Shah Bano Haq: यामी गौतम और इमरान हाशमी की फिल्म ‘हक’ को लेकर हर तरफ बातें हो रही हैं. इसमें 40 साल पुराना वो विवाद दिखाया है, जिसने सरकार हिला दी थी. मगर फिल्म में कितना सच दिखाया है, ये भी जान लीजिए.
14 January, 2026
Shah Bano Haq: इमरान हाशमी और यामी गौतम की नई फिल्म ‘हक’ इन दिनों नेटफ्लिक्स पर छाई हुई है. इस फिल्म ने एक बार फिर पूरे देश में पुरानी बहस छेड़ दी है. ये फिल्म 40 साल पुराने शाह बानो केस से इंस्पायर है, जिसने भारत में महिलाओं के अधिकार, धर्म और न्याय के बीच के बैलेंस पर कई सवाल खड़े कर दिए थे. यामी गौतम और इमरान हाशमी स्टारर ये कोर्टरूम ड्रामा ओटीटी पर लोगों का खूब ध्यान खींच रही है. करण जौहर और आलिया भट्ट जैसे बॉलीवुड सेलिब्रिटीज ने भी यामी गौतम की दमदार परफॉर्मेंस की तारीफ की है. जैसे-जैसे फिल्म को पॉपुलैरिटी मिल रही है, लोग उस असली केस के बारे में जानने के लिए एक्साइटेड हो रहे हैं, जिसने सालों पहले भारत की न्याय व्यवस्था को हिला दिया था.

शाह बानो केस
शाह बानो बेगम मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम महिला थीं. उनकी शादी 1932 में मोहम्मद अहमद खान से हुई थी, जो खुद उस ज़माने के बड़े वकील थे. उनके पांच बच्चे थे. शादी के लगभग 40 साल बाद, 1978 में अहमद खान ने शाह बानो को तलाक दे दिया और उनका खर्च उठाना बंद कर दिया. बुढ़ापे में बिना पैसों के गुज़ारा करना शाह बानो के लिए मुश्किल हो गया. तब उन्होंने इंदौर के लोकल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत गुजारे भत्ते की मांग की. ये कानून ऐसी महिलाओं को फाइनेंशियल सपोर्ट देने का दावा करता है, जो खुद का खर्चा नहीं उठा सकतीं.

कोर्ट का फैसला
मोहम्मद अहमद खान ने शाह बानो का विरोध किया. उनका तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, गुजारा भत्ता सिर्फ ‘इद्दत’ यानी तलाक के बाद लगभग तीन महीने तक ही दिया जाता है. हालांकि, अप्रैल 1985 में, सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि धारा 125 धर्मनिरपेक्ष है और सभी नागरिकों पर लागू होती है. उस समय के चीफ जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ ने कहा कि ये कानून महिलाओं को बेसहारा होने से बचाने के लिए है और इसे पर्सनल लॉ रद्द नहीं कर सकता. इस फैसले ने देश में राजनीतिक और धार्मिक हंगामा खड़ा कर दिया. कई मुस्लिम संगठनों ने कोर्ट के फैसले का कड़ा विरोध किया. उनका कहना था कि ये इस्लामिक कानून में दखलंदाजी है.

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वापस लिया फैसला
भारी दबाव के बीच, राजीव गांधी की सरकार ने ‘मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986’ बिल पास किया. इस कानून ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कमजोर कर दिया. साथ ही गुजारा भत्ते को ‘इद्दत’ की तक फिर से सीमित कर दिया. जब सामाजिक दबाव बढ़ा और कंट्रोवर्सी हुई, तब शाह बानो ने अपना केस भी वापस ले लिया. उन्होंने ये कहा कि वो शरीयत के खिलाफ नहीं जाना चाहतीं. कानूनी रूप से केस जीतने के बावजूद, शाह बानो को भारी कीमत चुकानी पड़ी. इसके बाद वो लाइमलाइट से दूर एक गुमनाम जिंदगी जीती रहीं.

रील वर्सेस रियल
भले ही ‘हक’ फिल्म शाह बानो के केस से इंस्पायर है, लेकिन मेकर्स ने ये क्लियर किया है कि ये कोई बायोपिक नहीं है. कहानी में ड्रामा क्रिएट करने और इसे इंस्पायरिंग बनाने के लिए फिल्म में क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है. ‘हक’ में यामी गौतम ने शजिया बानो का रोल किया है, जो एक मौलवी की बेटी है. हालांकि, रीयल में शाह बानो एक पुलिस कांस्टेबल की बेटी थीं. फिल्म में दिखाया गया है कि शजिया बानो केस जीतती हैं और गर्व के साथ बाहर निकलती हैं. हकीकत में, शाह बानो ने सामाजिक और धार्मिक दबाव की वजह से अपना केस वापस ले लिया था. फिल्म ‘हक’ की कहानी 1967 के आसपास की है, जबकि शाह बानो की शादी 1932 में हुई थी.

फिक्शन और फैक्ट्स
शजिया बानो को एक यंग महिला के रूप में दिखाया गया है. हालांकि, कानूनी लड़ाई के दौरान शाह बानो 60 की उम्र तक पहुंच चुकी थीं. इसके अलावा फिल्म में 400 रुपये महीना गुजारा भत्ते का जिक्र है, जबकि रीयल में शाह बानो को 200 रुपये मिले थे. उन्होंने 1978 में केस दर्ज करवाया था. इसके लगभग 7 साल बाद यानी 1985 में कोर्ट ने उनके हक में फैसला सुनाया. मगर फिल्म में ये लड़ाई लगभग 20 साल तक लड़ी गई. हालांकि, ये बात सही है कि शाह बानो का केस और उसका फैसला भारत के संवैधानिक इतिहास में एक मील का पत्थर बना. इसने मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं के अधिकारों को लेकर बड़े सवाल उठाए थे. यामी गौतम की फिल्म ‘हक’ की वजह से शाह बानो की कहानी फिर से चर्चा में है. वो एक ऐसी महिला थीं, जिसने सदियों पुराने रीति-रिवाजों को चुनौती देकर कानून, पॉलिटिक्स और आस्था को आमने-सामने खड़ा कर दिया था.
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