Monsoon Session: लगातार हंगामे की भेंट चढ़ रहे संसद के मानसून सत्र में अब सरकार ने विपक्ष की ओर बातचीत का हाथ बढ़ाया है. सरकार ने संकेत दिए हैं कि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA) संशोधन बिल के विवादित प्रावधानों पर वह नरमी बरतने को तैयार है. सरकार का कहना है कि ऐसा कोई भी नियम लागू नहीं होगा जिसका असर पूर्व के मामलों या पहले से बनी संपत्तियों पर पड़े. इसी कोशिश के तहत संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की. वहीं दूसरी ओर गृह मंत्री अमित शाह ने अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ बैठक बुलाई है, ताकि बिल को लेकर फैली आशंकाओं और भ्रम को दूर किया जा सके.
विवाद की जड़ क्या है?
पूरा विवाद प्रस्तावित धारा 14B को लेकर है. इस प्रावधान में FCRA प्रमाणपत्र के समाप्त होने की नई व्यवस्था प्रस्तावित है. सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर जताई जा रही है कि यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त, रद्द या सरेंडर हो जाता है, तो विदेशी फंड से बनाई गई उसकी संपत्तियों जैसे स्कूल, अस्पताल, चर्च या अन्य संस्थान के प्रबंधन के लिए सरकार एक नामित प्राधिकारी नियुक्त कर सकती है.
ईसाई संगठनों, सिविल सोसायटी और कई गैर-सरकारी संस्थाओं का कहना है कि यह प्रावधान उन संस्थाओं को भी प्रभावित कर सकता है जो वर्षों पहले विदेशी फंड से बुनियादी ढांचा तैयार कर चुकी हैं, लेकिन अब पूरी तरह घरेलू संसाधनों से अपना संचालन कर रही हैं. उनका आरोप है कि ऐसी स्थिति में भी सरकार उन संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर सकती है. इसी मुद्दे को लेकर कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री से मुलाकात कर अपनी चिंताएं भी रखीं.
विपक्ष के आरोप
कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का आरोप है कि यह संशोधन नागरिक समाज, एनजीओ और अल्पसंख्यक तथा धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित करेगा. उनका कहना है कि सरकार पारदर्शिता के नाम पर संस्थागत अधिकारों को सीमित करने की कोशिश कर रही है. कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों और विदेशी राजनेताओं ने भी इस प्रस्तावित कानून को लेकर चिंता व्यक्त की है.
सरकार का पक्ष
सरकार इन आरोपों को खारिज कर रही है. सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य किसी संस्था की संपत्ति पर कब्जा करना नहीं, बल्कि विदेशी फंड के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं और अवैध धर्मांतरण जैसी गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना है. सरकार यह भी स्पष्ट कर रही है कि संशोधन का पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट) नहीं होगा और पहले से बने संस्थानों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे.
क्या टूटेगा संसद का गतिरोध?
मानसून सत्र 13 अगस्त तक चलना है. सरकार विपक्ष को विश्वास में लेने की कोशिश कर रही है ताकि संसद का गतिरोध खत्म हो और महत्वपूर्ण विधायी कार्य आगे बढ़ सके. अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार अपने आश्वासनों को विधेयक की भाषा में किस तरह शामिल करती है और विपक्ष इन स्पष्टीकरणों से कितना संतुष्ट होता है. FCRA संशोधन विधेयक अब केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि सरकार और विपक्ष के बीच भरोसे की परीक्षा भी बन गया है. यदि सहमति बनती है तो संसद का गतिरोध कम हो सकता है, लेकिन यदि विवादित प्रावधानों पर असहमति बनी रही तो यह विधेयक भी मानसून सत्र के सबसे बड़े राजनीतिक टकरावों में शामिल हो सकता है.
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