FCRA Amendment Bill 2026: संसद के मॉनसून सत्र में हंगामा जारी है. विपक्ष हर रोज तमाम मुद्दों को लेकर शोर मचा रहे हैं और कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पा रही. राम मंदिर और छात्र आंदोलन के बाद सरकार के नए फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल (FCRA) पर बवाल शुरू हो गया है. मुख्य रूप से यह बिल विदेशी फंडिंग से जुड़ा हुआ है. विपक्ष इसको जोरदार विरोध कर रहा है और नियमों में बदलाव करने की मांग कर रहा. वहीं दूसरी ईसाई संगठनों ने भी इस पर नाराजगी जताई है. यहां तक कि इस बिल ने अमेरिकी सांसद तक का नाराज कर दिया है.
लगातार हंगामे की भेंट चढ़ रहे संसद के मानसून सत्र में अब सरकार ने विपक्ष की ओर बातचीत का हाथ बढ़ाया है. सरकार ने संकेत दिए हैं कि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA) संशोधन बिल के विवादित प्रावधानों पर वह नरमी बरतने को तैयार है. अब इस बिल पर अब 12 अगस्त को संसद में चर्चा की जाएगी. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि यह बिल क्या है और इसको लेकर सरकार और विपक्ष का क्या तर्क है. यहां आपको आसान भाषा में इन सभी सवालों के जवाब मिलेंगे.

क्या है FCRA बिल?
विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक (FCRA) वह कानून है जो यह तय करता है कि भारतीय लोग, एसोसिएशन, NGO, ट्रस्ट और कंपनियां भारत के बाहर से भेजे गए पैसे, सिक्योरिटीज या अन्य चीजें कैसे ले सकते हैं और उनका इस्तेमाल कर सकते हैं.
साफ शब्दों में कहें तो, FCRA तीन काम करता है:-
- यह बताता है कि कौन विदेशी फंडिंग या संपत्ति ले सकता है और किन शर्तों पर.
- यह बताता है कि वह पैसा कैसे लिया जाना चाहिए, उसका हिसाब कैसे रखा जाना चाहिए और उसकी रिपोर्ट कैसे की जानी चाहिए.
- यह विदेशी फंड से होने वाली कुछ छोटी, तय एक्टिविटीज पर रोक लगाता है जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक शांति पर असर डाल सकती हैं.
एफसीआरए भारतीयों को विदेशी दान प्राप्त करने से नहीं रोकता है और न ही कानून का पालन करने वाले संगठनों को बंद करता है. हजारों संगठन वैध रूप से पंजीकृत हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, अनुसंधान और मानवीय कार्यों के लिए नियमित रूप से विदेशी धन प्राप्त करते हैं.
FCRA का उद्देश्य
एफसीआरए स्पष्ट और समान सिद्धांतों के एक समूह पर आधारित है जो 1976 से लेकर अब तक के हर संशोधन में बदले नहीं गए हैं. ये सिद्धांत किसी भी जवाबदेह सरकार की अपने नागरिकों, संस्थानों और राष्ट्रीय हित के प्रति जिम्मेदारियों को दर्शाते हैं.
पारदर्शिता- विदेश से चंदा लेने वाले हर संगठन को सरकार के साथ रजिस्टर करना होगा, एक तय और वेरिफाइड बैंकिंग चैनल के जरिए फंड लेना होगा और मिली रकम, डोनर्स और उन मकसदों के बारे में बताना होगा जिनके लिए फंड का इस्तेमाल किया जाएगा.
जवाबदेही- फंडिंग लेने वाले संगठनों को सालाना ऑडिटेड रिटर्न फाइल करना होगा. ये रिटर्न ऑनलाइन फाइल किए जाएंगे. विदेशी स्रोत से लेकर जमीनी स्तर पर गतिविधि तक पूरी तरह से पता लगाने योग्य श्रृंखला बनानी होगी.
संप्रभुता- विदेशों से प्राप्त होने वाले वे दान जो भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रियाओं, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं, सरकार उस पर पाबंदी लगा सकती है. यह संप्रभु शासन का ही एक हिस्सा है.
