AI Environmental Impact: सोशल मीडिया पर इन दिनों 80s का दौर लौट आया है. फर्क बस इतना है कि इस बार इसके लिए टाइम मशीन की जरूरत नहीं पड़ रही. एक तस्वीर अपलोड कीजिए और AI उसे 1980 के दशक के स्टाइलिश पोर्ट्रेट में बदल देता है. पुराने जमाने के कपड़े, रेट्रो हेयरस्टाइल, फिल्मी अंदाज और विंटेज स्टूडियो बैकग्राउंड, कुछ ही सेकंड में तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. ये ट्रेंड देखने में भले ही मजेदार लगे, लेकिन इसके लिए ऐसी कीमत चुकाई जा रही है, जिस पर हमारा ध्यान नहीं जाता. हर AI तस्वीर के पीछे बड़े-बड़े डेटा सेंटर, पावरफुल कंप्यूटर चिप्स, बिजली, कूलिंग सिस्टम और पानी की जरूरत होती है. यानी जब हम AI से एक और तस्वीर बनाने के लिए कहते हैं, तो उसका असर सिर्फ मोबाइल स्क्रीन तक नहीं रहता.

AI का बढ़ता इस्तेमाल
AI की ऐसे समय में है, जब दुनिया पहले ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर दौर से गुजर रही है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले सालों में दुनिया के औसत तापमान का पहले की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जा सकता है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन की मई 2026 की जलवायु अपडेट के अनुसार, 2026 से 2030 के बीच कम से कम एक साल के दौरान तापमान के 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने की 91 प्रतिशत संभावना है. वहीं, इन पांच सालों में औसत तापमान 1.5 डिग्री से ऊपर रहने की संभावना 75 प्रतिशत बताई गई है. हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री की दीर्घकालिक सीमा औपचारिक रूप से पार हो गई है. लेकिन तापमान में बढ़ोतरी का असर मौसम, ग्लेशियरों, खाने और पानी पर पड़ सकता है. ऐसे में AI का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल पर्यावरण पर एक नई तरह का प्रेशर डाल रहा है.
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एक फोटो की कहानी
हमारी बनाई हुई एक तस्वीर से धरती का तापमान अचानक नहीं बढ़ने वाला. असली समस्या है इसका बड़े लेवल पर इस्तेमाल है. एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि नॉर्मल AI जेनरेटेड इमेज एक बेसिक टेक्स्ट टेक्स्ट-क्लासिफिकेशन के काम की तुलना में करीब 1,450 गुना ज्यादा एनर्जी ले सकती है. ये आंकड़ा हर तस्वीर पर बिल्कुल समान रूप से लागू नहीं होता. किसी तस्वीर में कितनी बिजली खर्च होगी, ये AI मॉडल, इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर, तस्वीर की क्वालिटी और डेटा सेंटर पर निर्भर करता है. फिर भी ये समझने के लिए काफी है कि AI के सभी काम एक जैसे नहीं होते. सिंपल टेक्स्ट तैयार करने की तुलना में तस्वीर, वीडियो और ज्यादा मुश्किल AI टास्क काफी ज्यादा पावर मांग सकते हैं. यानी आपकी एक रेट्रो सेल्फी भले ही कुछ सेकंड में तैयार हो जाए, लेकिन उसे बनाने के लिए काफी कम्प्यूटिंग काम करता है.
डेटा सेंटर और बिजली
AI की बढ़ती लोकप्रियता के साथ डेटा सेंटरों की बिजली की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के अनुमान के मुताबिक, 2025 में दुनिया के डेटा सेंटरों ने लगभग 448 TWh बिजली का इस्तेमाल किया. AI से जुड़े कामों में इस डिमांड का बड़ा हिस्सा हैं. 2030 तक AI को चलाने वाले डेटा सेंटरों की बिजली की डिमांड लगभग 945 TWh तक पहुंचने की उम्मीद है. वहीं, बिजली के अलावा AI का एक और छिपा हुआ खर्च है और वो है पानी. बड़े डेटा सेंटरों में सर्वर लगातार काम करते हैं और गर्मी पैदा करते हैं. इन्हें ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ कूलिंग टेक्नोलॉजी में पानी की जरूरत पड़ती है. 2030 तक AI को चलाने वाले डेटा सेंटरों का वॉटर फुटप्रिंट लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है. एक अकेली AI फोटो का पानी का फुटप्रिंट काफी छोटा दिखाई देता है. UNU के अनुमान के मुताबिक ये लगभग 29 मिलीलीटर, यानी करीब दो बड़े चम्मच पानी के बराबर हो सकता है. वहीं, वीडियो के लिए ये आंकड़ा लगभग 4.1 लीटर तक पहुंच सकता है. हालांकि ये निश्चित आंकड़े नहीं हैं. पानी की खपत डेटा सेंटर की जगह, मौसम, कूलिंग टेक्नोलॉजी, बिजली के सोर्स और कंप्यूटेशनल वर्कलोड
के हिसाब से बदल सकती है.

सिर्फ बिजली और पानी ही नहीं
AI का पर्यावरणीय असर सर्वर बंद होने के साथ खत्म नहीं होता. AI को चलाने के लिए खास चिप्स, सर्वर और डेटा सेंटरों की जरूरत होती है. इन्हें बनाने के लिए कच्चे माल और क्रिटिकल मिनरल्स की मांग बढ़ती है. वैसे, AI का इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन से लड़ने में भी किया जा सकता है. बेहतर मौसम पूर्वानुमान, क्लाइमेट मॉडलिंग, पहले से चेतावनी, नवीकरणीय ऊर्जा प्रबंधन और बिजली की खपत को ऑप्टीमाइज करने जैसे कामों में AI मददगार हो सकता है. इसलिए असली सवाल AI अच्छा है या बुरा, ये नहीं है. सवाल ये है कि हम इसे कितनी तेजी से और किस लेवल पर इस्तेमाल करते हैं. 80s वाली एक AI सेल्फी अपने आप में कोई बड़ा क्लाइमेट इवेंट नहीं है. लेकिन ये बात जरूर है कि डिजिटल दुनिया में छोटी-सी सुविधा कितनी तेजी से बड़े पैमाने की कंप्यूटिंग डिमांड में बदल सकती है.
यानी आज रेट्रो सेल्फी है, कल AI वीडियो हो सकता है और उसके बाद कोई नया ट्रेंड. जैसे-जैसे AI सस्ता और आसान होगा, उसका इस्तेमाल भी बढ़ेगा. इसलिए अगली बार जब आप अपनी तस्वीर को 80s के फिल्मी अंदाज में बदलें, तो फोटो के साथ उसके पीछे की कीमत को भी याद रखिए. आपकी स्क्रीन पर वो सिर्फ एक क्लिक है, लेकिन उसके पीछे पूरी एक मशीनरी काम कर रही है. उस मशीनरी को चलाने के लिए बिजली, पानी और संसाधनों की जरूरत पड़ती है.
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