Jharkhand News: झारखंड की राजधानी रांची के कांके क्षेत्र स्थित बोड़ेया पंचायत में ग्राम सभा के फैसले ने धर्म, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है. आदिवासी परंपराओं की रक्षा के नाम पर बाहरी पादरी-पास्टरों के प्रवेश और चंगाई सभाओं पर रोक लगाने संबंधी बोर्ड लगाए जाने से मामला चर्चा में आ गया है. जहां कुछ आदिवासी नेता और ग्राम प्रधान इसे आदिवासी अस्मिता की रक्षा की पहल बता रहे हैं. वहीं, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
ईसाई पादरी-पास्टरों के प्रवेश पर रोक
ग्राम सभा के निर्णय के बाद बोड़ेया चौक पर विधिवत पूजा-पाठ कर बोर्ड लगाया गया. इसमें बाहरी ईसाई पादरी-पास्टरों के प्रवेश पर रोक की बात कही गई है. बोर्ड में संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम, 1996 की धारा 4 का हवाला देते हुए आदिवासी संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों की रक्षा का उल्लेख किया गया है. साथ ही धर्मांतरण, चंगाई सभाओं और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली सभाओं पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है.
धर्म परिवर्तन के लिए प्रभावित किया जाता
बोड़ेया पंचायत के मुखिया सोमा उरांव ने आरोप लगाया कि बीमारी ठीक करने और चंगाई के नाम पर आयोजित कुछ सभाओं के जरिए आदिवासियों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रभावित किया जाता है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति, सभ्यता और पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा जरूरी है. सोमा उरांव ने दावा किया कि बोड़ेया से शुरू हुई यह पहल झारखंड के अन्य पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों तक पहुंचाई जाएगी और वहां भी ऐसे बोर्ड लगाए जाएंगे.
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भाईचारा बिगाड़ने के प्रयासों का विरोध किया
दूसरी ओर सपराम चर्च के पूर्व अध्यक्ष एवं एनएसयूआई नेता अगस्टिन एक्का ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है. उन्होंने धर्म के नाम पर समाज को बांटने और आपसी भाईचारा बिगाड़ने के प्रयासों का विरोध किया. उनका कहना है कि धार्मिक मतभेदों के बावजूद सामाजिक एकता और सद्भाव बनाए रखना जरूरी है. अगस्टिन एक्का ने साफ कहा कि जो संविधान के नियमों का उल्लंघन करेगा धर्म के नाम पर लोगों को भड़काएगा आपसी भाईचारा को खत्म करने का काम करेगा वैसे लोगों को समाज स्वीकार नहीं करेगा और इन लोगों को जवाब मिलना ही चाहिए और इन पर कार्यवाही करने की जरूरत है.
अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन
बोड़ेया का यह घटनाक्रम केवल एक गांव में बोर्ड लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी सांस्कृतिक पहचान, ग्राम सभा के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का बड़ा सवाल खड़ा करता है. एक ओर आदिवासी परंपराओं की रक्षा और कथित जबरन या अनुचित धर्मांतरण को रोकने की मांग है, तो दूसरी ओर संविधान से मिले धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा भी जरूरी है. अब अहम सवाल यह है कि ग्राम सभा के इस फैसले की कानूनी सीमा क्या है और इसे लागू करने का अधिकार किस हद तक है. किसी भी प्रतिबंध और कार्रवाई की वैधता संविधान तथा लागू कानूनों के अनुरूप ही तय होगी.
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झारखंड से विशाल शौर्य की रिपोर्ट
