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मर्यादा पुरुषोत्तम के दरबार में सबसे बड़ा धार्मिक उलटफेरः अब इस परंपरा से होगी रामलला की पूजा

by Sanjay Kumar Srivastava 24 July 2026, 9:38 PM IST
24 July 2026, 9:38 PM IST
मर्यादा पुरुषोत्तम के दरबार में धार्मिक उलटफेरः अब इस परंपरा से होगी रामलला की पूजा, जानें कैसे बदली पूरी व्यवस्था

Ram Janmabhoomi: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में सामने आए चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद प्रबंधन और धार्मिक व्यवस्था में अब तक का सबसे बड़ा उलटफेर कर दिया गया है. लगातार मचे बवाल और एसआईटी जांच के बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की मंजूरी के बाद बंद कमरों में हुई मैराथन बैठक में मंदिर की पूरी कमान संतों की एक शक्तिशाली समिति को सौंपने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया है. ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के कड़े रुख और संतों को सीधे व्यवस्था में भागीदार बनाने के इस बड़े फैसले ने साफ कर दिया है कि प्रभु की इस सरकार में अब पारदर्शिता और धार्मिक मर्यादा ही सर्वोच्च प्राथमिकता होगी.

नई समिति में कई बड़े संत

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने देश के प्रमुख हिंदू संतों, धर्मग्रंथों के विद्वानों और रामानंदी परंपरा के जानकारों को एक साथ लाकर नौ सदस्यों वाली एक स्थायी धार्मिक समिति बनाई है. यह समिति राम मंदिर में पूजा-पाठ, रीति-रिवाजों और धार्मिक मामलों से जुड़ी हर चीज़ की देखरेख करेगी. बुधवार को अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की अध्यक्षता में ट्रस्ट के बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ की बैठक में इस समिति को मंज़ूरी दी गई. यह समिति रोज़ाना की पूजा, बड़े धार्मिक त्योहारों, वैदिक रीति-रिवाजों, पुजारियों की नियुक्ति व ट्रेनिंग और मंदिर की पारंपरिक पूजा पद्धति को बनाए रखने जैसे मामलों पर अंतिम फ़ैसला लेगी.

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ये दिग्गज संभालेंगे कमान

  • संत कमल नयन दास (मणिराम दास छावनी)
  • संत रामानंद दास (राम कथाकुंज)
  • संत राजकुमार दास (रमावल्लभा कुंज)
  • संत मिथिलेश नंदिनी शरण (हनुमत निवास)
  • महंत दीनेंद्र दास (निर्मोही अखाड़ा)

इन पांच दिव्य संतों के अलावा ट्रस्ट के चार प्रमुख पदाधिकारियों को शामिल कर कुल नौ दिग्गजों का यह कोर ग्रुप तैयार हुआ है, जो पुजारियों की ट्रेनिंग से लेकर उत्सवों की तिथियों और अनुष्ठानों पर अंतिम मुहर लगाएगा.

दान प्रबंधन में सुरक्षा का कड़ा पहरा

दान पेटियों से नकदी गायब होने के गंभीर आरोपों और पूर्व पदाधिकारियों के इस्तीफे के बाद अब चढ़ावे के प्रबंधन को पूरी तरह बदल दिया गया है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और ट्रस्ट के कड़े सुरक्षा मानकों के तहत अब दान पेटियों को खोलने, रुपयों की गिनती करने और उन्हें सुरक्षित जमा करने की पूरी प्रक्रिया की कड़ाई से सीसीटीवी निगरानी की जा रही है, ताकि भविष्य में किसी भी स्तर पर वित्तीय अनियमितता की गुंजाइश न बचे.

रामानंदी वैष्णव परंपरा का महासंकल्प

इस बदलाव के साथ ही रामलला की पूजा पद्धति को लेकर भी कड़े दिशा-निर्देश तय किए गए हैं. दक्षिण भारतीय या अन्य पद्धतियों के हस्तक्षेप की शिकायतों के बीच धार्मिक समिति अब यह सुनिश्चित करेगी कि मंदिर परिसर में केवल और केवल वैदिक रामानंदीय वैष्णव संप्रदाय के अनुसार ही सेवा-पूजा संचालित हो. रामलला यहां बाल रूप में विराजमान हैं, इसलिए वैष्णव परंपरा की शुद्धता बनाए रखने के लिए नित्य-नैमित्तिक अनुष्ठान, रामर्चा, वेदों का पारायण और यज्ञ आदि का पूरा खाका अब यह संतों की विशिष्ट समिति ही तय कर रही है.

