Home Latest News & Updates ‘न्याय दो या मार दो…’ बुंदेलखंड में फूटा विस्थापितों का गुस्सा, नदी के बीच चिताओं पर लेटे आंदोलनकारी

‘न्याय दो या मार दो…’ बुंदेलखंड में फूटा विस्थापितों का गुस्सा, नदी के बीच चिताओं पर लेटे आंदोलनकारी

by Nitin Thakur 13 July 2026, 5:39 PM IST (Updated 14 July 2026, 11:50 AM IST)
13 July 2026, 5:39 PM IST (Updated 14 July 2026, 11:50 AM IST)
Anger people Bundelkhand Ken-Betwa Link Project

Bundelkhand News : बुंदेलखंड में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट और बांध परियोजनाओं से बर्बाद हुए विस्थापितों का सब्र अब टूट चुका है. न्याय दो या मार दो के नारों के साथ छतरपुर के कूपी गांव में नदी के उफान के बीच लोग लकड़ी की चिताओं पर लेट गए हैं. आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर पिछले कई दिनों से आमरण अनशन पर हैं और अब यह आंदोलन बेहद उग्र मोड़ लेता जा रहा है.

पानी के बीचों बीच दिखा लोगों का सुलगता गुस्सा

आसमान से बरसती आफत, उफनती नदी की लहरें और पानी के बीचों-बीच सुलगते गुस्से की यह तस्वीरें मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की हैं. छतरपुर मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर कूपी गांव की बैराना नदी इस वक्त आंदोलन का गवाह बनी हुई है. अपनी जमीन, अपने घर और अपने हक के छिन जाने के बाद इन विस्थापितों न्याय दो या मार दो का नारा लगाया.

पुल के नीचे बनाया लोगों ने आशियाना

बारिश के बीच करीब 400 ग्रामीण पिछले कई दिनों से यहां डटे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या महिलाओं और मासूम बच्चों की भी है. घर-बार छूट चुका है और यही वजह है कि विस्थापितों ने नदी के पास बन रहे एक नए पुल के नीचे ही अपना आशियाना बना लिया है. यहीं खाना पक रहा है और यहीं रातें कट रही हैं.

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प्रशासन ने बताया दूसरे जिले का मामला

प्रशासन की बेरुखी के खिलाफ विस्थापितों के नेता अमित भटनागर आमरण अनशन पर हैं. उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है, लेकिन हौसले अडिग हैं. भटनागर के समर्थन में अब गांव की महिलाओं ने भी क्रमिक अनशन शुरू कर दिया है. लेकिन हैरान करने वाली बात जिला प्रशासन का रवैया है. छतरपुर प्रशासन का कहना है कि धरने में शामिल अधिकांश लोग पन्ना जिले की परियोजनाओं से प्रभावित हैं यानी मामला दूसरे जिले का है, इसलिए वे इसमें सीधे दखल नहीं दे सकते. अब सवाल यह है कि सीमाओं के इस खेल में इन गरीबों को उनका हक कब मिलेगा.

पानी में चिता सजाकर लेटने को मजबूर

केन-बेतवा लिंक परियोजना को विकास का नाम दिया गया, लेकिन इस विकास की वेदी पर जो लोग उजड़ गए. वे आज अपनी बुनियादी मांगों के लिए पानी में चिता सजाकर लेटने को मजबूर हैं. अब देखना होगा कि सरकार इस चिता आंदोलन के बाद जागती है या विस्थापितों की यह चीख नक्शों और सीमाओं की फाइलों में दबी रह जाती है.

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