असली काम को मुमकिन बनाना- यह एक्ट असली इंटरनेशनल सहयोग को आसान बनाने के लिए बनाया गया है, न कि उसमें रुकावट डालने के लिए. एजुकेशन, हेल्थकेयर, गरीबी हटाना, आपदा राहत, कल्चरल एक्सचेंज, साइंटिफिक रिसर्च और पर्यावरण से जुड़े काम, सभी इस फ्रेमवर्क के अंदर बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे.
लोगों का भरोसा– जब नागरिकों को पता होता है कि संगठन को मिलने वाली विदेशी फंडिंग रजिस्टर्ड, बताई गई और ऑडिट की गई है, तो इससे स्वयंसेवी क्षेत्र और संगठनों में विश्वास बढ़ता है. पारदर्शिता लाभार्थियों और दानदाताओं दोनों के उद्देश्य की रक्षा करती है.

FCRA बिल, 2026 में विवाद कहां है?
पूरा विवाद बिल की प्रस्तावित धारा 14B, 15 और 16 को लेकर है. नए प्रावधानों में FCRA प्रमाणपत्र के समाप्त होने की नई व्यवस्था प्रस्तावित है. यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त, रद्द या सरेंडर हो जाता है और इसके बाद उसका नवीनीकरण दोबारा नहीं कराया जाता, तो उसका सर्टिफिकेट अपने आप रद्द हो जाएगा. धारा 15 के तहत सर्टिफिकेट रद्द होने के बाद विदेशी फंड से बनाई गई उनकी संपत्तियां- जैसे स्कूल, अस्पताल, चर्च या अन्य संस्थान सरकार द्वारा नामित एक प्राधिकारी के पास चली जाएंगी. इस तरह उन पर सरकार का नियंत्रण हो जाएगा.
एफसीआरए के उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास की सजा पांच साल से घटाकर एक साल कर दी गई है. राज्य सरकारों और एजेंसियों को एफसीआरए के तहत जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी प्राप्त करनी होगी.
नियमों में अब धार्मिक उद्देश्यों की स्पष्ट सूची दी गई है, जिससे सभी समुदायों के धार्मिक संगठनों को विदेशी वित्त पोषण के लिए पात्र गतिविधियों के बारे में स्पष्टता मिल सकेगी.
एफसीआरए पंजीकरण का नवीनीकरण कराने वाले गैर-सरकारी संगठनों को यह बताना होगा कि उन्होंने पिछले दो वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान का उपयोग किया है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि सक्रिय और कार्यरत संगठन ही वैध पंजीकरण धारक हों.
पुराने कानून और नए कानून में अंतर
पुराने कानून के सेक्शन 15 में यह तय किया गया था कि अगर किसी संगठन का रजिस्ट्रेशन कैंसिल या खत्म कर दिया जाता है, तो उसके बचे हुए विदेशी फंड और संपत्ति राज्य सरकार द्वारा तय किए गए अधिकारी के पास चले जाएंगे और उसका बैंक खाता फ्रीज हो जाएगा. पुराने कानून में सिर्फ “मैनेजमेंट” के बारे में बताया गया था, लेकिन मालिकाना हक या बिक्री को साफ तौर पर परिभाषित नहीं किया गया था. यानी संस्था पर मालिकाना हक उस संगठन का ही रहता था. नतीजतन, पिछले दस सालों में हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति अधर में लटकी रही.
इसी ढिलाई को खत्म करने के लिए सरकार ने नए और बेहद कड़े प्रावधान जोड़े हैं. अब धारा 14बी के तहत केवल रिन्यू न करवाने पर पंजीकरण अपने आप रद्द हो जाता है और धारा 15 के तहत पंजीकरण रद्द होते ही फंड और संपत्ति सरकार के पास चली जाएगी. धारा 16A के तहत अब संपत्ति को बेचने या सरकारी खजाने में डालने का अधिकार होगा.