महंत गोविंद देव गिरी बने समिति के अध्यक्ष

ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष महंत गोविंद देव गिरी की अध्यक्षता वाली इस समिति में जगतगुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती, कर्नाटक के पेजावर मठ के स्वामी विश्वप्रसन्नतीर्थ, निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेन्द्र दास, मणिराम छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास, रामवल्लभ कुंज के महंत राजकुमार दास, राम कथा कुंज के स्वामी रामानंद दास, महंत मिथिलेश नंदिनी शरण और हरिद्वार के अखंड परमधाम आश्रम के स्वामी परमानंद गिरी शामिल हैं. अयोध्या में रहने वाले सदस्यों में महंत मिथिलेश नंदिनी शरण को हिंदू धर्मग्रंथों का एक बड़ा विद्वान माना जाता है.

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उन्होंने ही मंदिर के उद्घाटन से पहले राम लला की प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान इस्तेमाल की गई पूजा-विधि की पुस्तिका लिखी थी. महंत राजकुमार दास ऐतिहासिक रामवल्लभ कुंज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके संस्थापक ने पूजा की ‘रामार्चा’ पद्धति को व्यवस्थित किया था, जो बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है. महंत दिनेन्द्र दास श्री पंच रामानंदी निर्मोही अखाड़े के वरिष्ठ संतों में से एक हैं. जबकि महंत कमल नयन दास ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के तय उत्तराधिकारी हैं.राम कथा कुंज के प्रमुख स्वामी रामानंद दास रामायण के जाने-माने विद्वान हैं और पहले धार्मिक सलाहकार समितियों में काम कर चुके हैं.

अयोध्या के बाहर के प्रमुख धार्मिक नेता भी शामिल

गोविन्द देव गिरि एक धार्मिक उपदेशक और आयोजक के तौर पर जाने जाते हैं. जगद्गुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती उत्तराम्नाय ज्योतिर्पीठ परंपरा के प्रमुख हैं. स्वामी विश्वप्रसन्नतीर्थ कर्नाटक के पेजावर मठ के प्रमुख और वैष्णव धर्म के जाने-माने विद्वान हैं. जबकि हरिद्वार के अखंड परमधाम आश्रम के स्वामी परमानंद गिरि को बड़े धार्मिक त्योहारों और समारोहों के आयोजन का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

पूजा, आरती और धार्मिक रस्मों की देखरेख करेगी समिति

यह समिति रोज़ाना की पूजा, आरती और दूसरी धार्मिक रस्मों की देखरेख करेगी. राम नवमी और विवाह पंचमी जैसे बड़े सालाना त्योहारों की तारीखें और उन्हें मनाने का तरीका तय करेगी. ‘यज्ञ’, ‘रामार्चा’ और वैदिक पाठ जैसे वैदिक समारोहों की योजना बनाएगी और उनकी देखरेख करेगी. साथ ही पुजारियों की नियुक्ति, ट्रेनिंग, आचरण, ड्रेस कोड और धार्मिक रीति-रिवाजों की निगरानी भी करेगी. यह मंदिर के पुजारियों के लिए एक स्थायी ट्रेनिंग संस्थान की देखरेख भी करेगी. हालांकि समिति का गठन कर दिया गया है, लेकिन इसके सदस्यों का कहना है कि काम करने के विस्तृत नियम अभी तय होने बाकी हैं.

बढ़ेगा काम का दायरा

समिति के सदस्य आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने PTI को बताया कि समिति की घोषणा अभी-अभी हुई है. हम समिति के लिए सही गाइडलाइन या ड्राफ्ट का इंतज़ार कर रहे हैं, जिसमें इसके कार्यकाल की जानकारी भी शामिल हो.इस पैनल को एक ज़रूरी संस्थागत व्यवस्था बताते हुए उन्होंने कहा कि बेशक इसकी ज़रूरत है. मैं राम मंदिर के धार्मिक मामलों से जुड़ा रहा हूं और उस तीन सदस्यीय पैनल का हिस्सा था जिसे राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पहले बनाया गया था.

