Home राज्यBihar बिहार में सम्राट का सुपरफास्ट सियासी सफरः जानिए कैसे महज 8 साल में गैर-संघी चौधरी बने बीजेपी के नए सेनापति

बिहार में सम्राट का सुपरफास्ट सियासी सफरः जानिए कैसे महज 8 साल में गैर-संघी चौधरी बने बीजेपी के नए सेनापति

by Kamlesh Kumar Singh
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बिहार में सम्राट का सुपरफास्ट सियासी सफरः जानिए कैसे महज 8 साल में गैर-संघी चौधरी बने बीजेपी के नए सेनापति

Samrat Chaudhary: चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं. लगभग तीन दशक बाद बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बना है.

Samrat Chaudhary: सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं. लगभग तीन दशक बाद बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बना है. लेकिन सम्राट का बीजेपी की पहली पसंद बनना कई सवाल उठाता है. मुख्यमंत्री की ताजपोशी में ना तो भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह पहुंचे और ना ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद थे. ऐसे में अटकलों का बाजार गर्म है. बिहार के सिंहासन पर सम्राट चौधरी के ताजपोशी होने के साथ ही राजनीतिक हलकों में कई तरह के अटकलों का बाजार गर्म हो रहा है. तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं. सवाल किया जा रहा है कि कभी नीतीश कुमार को पद से हटाने के लिए मुरेठा बांधने वाले सम्राट चौधरी भाजपा और नीतीश की पहली पसंद कैसे बन गए ?

ताजपोशी में मोदी-शाह की गैरमौजूदगी पर उठे सवाल

सवाल यह भी उठने लगा है कि मध्य प्रदेश ,ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में हार्डलाइनर को सीएम के तौर पर चुनने वाली बीजेपी को आरजेडी की पाठशाला में राजनीति का ककहरा पढ़े सम्राट क्यों पसंद आए ? और तीसरा ये कि क्या इस फ़ैसले से पार्टी का कैडर सहज है ? भले ही सम्राट चौधरी केंद्रीय नेतृत्व की पहली पसंद बनकर सीएम बन गये, लेकिन पार्टी में इसको लेकर काफी असहजता है. कहा तो यह भी जा रहा है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी मजबूरी में उनके नाम पर सहमति दी हो लेकिन पार्टी के मूल कैडर में सम्राट की ताजपोशी से उदासीनता का भाव देखा जा रहा है. शायद यही वजह है कि उनकी ताजपोशी में ना तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिखे और ना ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह.

सीधे बीजेपी में एंट्री

बीजेपी नेता विजय कुमार सिन्हा के बयान पर ही गौर करे तो उनका कहना है कि गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव दिया है. आरएसएस बैकग्राउंड के विजय कुमार सिन्हा के इस बयान में जो दर्द छिपा है उसकी सबसे बड़ी वजह सम्राट का राजनीतिक करियर है. सम्राट आरजेडी, जेडीयू और हिंदुस्तान आवाम मोर्चा से गुजरते हुए बीजेपी में आए हैं. ना तो सम्राट चौधरी भाजपा के अन्य नेताओं की तरह संघ की कार्यशाला में गए, ना कभी शाखा अटेंड की ना तो वह भाजपा युवा मोर्चा में रहे और ना विद्यार्थी परिषद में रहे. उनकी सीधी एंट्री बीजेपी में हुई. महज 8 साल में वो भाजपा के कोटे से मुख्यमंत्री बन गए.

2017 में ज्वाइन की थी बीजेपी

साल 2017 के अंत में उन्होंने बीजेपी ज्वाइन कर ली. बीजेपी में आने के बाद सम्राट चौधरी ने अशोक जयंती को बड़े स्तर पर आयोजित किया. उन्होंने अपनी सांगठनिक ताकत का प्रदर्शन किया जिसके नतीजे में उन्हें साल 2023 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. सम्राट चौधरी का बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उदय, भाजपा की ओबीसी राजनीति, ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण को साधने और उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली का परिणाम है. भाजपा ने कोइरी (कुशवाहा) समुदाय से आने वाले सम्राट चौधरी को नीतीश कुमार के ‘लव-कुश’ वोटबैंक में सेंधमारी के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने सबसे उपयुक्त चेहरा माना. इसी रणनीति के तहत उनको आगे बढ़ाया गया. भाजपा नेतृत्व द्वारा 2023 में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद उन्होंने आक्रामक तरीका अपनाया और नीतीश कुमार और राजद के खिलाफ मोर्चा संभाला.

नीतीश की पसंद थे सम्राट

कहा जाता है कि आक्रामक शैली भी उन्होंने एक भाजपा नेता से सीखी यानी नीतीश सरकार को घेरने का ककहरा भी उन्होंने भाजपा में ही सीखी. राबड़ी सरकार में मंत्री, जदयू (नीतीश सरकार में मंत्री) और फिर भाजपा के साथ सफर में उन्हें व्यापक प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव मिला. भाजपा में राजनीतिक और जाति समीकरण में सम्राट चौधरी फिलहाल फिट बैठते हैं . जाहिर है भाजपा नेतृत्व को सम्राट में वह सब मिला जो शायद भाजपा के अन्य नेताओं में नहीं मिला, फिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने उन्हें युवा, आक्रामक और ओबीसी चेहरे के रूप में बिहार में पार्टी को मजबूती देने के लिए चुना. राजनीति के जानकार कहते हैं कि बिहार में जेडीयू और भाजपा की सरकार है. दोनों दलों का अपना अपना वोट बैंक है. ऐसे में सम्राट के मुख्यमंत्री बनने के पीछे बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार की बहुत चली है.

नीतीश के विजन पर आगे बढ़ने का संकल्प

नीतीश कुमार की रजामंदी के बगैर भाजपा अपना मुख्यमंत्री नहीं बैठा सकती थी. इसका राजनीतिक और सामाजिक नुकसान होने की पूरी संभावना थी. लिहाजा सम्राट चौधरी ही उपयुक्त नेता माने गए. बिहार में सिर्फ सत्ता का स्थानांतरण हुआ है. भाजपा और जेडीयू ने अपनी सीट बदली है. सरकार का एजेंडा एक ही है और वो भी नितीश कुमार के बताये रास्ते पर आगे बढ़ना. भाजपा इस मौके पर ऐसा कोई मैसेज देना नहीं चाहती कि जिससे लोगों में यह लगे कि नीतीश कुमार के पद छोड़ने के पीछे की कोई कहानी है, या फिर भाजपा अपना एजेंडा जेडीयू पर लादना चाहती है. इसलिए भाजपा ने सम्राट की ताजपोशी को बड़े इवेंट में बदलने नहीं दिया.

ये भी पढ़ेंः बिहार के मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी, विजय चौधरी और बिजेंद्र यादव ने ली डिप्टी CM पद की शपथ

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