1976 में लाया गया था कानून
भारत ने विदेशी अंशदान की स्वीकृति और उपयोग को विनियमित करने के लिए 1976 में पहला विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम लागू किया. जैसे-जैसे अंतर्राष्ट्रीय जुड़ाव बढ़ा और सीमा पार वित्तीय प्रवाह अधिक जटिल होता गया, संसद ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 पारित किया, जिसने पहले के कानून को एक आधुनिक ढांचे में बदल दिया. तब से 2016, 2018 और 2020 में संशोधनों के माध्यम से इस ढांचे को और मजबूत किया गया है. वर्तमान में, प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 में और सुधार किया गया है.
गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2019 और 2022 के बीच 13,520 संगठनों को 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी दान मिला. FCRA पोर्टल बताता है कि 15 जुलाई, 2026 तक, 14,449 सक्रिय FCRA सर्टिफिकेट हैं, 22,498 कैंसिल हो चुके हैं और 15,212 एक्सपायर माने जा चुके हैं.
ईसाई संगठन और नेताओं की नाराजगी
DMK के राज्यसभा MP पी विल्सन के नेतृत्व में ईसाई नेताओं के एक डेलीगेशन ने गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर प्रस्तावित FCRA बिल, 2026 को वापस लेने की अपील की. उन्होंने इसके “जब्त करने वाले” प्रस्ताव पर एतराज जताया. डेलीगेशन ने शाह को दिए एक मेमोरेंडम में कहा कि अगर सरकार बिल वापस नहीं लेना चाहती है, तो उसे इसे फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट, 2010 के पूरे रिव्यू के साथ एक जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) को भेज देना चाहिए. उन्होंने संपत्ति की जब्ति से जुड़े मौजूदा एक्ट के सेक्शन 15 को भी रद्द करने की मांग की.
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) और केरल लैटिन कैथोलिक एसोसिएशन (KLCA) ने भी बिल के नियमों पर चिंता जताई है. संगठन का कहना है कि प्रस्तावित कानून सरकार को विदेशी और घरेलू फंडिंग से सालों में बनाई गई संपत्ति को हमेशा के लिए जब्त करने, दूसरी जगह ले जाने या बेचने की इजाजत देता है.

अमेरिकी सांसद ने जताई आपत्ति
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने मंगलवार को FCRA बिल, 2026 पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि FCRA में संशोधन से भारत सरकार को चर्च और धार्मिक चैरिटी पर कब्जा करने की इजाजत मिल जाएगी और यह “ईसाइयों के खिलाफ साफ हमला” होगा. वेस्ट वर्जीनिया के रिपब्लिकन मूर ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “ईसाई तब से भारत में हैं जब सेंट थॉमस द एपोस्टल हमारे प्रभु ईसा मसीह के फिर से जी उठने के कुछ दशक बाद मालाबार कोस्ट गए थे. लेकिन इस लंबे ईसाई इतिहास के बावजूद, भारतीय सरकार चर्च और धार्मिक चैरिटी पर सरकार के कब्जे की इजाजत देने के लिए नियमों में संशोधन करने पर विचार कर रही है.”
12 अगस्त को होगी चर्चा
सरकार का कहना है कि ऐसा कोई भी नियम लागू नहीं होगा जिसका असर पूर्व के मामलों या पहले से बनी संपत्तियों पर पड़े. मानसून सत्र 13 अगस्त तक चलना है. सरकार विपक्ष को विश्वास में लेने की कोशिश कर रही है ताकि संसद का गतिरोध खत्म हो और महत्वपूर्ण विधायी कार्य आगे बढ़ सके. इसी कोशिश के तहत संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की. वहीं दूसरी ओर गृह मंत्री अमित शाह ने अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ बैठक बुलाई है, ताकि बिल को लेकर फैली आशंकाओं और भ्रम को दूर किया जा सके. अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार अपने आश्वासनों को विधेयक की भाषा में किस तरह शामिल करती है और विपक्ष इन स्पष्टीकरणों से कितना संतुष्ट होता है.
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News Source: PTI
