TMC: पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) इन दिनों अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझती नजर आ रही है. पार्टी के भीतर असंतोष अब सिर्फ नेताओं की नाराजगी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सांसदों के एक धड़े द्वारा खुलकर नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोलने से मामला गंभीर हो गया है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के कुछ सांसद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने के पक्ष में हैं, जिससे ममता बनर्जी के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है.
कल्याण बनर्जी का बागी सांसदों पर हमला
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने बागी सांसदों पर निशाना साधते हुए कहा है कि यदि उनमें राजनीतिक नैतिकता बची है तो उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देकर जनता के बीच जाना चाहिए. वहीं पार्टी सांसद कीर्ति आजाद ने भी बागी नेताओं को गद्दार करार देते हुए कहा कि अगर उन्हें पार्टी नेतृत्व से कोई शिकायत थी तो चुनाव से पहले उठानी चाहिए थी, न कि चुनाव जीतने के बाद. सूत्रों के मुताबिक बागी खेमे की अगुवाई काकोली घोष दस्तिदार कर रही हैं. दावा किया जा रहा है कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 सांसद एनडीए को समर्थन देने के पक्ष में हैं और इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भी दिया गया है.
हालांकि पार्टी नेतृत्व और ममता समर्थक नेता इन दावों को खारिज कर रहे हैं. इसके बावजूद पार्टी के भीतर मतभेद अब सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं. इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक और चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. हाल ही में इंडिया गठबंधन की बैठक के दौरान ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की मुलाकात ने विपक्षी राजनीति को लेकर नई अटकलों को जन्म दिया है. दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच रिश्तों में नई गर्मजोशी देखने को मिल सकती है. हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय फिलहाल बेहद मुश्किल संभावना है.
अभिषेक बनर्जी को लेकर बढ़ी नाराजगी
तृणमूल कांग्रेस का गठन ही कांग्रेस से अलग होकर हुआ था और बंगाल में दोनों दल लंबे समय तक एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. ऐसे में किसी भी तरह का विलय केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संगठनात्मक और भावनात्मक चुनौती भी होगा. विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि पार्टी के भीतर मौजूदा असंतोष की एक बड़ी वजह अभिषेक बनर्जी की बढ़ती राजनीतिक भूमिका को लेकर नेताओं की नाराजगी हो सकती है. यही कारण है कि संगठन के भीतर कई स्तरों पर असहजता देखने को मिल रही है.अगर असंतोष और टूट का सिलसिला आगे बढ़ता है तो इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ सकता है.
इससे कांग्रेस और भाजपा दोनों को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है. वहीं ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट बनाए रखने और कार्यकर्ताओं का भरोसा कायम रखने की होगी. फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि तृणमूल कांग्रेस टूट की ओर बढ़ रही है, लेकिन इतना तय है कि पार्टी अपने गठन के बाद के सबसे कठिन दौर में खड़ी दिखाई दे रही है. आने वाले दिनों में ममता बनर्जी इस संकट से कैसे निपटती हैं, इस पर बंगाल की राजनीति की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी.
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- खुशबू सिंह की रिपोर्ट
