Home Latest News & Updates दीदी से बैर नहीं, भतीजे की खैर नहीं! क्या अभिषेक के मोह ने बर्बाद की TMC, बागी नेताओं ने बताई इनसाइड स्टोरी

दीदी से बैर नहीं, भतीजे की खैर नहीं! क्या अभिषेक के मोह ने बर्बाद की TMC, बागी नेताओं ने बताई इनसाइड स्टोरी

by Neha Singh 11 June 2026, 7:42 PM IST
11 June 2026, 7:42 PM IST
Abhishek Banerjee

Abhishek Banerjee: पश्चिम बंगाल में 15 सालों तक सत्ता में रहीं पार्टी टीएमसी इस समय अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रही है. विधानसभा चुनाव हारने के बाद जनता तो क्या खुद नेता भी ममता बनर्जी का हाथ छोड़ रहे हैं. हर दिन एक नई बगावत देखने को मिल रही है और इस्तीफों का सिलसिला जारी है. आलम ये है कि ममता बनर्जी के सबसे करीबी नेता तक दीदी को छोड़कर जाने की धमकी दे रहे हैं. वो नेता जो कल तक दूसरे बागियों को गालियां दे रहे थे, आज उन्होंने भी ममता बनर्जी को पार्टी छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया है. गुरुवार को कल्याण बनर्जी ने टीएमसी प्रमुख को चेतावनी दे दी है कि वे अभिषेक बनर्जी और उनके बीच किसी एक को चुन लें, क्योंकि वो अब अभिषेक जैसे घमेंडी व्यक्ति के साथ काम नहीं कर सकते.

इस पूरे राजनीतिक खेल में एक चीज सामान्य है कि कई नेताओं ने पार्टी की टूट या कलह का कारण अभिषेक बनर्जी को बताया है. इससे पहले बागी गुट के विधायकों ने भी अभिषेक बनर्जी पर फर्जी हस्ताक्षर का आरोप लगाया था, जिसके कारण उनके खिलाफ सीबीआई की जांच शुरू हो गई. पार्टी से दूरी बनाने वाले नेताओं का कहना है कि अभिषेक बनर्जी पर दीदी के अंधे विश्वास और मोह ने आज उन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर किया है. चलिए जानते हैं कि टीएमसी नेताओं के मुताबिक पार्टी टूटने में अभिषेक बनर्जी पर क्या योगदान है और उन पर क्या आरोप लगाए हैं.

2011 में राजनीति में आए अभिषेक

अभिषेक बनर्जी 2011 में पॉलिटिक्स में आए, जब ममता बनर्जी ने लेफ्ट शासन का अंत किया था. उस समय ममता ने अभिषेक बनर्जी को तृणमूल यूथ कांग्रेस का प्रेसिडेंट बनाया. तब से अभिषेक 2014 से डायमंड हार्बर से लोकसभा सांसद हैं और अभी पार्टी के जनरल सेक्रेटरी हैं. धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस में अभिषेक बनर्जी का रुतबा बढ़ता गया क्योंकि वह ममता बनर्जी के भतीजे थे और असल में उनके वारिस थे. कुछ सालों के बाद ममता बनर्जी अपने पुराने साथियों से ज्यादा अभिषेक पर भरोसा करने लगीं और वरिष्ठ नेताओं का दर्जा कम होने लगा.

‘घमंडी हैं अभिषेक’

कल्याण बनर्जी ने खुद को अभिषेक के खिलाफ फर्जी हस्ताक्षर केस से अलग करते हुए कहा कि वे अब अभिषेक बनर्जी का केस नहीं लड़ेंगे. कल्याण बनर्जी ने ममता बनर्जी से अपील करते हुए कहा, “मैंने साफ-साफ कह दिया है कि मैं अब अभिषेक बनर्जी के साथ नहीं रहूंगा. मैं उनके साथ काम भी नहीं करूंगा. उन्होंने मेरे साथ बदतमीजी की है, जिसे मैं कभी बर्दाश्त नहीं करूंगा. मैं ममता बनर्जी से साफ-साफ कहता हूं कि या तो अभिषेक को तृणमूल कांग्रेस में रखें और हमें पार्टी छोड़ने दें या हमें TMC में रखें और अभिषेक को पार्टी से निकाल दें.”