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उन्होंने उम्मीद जताई कि नई कमेटी का दायरा पिछली कमेटी से ज़्यादा बड़ा होगा.उन्होंने कहा कि पहले यह तीन सदस्यों वाला एक पैनल था जिसका काम करने का दायरा सीमित था. अब बड़े पैनल के साथ इसके काम का दायरा भी बढ़ेगा. रामवल्लभ कुंज के महंत राजकुमार दास, जो कमेटी के एक और सदस्य हैं, ने PTI को बताया कि पैनल ने अभी तक अपने कामकाज के तौर-तरीकों पर चर्चा नहीं की है. उन्होंने कहा कि कमेटी के काम की बारीकियों पर अभी तक चर्चा नहीं हुई है. इस पर जल्द ही काम शुरू होगा.

रामानंदी परंपरा के अनुसार होंगे सभी अनुष्ठान

गुरुवार को महंत कमल नयन दास ने कहा कि नई कमेटी के तहत मंदिर की धार्मिक व्यवस्थाएं सुचारु रूप से चलती रहेंगी.
उन्होंने कहा कि जिस व्यवस्था के तहत मंदिर का प्रबंधन किया जा रहा है, वह अच्छी तरह से काम करती रहेगी और उसमें और सुधार होगा. हमारी ज़िम्मेदारी मंदिर की उचित देखभाल और पूजा-पाठ व सभी धार्मिक गतिविधियों का सुचारु संचालन सुनिश्चित करना होगा. कमेटी के सदस्य और निर्मोही अखाड़े के महंत दिनेन्द्र दास ने पहले PTI को बताया था कि राम मंदिर में सभी अनुष्ठान और धार्मिक गतिविधियां सख्ती से रामानंदी परंपरा के अनुसार होनी चाहिए. यही सिद्धांत अब कमेटी के कामकाज के दायरे का आधार है.

वैष्णव संप्रदाय है रामानंदी परंपरा

रामानंदी परंपरा एक वैष्णव संप्रदाय है जो भगवान राम को सर्वोच्च सत्ता मानता है और इसकी उत्पत्ति 14वीं सदी के संत रामानंद से मानी जाती है. अयोध्या के ज़्यादातर मंदिरों की तरह राम मंदिर भी इसी परंपरा का पालन करता है, जिसके तहत रोज़ाना पूजा, आरती, भोग और अन्य धार्मिक अनुष्ठान स्थापित रामानंदी रीति-रिवाजों और धर्मग्रंथों के अनुसार किए जाते हैं. मंदिर प्रबंधन के सूत्रों ने बताया कि कुछ लोगों ने गैर-रामानंदी परंपराओं, खासकर रामानुजाचार्य परंपरा (जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है) को अपनाने पर आपत्ति जताई थी.

नई बनी कमेटी से यह उम्मीद की जाती है कि वह मंदिर की स्थापित रामानंदी परंपराओं का एक जैसा पालन सुनिश्चित करेगी. मंदिर और रीति-रिवाजों पर नज़र रखने वाले एक स्थानीय व्यक्ति ने, जिन्होंने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर PTI को बताया कि यहां रामानंदी परंपरा सबसे उपयुक्त है क्योंकि भगवान राम की पूजा ‘राम लला’ यानी बच्चे के रूप में की जाती है, जबकि दक्षिण भारतीय परंपराओं में देवता को ज़्यादातर एक वयस्क और वनवास में रह रहे राजा के रूप में देखा जाता है.

पवित्रता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया कदम

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि पूजा और रीति-रिवाजों के दोनों रूपों में अंतर होता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि भगवान राम के किस रूप की पूजा की जा रही है. बुधवार को ट्रस्ट की बैठक के बाद फ़ैसले की घोषणा करते हुए अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन के साथ मीडिया को जानकारी देने वाले गोविंद देव गिरी ने कहा था कि राम मंदिर के सभी धार्मिक मामलों की देखरेख करने और इसके रीति-रिवाजों की प्रमाणिकता और पवित्रता सुनिश्चित करने के लिए एक स्थायी कमेटी बनाई जा रही है. यह कदम ट्रस्ट की उन व्यापक कोशिशों का हिस्सा है, जिनका मकसद मंदिर की धार्मिक परंपराओं को बनाए रखते हुए हाल ही में दान की चोरी से जुड़े विवाद के बाद संस्थागत व्यवस्थाओं को मज़बूत करना है.

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