Home Top News चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस: क्या नियमों से हटकर काम कर सकता है आयोग?

चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस: क्या नियमों से हटकर काम कर सकता है आयोग?

by Sanjay Kumar Srivastava
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चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस: क्या नियमों से हटकर काम कर सकता है आयोग?

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की वैधता पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या भारतीय निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने के लिए अपने ही नियमों और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों से हटकर काम करने की असीमित शक्तियां प्राप्त हैं.

Supreme Court: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की वैधता पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूछा कि क्या भारतीय निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने के लिए अपने ही नियमों और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों से हटकर काम करने की असीमित शक्तियां प्राप्त हैं. भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची की पीठ ने चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी से कई प्रश्न पूछे और कहा कि अदालत को यह जांच करनी होगी कि क्या चुनाव निकाय अपनी शक्तियों का प्रयोग बेलगाम घोड़े की तरह कर सकता है. मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का तरीका प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए अर्थात् यह न्यायसंगत और निष्पक्ष होना चाहिए. कई विपक्षी दलों और लोकतांत्रिक सुधार संघ (एडीआर) सहित याचिकाकर्ताओं ने अदालत में बार-बार यह तर्क दिया है कि राज्यों में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को अंजाम देते समय निर्वाचन आयोग अपने ही नियमों का पालन नहीं कर रहा है. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़ा रुख अपनाया.

नहीं किया जा सकता शक्ति का असीमित उपयोग

मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि मतदाता सूची में संशोधन से सूची में शामिल किसी व्यक्ति के लिए नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए यदि कोई बात लोगों के नागरिक अधिकारों को प्रभावित करती है, तो अपनाई जाने वाली प्रक्रिया उपधारा 2 के अनुसार क्यों नहीं होनी चाहिए? चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने का प्रावधान अधिनियम की धारा 21(2) में दिया गया है. इसी बात का जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने किया है. यह कहते हुए कि किसी भी शक्ति का असीमित उपयोग नहीं किया जा सकता. न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि यदि कोर्ट यह मानता है कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार है, तो क्या यह कहा जा सकता है कि ऐसी शक्ति न्यायिक समीक्षा से परे है? उन्होंने कहा कि किसी भी शक्ति का असीमित उपयोग नहीं किया जा सकता, किसी भी शक्ति को पूरी तरह से अनियंत्रित नहीं किया जा सकता. शक्ति को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन उसे बेलगाम भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए. नियम 21 में एक प्रकार का बंधन है. इसमें कहा गया है कि यदि गहन संशोधन किया जा रहा है, तो नियमों को नए सिरे से तैयार करना होगा और नियम 4 से 13 लागू होंगे.

नहीं कर सकते अनुच्छेद 326 का उल्लंघन

जब न्यायालय ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग अपने नियमों का पालन करने से मुक्त है, तो वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि चुनाव आयोग हर बार नई एसआईआर प्रक्रिया नहीं बना सकता और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में स्वयं एक प्रक्रिया निर्धारित है जिसका वे पालन कर रहे हैं. कोर्ट ने पूछा कि क्या धारा 21 की उपधारा (2) और धारा 21 की उपधारा (3) जांच या कानून के प्रारंभिक चरण के संदर्भ में एक ही प्रकृति की हैं? इस पर चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि मेरा विनम्र निवेदन है कि वे एक समान नहीं हैं. जब तक अलग निर्देश न दिया जाए. पुनरीक्षण निर्धारित तरीके से ही किया जाना चाहिए. द्विवेदी ने तर्क दिया कि धारा 21 एक बिल्कुल अलग क्षेत्र में लागू होती है. इन प्रक्रियाओं में निष्पक्षता, तर्कसंगतता और उचित प्रक्रिया अनिवार्य रूप से शामिल है. कहा कि यदि माननीय न्यायाधीश धारा 21 को नियम 25 के साथ पढ़ें, तो प्रारूप स्पष्ट हो जाता है. हम मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए हैं. हम अनुच्छेद 326 का उल्लंघन नहीं कर सकते.

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News Source: Press Trust of India (PTI)

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