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AAP के बगावती सांसदों पर उठा संवैधानिक सवाल, पार्टी ने की अयोग्य घोषित करने की तैयारी; पढ़ें समीकरण

by Kamlesh Kumar Singh
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Constitutional Question Raised Over AAP Rebel MPs

Delhi Politics : आम आदमी पार्टी को शुक्रवार को बड़ा झटका लगा. पार्टी के 10 में से 7 सांसद पार्टी छोड़ अलग राह पर निकल पड़े हैं. तीन नेताओं ने तो शुक्रवार को बीजेपी ज्वाइन कर ली है.

Delhi Politics : आम आदमीं पार्टी (AAP) के राज्यसभा संसदीय दल में बगावत हो गया है. राज्यसभा के सांसद राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल बीजेपी में शामिल हो गए हैं. इसके साथ साथ 4 और आप सांसदों ने भाजपा में विलय के पत्र पर दस्तखत कर , राज्यसभा सचिवालय को चिट्टी सौंप दी है. लेकिन अब आम आदमी पार्टी इन नेताओं को राज्यसभा से अयोग्य घोषित करने की तैयारी कर ली है. आप ने संविधान की 10वीं अनुसूची, दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की घोषणा की है.

10 में से 7 ने बदली राह

शुक्रवार को आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है. पार्टी के 10 में से 7 सांसद पार्टी छोड़ अलग राह पर निकल पड़े हैं. पार्टी के प्रमुख नेता राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल तो शुक्रवार को ही भाजपा में शामिल हो गए, जबकि राज्यसभा सांसद स्वाति मालिमाल ने भी इस बात का ऐलान कर दिया कि वो भी BJP में शामिल हो चुकी हैं. इन नेताओं के साथ-साथ तीन और आम आदमी पार्टी के सांसदोंके बारे में दावा किया गया है कि उन्होंने भी आप से अलग होकर भाजपा में विलय के परस्तव पर दस्तखत कर दिया है. इन नेताओं के पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल के बाद राजनीतिक माहौल अचानक गर्म हो गया है. AAP और बीजेपी दोनों में जुबानी जंग जारी है. नेताओं के पार्टी बदलने से नाराज AAP अब एक्शन के मूड में नजर आ रही है. AAP के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने घोषणा की कि वो राज्यसभा के तीन सदस्यों- राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक के बीजेपी में शामिल होने को औपचारिक रूप से अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं.

क्या सांसद होंगे अयोग्य करार?

आम आम आदमी पार्टी के सांसदो द्वारा बगावत के बाद आम आदमी पार्टी के इन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की संभावना टटोल रही है. आम आदमी के राज्यसभा में नेता संजय सिंह ने कहा कि पार्टी राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी से संविधान की 10वीं अनुसूची लागू करने के लिए संपर्क कर रही है जिसमें दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के प्रावधानों का विवरण दिया गया है. राज्यसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में संजय सिंह ने राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक को बीजेपी में शामिल होने के कारण राज्यसभा सदस्यता से अयोग्य घोषित किए जाने की मांग कर रही है. AAP के मुताबिक क यह संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ने के बराबर है.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची क्या है?

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची, जिसे दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, 1985 में 52वें संशोधन के जरिए लागू की गई थी. इसका उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल पर अंकुश लगाने और सरकार की स्थिरता बनाए रखना है. इस कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी के निर्देश (व्हिप) के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है. अयोग्यता के आधार साफ है. यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है. कोई सदस्य सदन में अपनी पार्टी द्वारा जारी निर्देशों के विपरीत मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है. कोई मनोनीत सदस्य अपना पद ग्रहण करने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है.

दो-तिहाई नेता सहमत हों

दल बदल विरोधी क़ानून के मुताबिक यदि किसी विधायक का उसकी मूल राजनीतिक पार्टी का किसी अन्य पार्टी में विलय हो जाता है, तो वह अयोग्य नहीं होता है. बशर्ते कि पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के लिए सहमत हों. इस मामले में निर्णय लेने का अधिकार या सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/चेयरमैन) अयोग्यता याचिकाओं पर अंतिम निर्णय लेते हैं. यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय (Merge) का फैसला करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा.

दल-बदल को होता रोकना मुश्किल

कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि दसवीं अनुसूची राजनीतिक दलबदल को रोकने में तब नाकाम रहती है, जब वह विलय का रूप ले लेता है. आप सांसदों का BJP में शामिल होना दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन नहीं माना जाएगा, क्योंकि यह कानून किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों को अलग होकर किसी दूसरे दल में विलय करने की अनुमति देता है.

एक्सपर्ट्स ने कहा कि दसवीं अनुसूची की धारा 4(2) के तहत अयोग्यता की सजा तब लागू नहीं होती, जब सदन में किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य उस दल से अलग होने का फ़ैसला कर लें, जिसके टिकट पर वे चुनाव जीते थे और किसी दूसरे दल में विलय कर लें. दसवीं अनुसूची कहती है कि एक राजनीतिक पार्टी को दूसरी पार्टी में विलय करना होगा और पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों को इस विलय पर सहमत होना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि विधायी पार्टी और राजनीतिक पार्टी को एक नहीं माना जा सकता, क्योंकि वे अलग-अलग संस्थाएं हैं. इसलिए विधायी पार्टियों का विलय काफ़ी नहीं है। इस मामले में AAP के राज्यसभा में 10 सांसद हैं और सात सांसद ने दल विलय की घोषणा की है. ऐसे मे ये लोग विधायी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य हैं. हालांकि इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि ऐसे विवादों का फ़ैसला करने वाला व्यक्ति सदन का पीठासीन अधिकारी, स्पीकर होता है, जिसे अपना पद सत्ताधारी दल से मिलता है. इस वजह से दलबदल विरोधी क़ानून के प्रावधानों के तहत ऐसे सांसदों, विधायकों को अयोग्य ठहराना मुश्किल है.

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