कल्याण बनर्जी का बयान डूबती हुई टीएमसी के लिए और जोर का धक्का है. कल्याण बनर्जी ने साफ तौर पर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. दरअसल, कल्याण बनर्जी अभिषेक के खिलाफ चल रहे फर्जी हस्ताक्षर मामले में उनके वकील के तौर लड़ रहे थे. अगली सुनवाई के लिए आज की तारीख तय की गई थी. उन्होंने कहा कि- मैं उनके केस के लिए तैयारी कर रहा था, लेकिन कल रात उन्होंने मेरे बेटे को फोन किया और कहा कि अब उनका पक्ष कोई और वकील रखेगा, जो पेशे में मुझसे बहुत जूनियर है. यह अभिषेक बनर्जी का अहंकार और बदतमीजी है. मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा.”

‘युवराज कल्चर’

बागी नेताओं का कहना है कि अभिषेक बनर्जी ने टीएमसी के अंदर एक ऐसी तानाशाही व्यवस्था खड़ी कर दी है कि, जहां कोई भी नेता उनकी इजाजत के बिना कुछ नहीं कर सकता. बागी विधायक दल के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि विधानसभा चुनाव के बाद हुई बैठक में सभी विधायकों को अभिषेक बनर्जी की कोशिशों के लिए जबरन तालियां बजाने के लिए मजबूर किया गया था, जिससे कोई भी सहमत नहीं था. इतना ही नहीं उन्होंने अभिषेक पर पार्टी फंड के फिजूल खर्च का भी आरोप लगाया. ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि अभिषेक बनर्जी का आम लोगों और पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं से कोई संबंध नहीं है. ऋतब्रत बनर्जी ने साफ कहा कि टीएमसी आज अभिषेक बनर्जी के कामों की कीमत चुका रही है. उनका अलग विंग बनाना “बॉस कल्चर” के खिलाफ बगावत है.

कॉर्पोरेट कल्चर

2021 के विधानसभा चुनाव के बाद, जब प्रशांत किशोर ने इलेक्शन कंसल्टेंसी फर्म I-PAC छोड़ने का फैसला किया, तो अभिषेक बनर्जी ने नए I-PAC मैनेजमेंट के साथ पांच साल का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया और बंगाल में उनके फीडबैक पर काम करने का फैसला किया. अभिषेक ने आईपैक को अपनी आर्मी की तरह इस्तेमाल किया, जिसमें ब्लॉक लेवल से लेकर लोकसभा तक तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की जासूसी करना शामिल था. आईपैक के साथ मिलकर अभिषेक ने पार्टी को एक राजनीतिक पार्टी के बजाय एक कॉर्पोरेट ऑफिस की तरह चलाना शुरू कर दिया. पुराने TMC नेताओं पर नजर रखने के लिए हर जिले में I-PAC के मेंबर्स को तैनात किया गया, जिससे नेता फंसा हुआ महसूस करने लगे. टिकट वितरण भी आईपैक के फीडबैक के हिसाब से किया गया. विधानसभा चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी और उनकी टीम ने पार्टी के 74 मौजूदा MLA के टिकट काट दिए, उनकी जगह आईपैक के सर्वे के आधार पर नए चेहरों को टिकट दिया गया.

जनता और कार्यकर्ताओं से बढ़ती दूरी के आरोप

अभिषेक बनर्जी और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच दूरी को भी अंदरूनी असंतोष का एक बड़ा कारण माना जा रहा है. कई वरिष्ठ नेताओं और बागी विधायकों का आरोप है कि पार्टी के अहम फैसले कुछ चुनिंदा लोग ही लेते हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं व स्थानीय नेताओं की राय को महत्व नहीं दिया जाता. आलोचकों का कहना है कि शीर्ष नेतृत्व और आम कार्यकर्ताओं के बीच की यह खाई पार्टी के हालिया चुनावी प्रदर्शन में भी दिखी. टीएमसी नेताओं का कहना है कि दीदी से मिलना आसान है, लेकिन अभिषेक से नहीं. सभी को उनके आलीशान घर के बाहर बैठना पड़ता था. वह उन्हें अंदर नहीं बुलाते थे. सभी सड़क पर बैठते थे और तीन-चार घंटे बाद, उन्हें बताया जाता था कि उनकी एक जरूरी मीटिंग है और वे नहीं मिल सकते. कुल मिलाकर, अभिषेक पर आरोप है कि वे अपने घमंड के कारण दूसरे नेताओं और जमीनी स्तर की राजनीति को महत्व नहीं देते.

