Home Latest News & Updates जापान-इटली जैसा न हो जाए हाल: AP में 58% परिवारों में एक बच्चा, गिरती जन्म दर रोकने को नायडू का है ये प्लान

जापान-इटली जैसा न हो जाए हाल: AP में 58% परिवारों में एक बच्चा, गिरती जन्म दर रोकने को नायडू का है ये प्लान

by Sanjay Kumar Srivastava 29 May 2026, 8:46 PM IST (Updated 29 May 2026, 8:51 PM IST)
29 May 2026, 8:46 PM IST (Updated 29 May 2026, 8:51 PM IST)
जापान और इटली जैसा न हो जाए हाल: आंध्र प्रदेश में 58% परिवारों में सिर्फ एक बच्चा, गिरती जन्म दर रोकने को नायडू का है ये प्लान

Population Management: आंध्र प्रदेश (AP) के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने राज्य में जनसंख्या प्रबंधन नीति लागू करने की घोषणा की है. इस नई नीति के तहत सरकार ने कहा है कि राज्य में तीसरे बच्चे के जन्म पर 30,000 और चौथे बच्चे के जन्म पर 40,000 रुपए नकद दिए जाएंगे. 90 के दशक में ‘हम दो हमारे दो’ और परिवार नियोजन की वकालत करने वाले चंद्रबाबू नायडू के इस फैसले को भारत की पारंपरिक जनसंख्या नियंत्रण राजनीति में एक बड़ा ‘यू टर्न’ माना जा रहा है. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में ‘मानव संसाधन ही वास्तविक संपत्ति है’ और कार्यबल के बिना राज्य का विकास संभव नहीं है.

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आंध्र में औसत आयु लगभग 32.5 वर्ष है, जो राष्ट्रीय औसत 28 से अधिक है, जो धीरे-धीरे जनसंख्या की उम्र बढ़ने का संकेत देता है. उन्होंने आगाह किया कि यदि यदि यही हाल रहा तो अगले 15 वर्षों में निर्भरता अनुपात मौजूदा 11 से बढ़कर लगभग 23 प्रतिशत हो सकता है. नीति का उद्देश्य जनसांख्यिकीय लाभांश को संरक्षित करना है, क्योंकि आंध्र सबसे तेजी से बढ़ते राज्यों में से एक है, जो राष्ट्रीय आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है.स्वास्थ्य, चिकित्सा और परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव सौरभ गौड़ ने पीटीआई-भाषा को बताया कि तीन से चार महीनों में इस नीति को लागू किया जाएगा.

आंध्र प्रदेश की वर्तमान प्रजनन दर: चिंता का मुख्य मुद्दा

सरकारी आंकड़ों और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, आंध्र प्रदेश की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.5 हो गई है.

  • प्रतिस्थापन स्तर क्या है?: किसी भी समाज या राज्य की जनसंख्या को स्थिर एवं संतुलित रखने के लिए प्रति महिला औसत प्रजनन दर 2.1 आवश्यक है.
  • गिरावट का इतिहास: वर्ष 1993 में आंध्र प्रदेश का औसत प्रजनन दर 3.0 था, जो अब घटकर खतरनाक स्तर (1.5) पर आ गया है. यह दर राष्ट्रीय औसत (लगभग 1.9) से काफी कम है और बिहार (2.8) व उत्तर प्रदेश (2.6) जैसे उत्तरी राज्यों की तुलना में बेहद चिंताजनक है. जब प्रजनन दर 2.1 से नीचे चली जाती है तो इसका सीधा सा मतलब है कि राज्य में बच्चों का जन्म कम हो रहा है और जनसंख्या धीरे-धीरे बूढ़ी हो रही है.

ऐसा फैसला लेने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा?

चंद्रबाबू नायडू ने विधानसभा में कहा था कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में कामकाजी आबादी तेजी से घट सकती है, जिसका असर आर्थिक विकास पर पड़ेगा. उन्होंने जापान, दक्षिण कोरिया और इटली जैसे देशों का उदाहरण भी दिया, जहां घटती जनसंख्या अब एक बड़ी चुनौती बन गई है. मुख्यमंत्री नायडू ने विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर इस नीति को लाने के पीछे चार मुख्य जनसांख्यिकीय और राजनीतिक कारण बताए है.

