Indian Homes Stayed Cool Before AC: आज गर्मियों का मौसम आते ही ज्यादातर घरों में एयर कंडीशनर और कूलर की डिमांड बढ़ जाती है. नई जेनेरेशन को AC के बिना घबराहट होने लगती है. जैसे-जैसे टेंपरेचर 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचता है, AC-कूलर की डिमांड बढ़ने लगती है और बिजली के बिल भी आसमान छूने लगते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब AC और मॉर्डन कूलिंग सिस्टम नहीं था, तब लोग इस भीषण गर्मी से कैसे बचते थे? दरअसल, भारत में सदियों पहले ऐसे कई देसी और नेचुरल तरीके अपनाए जाते थे, जो बिना बिजली खर्च किए घरों को ठंडा रखते थे. आज जब बढ़ती गर्मी और महंगे बिजली बिल लोगों की चिंता बढ़ा रहे हैं, तब ये ट्रेडिशनल तरीके फिर से पॉपुलर हो रहे हैं.

खस या वेटिवर
पुराने टाइम में गर्मियों में घरों की खिड़कियों और दरवाजों पर खस के पर्दे लगाए जाते थे. खस, जिसे वेटिवर घास भी कहा जाता है, उसकी जड़ों से बनी ये चटाइयां गर्म हवा को ठंडी हवा में बदलने का काम करती थीं. इन दरियों पर टाइम-टाइम पर पानी डाला जाता था. जब गर्म हवा इन गीले पर्दों से होकर गुजरती थी, तो पानी भाप में बदलना शुरू होता था. इस प्रोसेस में कमरे या घर के अंदर आने वाली हवा ठंडी हो जाती थी. यही प्रोसेस आज के कई एयर कूलरों में भी यूज होता है. वहीं, खस की सबसे खास बात इसकी खुशबू है. इससे गुजरने वाली हवा न सिर्फ ठंडी होती थी, बल्कि उसमें मिट्टी जैसी नेचुरल खुशबू भी घुल जाती थी. साथ ही इसकी घनी जड़ें धूल और छोटे कणों को रोककर हवा को साफ रखने में भी मदद करती थीं. यही वजह थी कि गर्मियों में खस की दरियां और पर्दे तब हर घर की जरूरत मानी जाती थीं. खस के अलावा सालों पहले भारत के लोग अपने घरों की खिड़कियों पर जूट की चटाइयां भी टांगते थे. ठंडक के लिए उन्हें भी टाइम-टाइम पर गीला किया जाता था. इससे गर्म हवा ठंडी होकर कमरे में आती थी. इसके लिए न तो बिजली की जरूरत होती थी और न ही ज्यादा खर्चे का झंझट रहता था.
मिट्टी के घर
गांवों और कस्बों में बने ट्रेडिशनल मिट्टी के घर सिर्फ सिंपलिसिटी की पहचान नहीं थे, बल्कि साइंटिफिक भी काफी समझदारी से बनाए जाते थे. मिट्टी की मोटी दीवारों में गर्मी को धीरे-धीरे एब्जॉर्ब करने की कैपेसिटी होती है. दिनभर की तेज धूप और गर्मी सीधे घर के अंदर नहीं पहुंच पाती. इससे घर का टेंपरेचर बाहर से काफी कम बना रहता है. रात के टाइम जब मौसम ठंडा होने लगता है, तब दीवारों में जमा हुई गर्मी धीरे-धीरे बाहर निकलती है. इस वजह से घर के अंदर का टेंपरेचर बैलेंस्ड रहता है. मिट्टी के घरों की एक और खासियत है कि ये मॉइश्चर को कंट्रोल करते हैं. जब मौसम में ज्यादा मॉइश्चर होता है तो मिट्टी उसे सोख लेती है. इसके अलावा जब हवा ड्राई हो जाती है तो धीरे-धीरे उसे वापस छोड़ देती है. इससे घर के अंदर का माहौल ज्यादा कंफर्टेबल बना रहता है.