कानूनी विवाद

TMC में जाली दस्तखत का विवाद अब एक बड़े कानूनी मामले में बदल गया है. बागी गुट के विधायकों ने अभिषेक बनर्जी पर आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष के लिए स्पीकर को सौंपे गए प्रस्ताव पत्र पर विधायकों के नकली हस्ताक्षर किए गए हैं. उनकी शिकायत शिकायत के बाद जांच शुरू की गई और बाद में इसे CID को सौंप दिया गया. जांच एजेंसी ने कई दस्तावेजों की जांच की है और इसमें शामिल लोगों से पूछताछ की है. क्योंकि विधानसभा सचिवालय को सौंपे गए अंतिम प्रस्ताव पत्र को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर अभिषेक बनर्जी ने हस्ताक्षर थे, इसलिए इस पूरे विवाद में उनका नाम पर मामला दर्ज किया गया है. अभिषेक तीन बार समन भेजे जाने के बाद बी सीआईडी के सामने पेश नहीं हुए. आज गुरुवार को इस मामले में सुनवाई हुई, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट ने अभिषेक बनर्जी की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है, लेकिन उन्हें जांच में सहयोग करने और शाम 6:00 बजे CID के सामने पेश होने का भी आदेश दिया है. नतीजतन, यह मामला सिर्फ राजनीतिक विवाद से आगे अभिषेक बनर्जी के गले के बड़ी कानूनी संकट बन गया है.

कमजोर होती टीएमसी

विधायकों से लेकर सांसद तक टीएमसी छोड़ रहे हैं. टीएमसी के तीन राज्यसभा सांसदों ने लगातार इस्तीफा दे दिया है. आज प्रकाश चिक बराइक ने पार्टी और पद छोड़ने का ऐलान किया. इससे पहले राज्यसभा MP सुष्मिता देव ने भी बुधवार को पार्लियामेंट और पार्टी से इस्तीफा दे दिया. सोमवार को, राज्यसभा MP सुखेंदु शेखर रे ने भी राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और बाद में पार्टी लीडरशिप के साथ मतभेदों का हवाला देते हुए तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के अपने फैसले की घोषणा की.

पिछले हफ्ते, पार्टी के 80 में से 58 विधायक आधिकारिक तौर पर विधायक दल से अलग हो गए. ऋतब्रत ने पार्टी पर अपना हक जमा लिया और खुद नेता विपक्ष बन गए. पहली बार पार्टी इस तरह से टूटी है. यह संकट बाद में संसद तक फैल गया, जिसमें काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 से ज्यादा बागी लोकसभा सांसदों ने खुद को टीएमसी से अलग कर लिया और बीजेपी को समर्थन देने का दावा किया. ममता बनर्जी के लिए संकट दिन-प्रतिदिन और भी बड़ा होता जा रहा है. उनकी पार्टी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही और उनके सभी चहेते नेता उनका साथ छोड़ रहे हैं. अब ममता दीदी के साथ केवल 22 विधायक, 8 लोकसभा सांसद और 10 राज्यसभा सांसद हैं.

ममता बनर्जी के सामने चुनौती

कुल मिलाकर ममता बनर्जी के ऊपर एक साथ कई पहाड़ गिर पड़े हैं और अब वे एक भी गलत फैसला झेलने की स्थिति में नहीं हैं. ममता बनर्जी के सबसे बड़ा धर्मसंकट यह है कि वे पार्टी के पुराने वफादारों को चुनें या अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को. MP कल्याण बनर्जी जैसे सीनियर नेताओं ने ममता को सीधा अल्टीमेटम दिया है कि वे अभिषेक का “घमंड” बर्दाश्त नहीं करेंगे. अगर ममता अभिषेक बनर्जी का साथ देती हैं, तो पूरी पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी और अगर वह पुराने नेताओं की बात मानती हैं, तो उनके राजनीतिक वारिस का करियर दांव पर लग जाएगा. इसके साथ ही बागी गुट बन जाने के बाद ममता बनर्जी के सामने अपनी पार्टी के ऑफिशियल नाम और पार्टी सिंबल पर को बचाने की कानूनी और राजनीतिक चुनौती भी है.

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