  • वृद्ध जनसंख्या का बढ़नाः यदि वृद्धों की जनसंख्या बढ़ती है तो अनुमान है कि वर्ष 2047 तक आंध्र प्रदेश की कुल जनसंख्या का लगभग 23% 60 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग होंगे. राज्य अपने युवा कार्यबल को खोने की कगार पर है, जिससे सरकार पर बुजुर्गों की देखभाल और पेंशन के लिए वित्तीय बोझ काफी बढ़ जाएगा. नायडू ने चेतावनी दी कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो आंध्र प्रदेश की स्थिति जापान, इटली और दक्षिण कोरिया जैसी हो जाएगी, जो इस समय गंभीर श्रमिक संकट का सामना कर रहे हैं.
  • घटती जनसंख्याः घटती जनसंख्या के कारण भविष्य में कृषि, आईटी और विनिर्माण क्षेत्रों के लिए श्रम और कुशल कार्यबल मिलना बंद हो जाएगा, जिसका असर राज्य के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि पर पड़ेगा. मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान में राज्य में महिला श्रमिकों की भागीदारी केवल 31% है, जिसे अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए बढ़ाना होगा.
  • लोकसभा सीटों के परिसीमन का डर: ये सबसे बड़ा राजनीतिक कारण है. भारत में आगामी जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का पुनर्गठन (परिसीमन) होना है, जो जनसंख्या के आधार पर तय किया जाता है. आंध्र प्रदेश और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों ने दशकों से परिवार नियोजन को सख्ती से लागू किया है, जिसकी अब उन्हें राजनीतिक रूप से कीमत चुकानी पड़ सकती है. घटती जनसंख्या के कारण संसद (लोकसभा) में दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटें घट सकती हैं, जबकि बढ़ती जनसंख्या वाले उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ेंगी. नायडू इस राजनीतिक असंतुलन को रोकने के लिए अपनी आबादी के प्रतिनिधित्व की रक्षा करना चाहते हैं.
  • केंद्रीय करों की हिस्सेदारी में नुकसानः वित्त आयोग राज्यों को केंद्रीय करों की हिस्सेदारी आवंटित करते समय जनसंख्या को एक महत्वपूर्ण पैरामीटर मानता है. जनसंख्या में गिरावट के कारण आंध्र प्रदेश को मिलने वाली केंद्रीय निधि में भारी कटौती की आशंका है, जिसका असर राज्य की वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है.

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क्या बढ़ती जनसंख्या राज्य के विकास के लिए अच्छी है?

इस प्रश्न के दो पहलू हैं. अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि अधिक जनसंख्या से संसाधनों (जल, भूमि, भोजन) पर दबाव बढ़ता है. लेकिन आधुनिक जनसांख्यिकी के अनुसार एक निश्चित सीमा से नीचे की जनसंख्या विकास को पूरी तरह से रोक सकती है.

  • जनसंख्या पूंजी के रूप में: आंध्र प्रदेश के संदर्भ में बढ़ती जनसंख्या कोई बोझ नहीं बल्कि एक परिसंपत्ति बनाने का प्रयास है. यदि राज्य में युवा आबादी अधिक होगी, तो उपभोक्ता बाजार बढ़ेगा, कर राजस्व बढ़ेगा और नवाचार को गति मिलेगी.
  • असंतुलित जनसंख्या के नुकसान: विकास के लिए ‘इष्टतम जनसंख्या’ आवश्यक है. यदि जन्म दर बहुत कम हो जाती है, तो बुनियादी ढांचा (जैसे खाली स्कूल और कॉलेज) ख़राब होने लगते हैं और पूरा सरकारी बजट उत्पादक गतिविधियों के बजाय बुजुर्गों के स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च होने लगता है. इसलिए इस समय विकास के पहिये को चालू रखने के लिए आंध्र प्रदेश के लिए जनसंख्या प्रबंधन नीति आवश्यक मानी जा रही है.

क्या यह नीति भारत के किसी अन्य राज्य में भी लागू है?

