संदिग्ध मामले दर्ज किए जा चुके हैं. बीते दिनों WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस (Tedros Adhanom Ghebreyesus) ने कांगो और युगांडा में इबोला रोग के प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता का ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया.

WHO के अनुसार, इबोला अत्यधिक फैलने वाला वायरस है. यह उल्टी, खून या वीर्य जैसे शारीरिक तरल पदार्थों के माध्यम से फैल सकता है. इससे होने वाली बीमारी दुर्लभ है, लेकिन गंभीर और अक्सर जानलेवा होती है. स्वास्थ्य अधिकारियों ने पुष्टि की है कि मौजूदा प्रकोप बुंडीबुग्यो वायरस के कारण हुआ है, जो इबोला रोग का एक दुर्लभ प्रकार है और जिसके लिए अभी तक कोई स्वीकृत इलाज या टीका (वैक्सीन) उपलब्ध नहीं है. हालांकि, कांगो और युगांडा में इबोला के 20 से अधिक प्रकोप हो चुके हैं, लेकिन बुंडीबुग्यो वायरस की रिपोर्ट केवल तीसरी बार सामने आई है.

इबोला के लक्षण, इलाज और रोकथाम

WHO की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इबोला मनुष्यों और अन्य प्राइमेट्स को प्रभावित करने वाली एक गंभीर और अकसर घातक बीमारी है. यह वायरस जंगली जानवरों (जैसे फल खाने वाले चमगादड़, साही और गैर-मानव प्राइमेट) से मनुष्यों में फैलता है और फिर संक्रमित लोगों के रक्त, स्राव, अंगों या अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के सीधे संपर्क के माध्यम से और इन तरल पदार्थों से दूषित सतहों और सामग्रियों (जैसे बिस्तर, कपड़े) के संपर्क के माध्यम से मानव आबादी में फैलता है. इबोला से मृत्यु दर औसतन लगभग 50% है. पिछले प्रकोपों ​​में मृत्यु दर 25 से 90% तक रही है.

इबोला वायरस का प्रकोप पश्चिम अफ्रीका में 2014-2016 के दौरान देखा गया था. यह 1976 में वायरस की पहली बार खोज के बाद से सबसे बड़ा और सबसे जटिल प्रकोप था. इस प्रकोप में अन्य सभी प्रकोपों ​​की तुलना में कहीं अधिक मामले और मौतें हुईं.

WHO के अनुसार, इबोला के लक्षण अचानक प्रकट हो सकते हैं और इनमें बुखार, थकान, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द और गले में खराश शामिल हैं. इसके बाद उल्टी, दस्त, पेट दर्द, त्वचा पर चकत्ते और गुर्दे और यकृत के कार्य में गड़बड़ी के लक्षण दिखाई देते हैं. कम मामलों में, आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव (जैसे मसूड़ों से रिसाव, मल में खून आना) हो सकता है.

इबोला वायरस के लिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मोनोक्लोनल एंटीबॉडी mAb114 (ansuvimabTM) या REGN-EB3 (InmazebTM) से इलाज की सलाह देता है. इबोला वायरस के लिए दो टीकों को मंजूरी दी गई है: Ervebo® और Zabdeno and Mvabea®. प्रकोप से निपटने के लिए एर्वेबो टीके की सिफारिश की जाती है.

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