नेचुरल फ्रिज
भारत के लोग अपने घरों में मिट्टी से बने मटके यानी घड़ों का इस्तेमाल करते थे. आज भी बहुत से लोग पानी को ठंड़ा रखने के लिए इसे यूज करते हैं. पुराने टाइम में यही मटका लोगों के लिए नेचुरल रेफ्रिजरेटर का काम किया करता था. इसमें मिट्टी के सरफेस में बहुत छोटे-छोटे छेद होते हैं. इनमें से पानी धीरे-धीरे बाहर निकलता है और हवा के कनेक्शन में आकर भाप बन जाता है. इस प्रोसेस में पानी की गर्मी बाहर निकल जाती है, जिससे घड़े के अंदर का पानी नेचुरली ठंडा बना रहता है. आज भी मटके का पानी न सिर्फ ठंडा बल्कि हेल्थ के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. यही वजह है कि मॉर्डन फ्रिज के दौर में भी कई लोग गर्मियों में मटके का पानी पीना पसंद करते हैं.
आंगन वाले घर
भारतीय ट्रेडिशनल घरों में अक्सर बीच में खुला आंगन बनाया जाता था. ये सिर्फ घर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए नहीं होता था, बल्कि घर को ठंडा रखने में भी इस टेक्निक का बड़ा रोल था. दिन के टाइम गर्म हवा ऊपर उठकर खुले हिस्से से बाहर निकल जाती थी, जबकि ठंडी हवा आसपास के कमरों में घूमती रहती थी. कई घरों में आंगन में पौधे, तुलसी चौरा या पानी के छोटे सोर्स भी होते थे, जो आस-पास की जगह को ठंडा रखते थे. आज भी भारत के साउथ हिस्से में इसी तरह के ट्रेडिशनल घर मिलते हैं. घर के बीच में खुली जगह होने से पूरे घर में क्रॉस बेंटिलेशन भी अच्छा रहता था. इससे घर का टेंपरेचर बैलेंस्ड रहता था.

चूने की सफेदी
आजकल लोग अपने घरों और ऑफिसों में महंगे-महंगे पेंट करवाते हैं, लेकिन पहले भारत में लोग घरों की दीवारों और छतों पर चूने की सफेदी लगाते थे. चूने का लाइट कलर सूर्य की रौशन की रिफ्लेक्ट कर देता है. इससे दीवारें और छत कम गर्म होती हैं और घर के अंदर का टेंपरेचर बाहर से काफी कम बना रहता है. यही वजह है कि आज भी कई रूरल एरियाज में गर्मियों से पहले घरों में चूने की पुताई की जाती है.
बांस का फर्नीचर
इन सबके अलावा लकड़ी, बांस और बेंत से बने फर्नीचर भी गर्मी को बैलेंस करने में बड़ी मदद करते थे. बांस का फर्नीचर गर्मी कम सोखते हैं. वहीं, ट्रेडिशनल चारपाइयों का डिजाइन ऐसा होता था कि उनमें हवा आसानी से आर-पार होकर गुजर सकती थी, जिससे बैठने और सोने में ज्यादा आराम मिलता था. इसके अलावा घरों के सामने बने बरामदे सीधे धूप को घर में एंट्री करने से रोकते थे. लोग दोपहर के टाइम इन्हीं छायादार जगहों और पेड़ों के नीचे बैठकर आराम किया करते थे.
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थिन्नई डिजाइन हाउस
दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु के ट्रेडिशनल घरों में ‘थिन्नई’ नाम का आघा खुला बरामदा बनाया जाता था. ये न सिर्फ नेचुरल वेंटिलेशन बढ़ाता था, बल्कि घर के अंदर गर्मी की एंट्री को भी कम करता था. पत्थर, चूना और सुरखी से बने ये हिस्से गर्मियों में बाकी जगहों से ठंडे रहते थे. आज भी साउथ इंडिया में इस तरह के घरों को इंटीरियर और आर्किटेक्चर डिजाइन के कॉम्बिनेशन से बनाया जाता है. इसी तरह के घर केरलम में भी काफी ज्यादा देखने को मिलते हैं.
देसी हैक्स
गर्मी का मौसम आते ही ज्यादातर लोगों की पहली चिंता होती है कि घर को ठंडा कैसे रखा जाए. शहरों के फ्लैट और अपार्टमेंट दिनभर धूप और कंक्रीट की गर्मी सोखते रहते हैं, जिससे शाम तक घर भट्टी जैसा फील होने लगता है. ऐसे में लोग AC, कूलर और पंखों पर पूरी तरह डिपेंड हो जाते हैं. लेकिन पुराने भारतीय घरों में यूज की जाने वाली ये तकनीकें आपके आज भी बड़े काम आ सकती हैं. इसमें आप हवा, लाइट और नेचुरल चीज़ों का सही इस्तेमाल करके गर्मी को कंट्रोल कर सकते हैं. अच्छी बात ये है कि इनमें से कई हैक्स आज भी छोटे बदलावों के जरिए मॉर्डन अपार्टमेंट्स में किए जा सकते हैं.