आंध्र प्रदेश इतने बड़े पैमाने पर 30,000 और 40,000 रुपए की वित्तीय सहायता की घोषणा करके प्रजनन दर बढ़ाने के लिए प्रत्यक्ष नकद प्रोत्साहन प्रदान करने वाला भारत का पहला और अग्रणी राज्य बन गया है. हालांकि, भारत के कुछ अन्य राज्यों ने अलग संदर्भों में इसी तरह के कदम उठाए हैं:

  • सिक्किम: उत्तर-पूर्वी राज्य सिक्किम की प्रजनन दर देश में सबसे कम (लगभग 1.1) है. वहां की सरकार ने सरकारी महिला कर्मचारियों को उनके तीसरे बच्चे के जन्म पर विशेष वेतन वृद्धि और वित्तीय सहायता देने की नीति लागू की है.
  • तमिलनाडु और तेलंगाना: इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों ने भी हाल ही में घटती जनसंख्या और परिसीमन के खतरे पर चिंता व्यक्त की है और संकेत दिया है कि वे भविष्य में स्थानीय निकाय चुनावों में ‘दो बच्चों की आवश्यकता’ नियम को हटाकर जनसंख्या बढ़ाने पर भी विचार कर सकते हैं.

शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर क्या असर होगा?

इस नीति के कार्यान्वयन से आने वाले दशकों में राज्य के सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के व्यापक प्रभाव पड़ेंगे.

  • शिक्षा: प्राथमिक एवं उच्च विद्यालयों में बच्चों का नामांकन दर बढ़ेगा. बंद होने की कगार पर पहुंच चुके ग्रामीण स्कूलों को नए छात्र मिलेंगे. ‘थल्लिकी वंदनम’ जैसी सरकारी योजनाएं शिक्षा को वित्तीय सहायता प्रदान करेंगी. इसके अलावा जैसे-जैसे बच्चों की संख्या बढ़ेगी, नए स्कूलों, कक्षाओं और शिक्षकों की भर्ती पर बजटीय खर्च बढ़ाना होगा. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती होगी.
  • स्वास्थ्य: संस्थागत प्रसव और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में सुधार होगा. सरकार को प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर स्वास्थ्य सुविधाओं में निवेश बढ़ाना होगा. इसके अलावा सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) पर मरीजों का बोझ अचानक बढ़ सकता है. बच्चों के टीकाकरण और पोषण बजट में बड़ी बढ़ोतरी होगी.
  • बुनियादी ढांचा: भविष्य में उद्योगों के लिए कुशल कार्यबल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होगा. आवास, शहरी नियोजन और सार्वजनिक परिवहन का दीर्घकालिक उपयोग बढ़ेगा. इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति, सीवरेज सिस्टम और अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों पर दबाव बढ़ेगा. प्रति व्यक्ति संसाधनों के वितरण के लिए अधिक बजटीय आवंटन की आवश्यकता होगी.

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नीति के अन्य प्रमुख स्तंभ और आगे का रास्ता

चंद्रबाबू नायडू की इस नीति का उद्देश्य केवल नकद राशि देना नहीं है, बल्कि इसे एक व्यापक ‘पोषण-शिक्षा-सुरक्षा’ पैकेज के रूप में तैयार किया गया है. सरकार ने संकेत दिया है कि वह बच्चों की स्कूल से कॉलेज तक की पढ़ाई का खर्च उठाने और उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करने की जिम्मेदारी भी साझा करेगी, ताकि माता-पिता को वित्तीय बोझ न उठाना पड़े. विशेषज्ञों का मानना ​​है कि आंध्र प्रदेश सरकार को स्वास्थ्य सुविधाओं को पूरी तरह से मुफ्त बनाने, कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाने और बच्चों के पालन-पोषण के लिए दीर्घकालिक अनुकूल माहौल बनाने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा.

राज्य में कितने परिवारों में सिर्फ एक बच्चा है?

मुख्यमंत्री के मुताबिक, इस वक्त राज्य में करीब 3 लाख परिवार ऐसे हैं जिनमें सिर्फ एक बच्चा है. यह कुल परिवारों का लगभग 58 प्रतिशत है. लगभग 2.17 लाख परिवारों में दो या दो से अधिक बच्चे हैं. सरकार का कहना है कि अगर आने वाले वर्षों में जन्म दर में गिरावट जारी रही, तो 2047 तक राज्य की लगभग 23 प्रतिशत आबादी बुजुर्ग हो सकती है, जिससे सामाजिक और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है.

आंध्र प्रदेश सरकार कैबिनेट की मंजूरी के बाद जल्द ही इस नीति के विस्तृत दिशानिर्देश और रोडमैप को आधिकारिक तौर पर लॉन्च करने जा रही है. यह प्रयोग यह निर्धारित करेगा कि क्या भारत में किसी राज्य की जनसांख्यिकी को वित्तीय प्रोत्साहन के माध्यम से बदला जा सकता है.

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