Home Religious HC का बड़ा निर्णय: ‘मस्जिद नहीं, वाग्देवी का मंदिर है भोजशाला’, हिंदू पक्ष की मांगें मंजूर कर सुनाया न्याय

HC का बड़ा निर्णय: ‘मस्जिद नहीं, वाग्देवी का मंदिर है भोजशाला’, हिंदू पक्ष की मांगें मंजूर कर सुनाया न्याय

by Sanjay Kumar Srivastava
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HC का बड़ा निर्णय: 'मस्जिद नहीं, वाग्देवी का मंदिर है भोजशाला', हिंदू पक्ष की मांगें मंजूर कर सुनाया न्याय

Dhar Bhojshala: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद के मामले में शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया. 12 मई को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. अदालत ने माना कि भोजशाला परिसर वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है. कोर्ट ने जैन समुदाय और मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी है.

Dhar Bhojshala: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद के मामले में शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया. 12 मई को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. अदालत ने माना कि भोजशाला परिसर वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है. कोर्ट ने जैन समुदाय और मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी है. यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है, जिस पर कोर्ट ने भरोसा जताया है. भोजशाला मामले में अदालत ने परिसर को वाग्देवी के मंदिर के रूप में मान्यता दी है. उधर, फैसला आते ही धार में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी हाई अलर्ट पर हैं. कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय मस्जिद के निर्माण के लिए जिले में अलग भूमि के आवंटन के लिए राज्य सरकार से संपर्क कर सकता है.

जैन समुदाय और मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज

भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर विवाद में अपने फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि भोजशाला में एक संस्कृत शिक्षण केंद्र और देवी सरस्वती का मंदिर होने के संकेत मिले हैं. हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी (देवी सरस्वती) मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमल मौला मस्जिद कहता है. जबकि जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता का दावा है कि विवादित परिसर एक मध्ययुगीन जैन मंदिर और गुरुकुल है. भोजशाला परिसर पर विवाद छिड़ने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 7 अप्रैल, 2003 को एक आदेश जारी किया, जिसमें हिंदुओं को हर मंगलवार को परिसर में पूजा करने और मुसलमानों को हर शुक्रवार को वहां नमाज अदा करने की अनुमति दी गई. हिंदू पक्ष ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी और परिसर में पूजा करने का विशेष अधिकार मांगा.

अलाउद्दीन खिलजी के आदेश पर तोड़ा गया था मंदिर

उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने इस साल 6 अप्रैल को मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर नियमित सुनवाई शुरू की. विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक दावों, जटिल कानूनी प्रावधानों और विवादित स्मारक से जुड़े हजारों दस्तावेजों की पृष्ठभूमि में सभी पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने 12 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत दलीलें पेश कीं और स्मारक पर अपने समुदायों के लिए विशेष पूजा के अधिकार की मांग की.

ASI ने स्मारक का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने के बाद अपनी 2,000 से अधिक पेज की रिपोर्ट में संकेत दिया कि धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद से पहले की थी और वर्तमान विवादित संरचना पुनर्निर्मित मंदिर घटकों का उपयोग करके बनाई गई थी. हिंदू पक्ष के अनुसार, वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आदेश पर इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था और उसके अवशेषों का उपयोग करके एक मस्जिद का निर्माण किया गया था.

ASI ने 15 जुलाई, 24 को सौंपी थी रिपोर्ट

हिंदू पक्ष ने दावा किया कि एएसआई द्वारा अपने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान पाए गए सिक्के, मूर्तियां और शिलालेख साबित करते हैं कि परिसर मूल रूप से एक मंदिर था. हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि एएसआई की सर्वेक्षण रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण थी और हिंदू याचिकाकर्ताओं के दावों का समर्थन करने के लिए तैयार की गई थी. इसका खंडन करते हुए एएसआई ने अदालत को बताया कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण प्रक्रिया विशेषज्ञों की मदद से की गई थी, जिसमें मुस्लिम समुदाय के तीन लोग भी शामिल थे. HC ने 11 मार्च, 2024 को ASI को भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था. ASI ने उस वर्ष 22 मार्च को सर्वेक्षण शुरू किया और 98 दिनों के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई को उच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी.

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News Source: PTI

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