फैब्रिक का यूज
घर को ठंडा रखने में सिर्फ दीवारें और खिड़कियां ही नहीं, बल्कि पर्दे, कुशन और फर्नीचर पर इस्तेमाल होने वाले कपड़े भी बड़ा रोल प्ले करते हैं. अगर आपके घर में भारी पॉलिएस्टर के पर्दे, सिंथेटिक कवर या मोटे कार्पेट हैं, तो ये गर्मी को रोकने की बजाय उसे जमा करने का काम कर सकते हैं. आप इसके बजाय कॉटन, खादी और हाथ से बुने नेचुरल कपड़ों का इस्तेमाल करें. ये हवा के फ्लो को बेहतर बनाते हैं और कम गर्मी सोखते हैं.
हवा की डायरेक्शन
अक्सर लोग पंखे को सिर्फ हवा देने की चीज़ समझते हैं, लेकिन सही डायरेक्शन में लगाया गया पंखा घर की गर्मी कम करने में भी मदद कर सकता है. एक पंखा खिड़की के पास बाहर की तरफ रखें ताकि वो गर्म हवा को बाहर निकाले. वहीं, दूसरा पंखा किसी ठंडी और छायादार खिड़की के पास अंदर की तरफ रखें ताकि ताजी हवा घर में आ सके. इससे घर के अंदर लगातार एयर एक्सचेंज होता रहेगा और गर्म हवा जमा नहीं होगी.
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रात की हवा का फायदा
पुराने घरों में दिनभर की गर्मी को रात में बाहर निकालने का इंतज़ाम किया जाता था. आप भी इसे फॉलो कर सकते हैं. बस दिन ढलने के बाद खिड़कियां और दरवाजे खोल दें और पंखों की मदद से गर्म हवा बाहर निकालें. इससे रात की ठंडी हवा घर के अंदर आएगी और दीवारों के साथ-साथ फर्श की गर्मी भी कम होगी. हालांकि सुबह धूप तेज होने से पहले खिड़कियां और पर्दे बंद करना न भूलें.
हीट शील्ड
पुराने घरों में बरामदे और छाया वाले हिस्से गर्मी को सीधे घर में आने से रोकते थे. अपार्टमेंट्स में यही काम आपकी बालकनी कर सकती है. बालकनी में पौधे लगाएं, बेलें उगाएं या बांस के ब्लाइंड्स का यूज़ करें. इससे धूप सीधे दीवारों और खिड़कियों पर नहीं पड़ेगी और घर का टेंपरेचर कंट्रोल में रहेगा.
गर्मी के हिसाब से बदलाव
पुराने टाइम में लोग अपना डेली रूटीन मौसम के हिसाब से तय करते थे. सुबह और शाम के टाइम घर में वेंटिलेशन करना, दोपहर में पर्दे बंद रखना और ज्यादा गर्मी पैदा करने वाली चीज़ों का इस्तेमाल लिमिटेड करना आज भी फायदेमंद हो सकता है. वैसे भी, गर्मी से राहत पाने के लिए हमेशा AC ही अकेला ऑप्शन नहीं होता. कभी-कभी छोटे-छोटे बदलाव और पुरानी भारतीय टेक्निक भी घर को काफी हद तक ठंडा रख सकती है.

आज भी क्यों कामयाब हैं ये तरीके?
कंक्रीट के जंगल और लगातार बढ़ते टेंपरेचर ने शहरों को पहले से ज्यादा गर्म बना दिया है. ऐसे में खस, बेहतर वेंटिलेशन और नेचुरल कंस्ट्रक्शन मटेरियल जैसे पुराने तरीके फिर से पॉपुलर हो रहे हैं. कई आर्किटेक्ट और डिजाइनर मॉर्डन घरों में इन ट्रेडिशनल टेक्निक को नए अंदाज में शामिल कर रहे हैं. इससे एनर्जी सेव होती है, बिजली का खर्च कम होता है और नेचर पर भी कम प्रेशर पड़ता है. ऐसे में ये कहना गलत नहीं है कि, शायद फ्यूचर की ठंडी और कंफर्टेबल लाइफ का रास्ता किसी नई टेक्निक में नहीं, बल्कि उन पुराने भारतीय तरीकों में छिपा है, जिन्होंने बिना बिजली के भी घरों को सालों तक ठंडा और रहने लायक बनाए रखा. कभी भारतीय घरों की पहचान रहे ये देसी कूलिंग हैक्स आज भी उतने ही काम के हैं.
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